झारखंड के पलामू जिले में इस साल खरीफ मौसम की शुरुआत किसानों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुई थी, लेकिन अगस्त के महीने में हुए जोरदार मौसमी बदलाव ने खेती की उम्मीद जगा दी है। जून और जुलाई के दौरान अपेक्षित वर्षा न होने की वजह से जिले में धान की बोआई और रोपाई का रकबा काफी प्रभावित हुआ था। समय पर बारिश न मिलने के कारण अनेक किसान अपने खेतों में धान का रोपा नहीं लगा सके थे और कई किसानों को अरहर जैसी वैकल्पिक फसलों का सहारा लेना पड़ा था। हालांकि, अगस्त में अचानक बदले मौसम के कारण जिले में कुल 575 मिलीमीटर के करीब वर्षा दर्ज की गई, जिससे खाली पड़े खेतों में पर्याप्त पानी और नमी उपलब्ध हो चुकी है।
पलामू में बारिश का रुख और खेतों में नमी की स्थिति
कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनोद पांडे के अनुसार, अगस्त महीने में हुई यह पर्याप्त बारिश उन किसानों के लिए एक बेहतरीन अवसर लेकर आई है जो शुरुआती सूखे के कारण धान नहीं लगा पाए थे। जिले में 575 मिलीमीटर वर्षा होने के बाद खेतों में पानी का संचयन और मिट्टी की नमी का स्तर बहुत बेहतर हो गया है। जो किसान अब तक अपने खेतों में रोपाई नहीं कर सके हैं या जिन खेतों में काम अटका हुआ था, वे अब भी धान की खेती कर सकते हैं। वर्तमान समय को देखते हुए किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे लंबी अवधि वाली फसलों के बजाय 90 से 110 दिनों के भीतर पककर तैयार होने वाली कम समय की धान किस्मों का ही चयन करें, ताकि मौसम का पूरा फायदा उठाया जा सके।
कम समय में तैयार होने वाली धान की प्रमुख किस्मों का चयन
देर से धान की खेती करने वाले किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनोद पांडे ने कुछ विशिष्ट किस्मों की सिफारिश की है। इनमें मुख्य रूप से स्वर्ण श्रेया किस्म शामिल है, जो लगभग 110 दिनों की अवधि में तैयार हो जाती है। यह किस्म स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र में भी किसानों के लिए उपलब्ध कराई गई है। इसके अतिरिक्त, किसान अभिषेक, वंदना, नवीन और अंजली जैसी कम अवधि वाली धान की किस्मों की रोपाई भी कर सकते हैं। ये सभी किस्में पलामू क्षेत्र की स्थानीय जलवायु, मिट्टी और मौसमी परिस्थितियों के अनुकूल हैं। इसके साथ ही, किसान कृष्ण विकास धान-101 जैसी अन्य उपयुक्त किस्मों पर भी विचार कर सकते हैं, जो कम समय में अच्छी उपज देने के लिए जानी जाती हैं।
मध्यम और उपरी जमीन के लिए प्रबंधन और वैज्ञानिक सलाह
डॉ. विनोद पांडे ने यह स्पष्ट किया है कि इन कम अवधि वाली किस्मों की खेती मध्यम जमीन और अपलैंड यानी उपरी भूमि दोनों प्रकार के खेतों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। पलामू की वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किसानों को ऐसी फसलों अथवा किस्मों से परहेज करने की सलाह दी गई है, जिन्हें अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है। धान की खेती के लिए इस समय हाइब्रिड किस्मों या अत्यधिक पानी चाहने वाली किस्मों के स्थान पर कम समय में पकने वाली सामान्य किस्मों का चुनाव अधिक सुरक्षित और लाभदायक साबित होगा। यदि किसान अगस्त की बारिश से मिट्टी में बनी नमी का सही समय पर उपयोग करते हैं और सही किस्मों की रोपाई करते हैं, तो वे खरीफ सीजन में हुए शुरुआती नुकसान की भरपाई आसानी से कर सकते हैं।




















