देश की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाले अमर शहीदों की फेरहिस्त में फ्लाइट लेफ्टिनेंट मनु अखौरी का नाम बेहद अदब के साथ लिया जाता है। महज 24 साल की उम्र में उन्होंने कर्तव्य पथ पर जो मिसाल पेश की, वह आज भी हर देशवासी का सीना गर्व से चौड़ा कर देती है। पंजाब के भटिंडा एयरफोर्स स्टेशन से उड़ान भरने के दौरान उनके लड़ाकू विमान में तकनीकी खामी आ गई थी, जिसके बाद उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा से ऊपर आम नागरिकों की हिफाजत को तरजीह दी।
बचपन से ही आसमान की ऊंचाइयों को छूने का था जुनून
झारखंड के पलामू जिले के मेदिनीनगर के रहने वाले मनु अखौरी का जन्म 21 फरवरी 1984 को हुआ था। उनके घर में देशभक्ति का माहौल पहले से ही था क्योंकि उनके पिता कर्नल संजय अखौरी ने भारतीय सेना में वर्ष 1976 से 2013 तक अपनी सेवाएं दी थीं। उनकी माता का नाम नीरा अखौरी है। मनु की शुरुआती तालीम स्थानीय सेक्रेड हार्ट स्कूल से हुई थी। बारहवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 2002 में एनडीए की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। बचपन के दिनों से ही उन्हें लड़ाकू विमानों और रक्षा तंत्र के बारे में जानने की गहरी जिज्ञासा थी।
कठिन प्रशिक्षण के बाद एयरफोर्स में मिला मुकाम
सेना की पृष्ठभूमि से होने के बावजूद उनका सफर आसान नहीं रहा। एनडीए की चयन प्रक्रिया के दौरान उनका शुरुआती चयन आर्मी और नेवी के लिए हुआ था, लेकिन उनका एकमात्र लक्ष्य भारतीय वायुसेना का हिस्सा बनना था। अपनी जिद और मेहनत के दम पर वर्ष 2003 में उनका चयन आखिरकार एयरफोर्स के लिए हो गया। लंबी और कठिन ट्रेनिंग के दौर से गुजरने के बाद वर्ष 2006 में उन्हें विधिवत कमीशन प्राप्त हुआ। इसके बाद वह आगे के उन्नत प्रशिक्षण के लिए कर्नाटक के बीदर गए। उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें आधुनिक हॉक विमान के प्रशिक्षण के लिए वर्ष 2008 में इंग्लैंड भेजा गया। अपनी ट्रेनिंग सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद वर्ष 2009 में उनकी तैनाती भटिंडा एयरफोर्स स्टेशन के प्रतिष्ठित 17 स्क्वाड्रन में कर दी गई।
प्रशिक्षण उड़ान के दौरान सामने आई तकनीकी मुसीबत
घटना 10 सितंबर 2009 की है जब वह एक निर्धारित अभ्यास उड़ान पर निकले थे। उन्होंने अपने विमान का पहला सर्किट सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था, जिसके बाद उन्हें दूसरा सर्किट पूरा करने का निर्देश मिला। जैसे ही उन्होंने दूसरा राउंड शुरू किया, उनके मिग-21 विमान में अचानक गंभीर तकनीकी खराबी आ गई और विमान का नियंत्रण बिगड़ने लगा। विमान तेजी से नीचे की ओर आने लगा। उन्होंने तुरंत एयर ट्रैफिक कंट्रोल को स्थिति से अवगत कराया। उस वक्त उनके नीचे एक घनी आबादी वाला रिहायशी इलाका था और सामने एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल था, जहां करीब 1500 छात्र पढ़ाई कर रहे थे।
विशाल खतरे के बीच सूझबूझ से टाली बड़ी तबाही
मौत को सामने देख भी उन्होंने घबराने के बजाय अदम्य साहस का परिचय दिया। उनके पास विमान से इजेक्ट करने का विकल्प था, लेकिन ऐसा करने पर विमान सीधे स्कूल पर जा गिरता जिससे डेढ़ हजार मासूम बच्चों की जान चली जाती। उन्होंने विमान का रुख स्कूल की इमारतों से दूर मोड़ने का कठिन फैसला किया। रास्ते में एक पेट्रोल पंप और व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग भी था जहां भारी संख्या में आम लोग और यात्री मौजूद थे। उन्होंने हर खतरे को टालते हुए विमान को लगातार किसी वीरान जगह की तरफ खींचे रखा। अंत में पंजाब के मुक्तसर क्षेत्र के भलाइयाना गांव के पास एक सुनसान जगह पर उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और देश ने अपना एक होनहार बेटा खो दिया।
पिता को सफर के दौरान मिली दिल दहला देने वाली खबर
यह दुखद हादसा उस वक्त हुआ जब उनके पिता ट्रेन के जरिए अपने बेटे से मिलने भटिंडा जा रहे थे। सफर के दौरान ही उनके पास एक साथी का फोन आया और उन्हें मिग-21 दुर्घटना की भयावह जानकारी दी गई। उन्हें बताया गया कि दुर्घटनाग्रस्त विमान को उनका बेटा ही उड़ा रहा था। एक पिता के लिए यह खबर किसी वज्रपात से कम नहीं थी। उन्होंने अंतिम सांस तक अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। आज उनकी शहादत की यादें लोगों के दिलों में ताजा हैं। भलाइयाना गांव में उस स्कूल को उनके नाम से जोड़ने की बात कही जाती है, जबकि मेदिनीनगर में सद्दीक चौक से इंजीनियरिंग रोड तक के मार्ग को मनु अखौरी मार्ग नाम दिया गया है। हर साल 10 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि पर पूर्व सैनिक और स्थानीय लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।



















