वैवाहिक विवादों में गुजारा भत्ते को लेकर आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि पति को हर हाल में पत्नी का खर्च उठाना होगा। लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट के एक ताजे फैसले ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। जस्टिस चिलाकुर सुमलता ने मैसूरु के एक व्यक्ति को राहत देते हुए निचली अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें उसे अपनी पत्नी को 20,000 रुपये प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण देने को कहा गया था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि 1,64,285 रुपये मासिक कमाने वाली पत्नी अपने 57,000 रुपये प्रति माह कमाने वाले पति से गुजारा भत्ता नहीं ले सकती।
मामले की शुरुआत
पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत अपने पति और उसके परिवार के खिलाफ मैसूरु की एक अदालत में याचिका दायर की थी। उसने अपने रोजमर्रा के खर्चों के लिए 1,13,515 रुपये प्रति माह की मांग की, साथ ही मुकदमे के खर्च के रूप में 50,000 रुपये अलग से मांगे। पति ने अदालत को बताया कि वे दोनों केवल दो महीने ही साथ रहे थे। TDS दस्तावेजों से यह साबित हुआ कि पत्नी की मासिक सैलरी 1,64,285 रुपये है जबकि पति की आय मात्र 57,000 रुपये प्रति माह है। इस तरह पत्नी पति से करीब तीन गुना अधिक कमाती थी।
निचली अदालत का आदेश और हाईकोर्ट में चुनौती
मैसूरु की अदालत ने 19 दिसंबर 2025 को पति को 20,000 रुपये प्रति माह अंतरिम मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया। इस आदेश से असंतुष्ट होकर पति ने कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान पत्नी ने खुद स्वीकार किया कि वह हर महीने 1 लाख रुपये से अधिक कमाती है, लेकिन उसने दलील दी कि शादी के खर्चों की वजह से वह कर्ज में है और EMI चुका रही है। जब अदालत ने उससे ऋण या EMI का दस्तावेज मांगा तो वह कुछ भी पेश नहीं कर सकी। इस कमजोरी ने उसकी पूरी याचिका की स्थिति को और कमजोर कर दिया।
जस्टिस सुमलता का अहम फैसला
जस्टिस चिलाकुर सुमलता ने सभी तथ्यों की गहन जांच के बाद निचली अदालत का आदेश पलट दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि गुजारा भत्ता, चाहे वह अंतरिम हो या अंतिम, तभी दिया जाना चाहिए जब यह साबित हो जाए कि पत्नी के पास पति के जीवनस्तर के अनुरूप खुद को बनाए रखने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं। जब पत्नी की कमाई पति से तीन गुना अधिक हो और उस पर बच्चों की परवरिश जैसी कोई जिम्मेदारी भी न हो, तो मेंटेनेंस देने का कोई तर्क नहीं बनता। जस्टिस सुमलता ने इसी आधार पर मैसूरु के उस व्यक्ति को राहत दी।
सिर्फ याचिका दाखिल करने से नहीं मिलेगा मेंटेनेंस
कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया। अदालत ने साफ किया कि महज इसलिए कि पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, भरण-पोषण अधिनियम या BNSS के तहत याचिका दाखिल की है, पति को अपने-आप मेंटेनेंस देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। हर मामले में अदालत को तथ्यों की बारीकी से जांच करनी होगी और फिर तय करना होगा कि पत्नी वास्तव में गुजारा भत्ता पाने की हकदार है या नहीं। याचिका दाखिल करना और मेंटेनेंस पाने का अधिकार दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
पुरानी एकतरफा धारणा पर प्रहार
इस फैसले ने उस पुरानी सोच पर भी कड़ा प्रहार किया जिसके तहत हमेशा यह मान लिया जाता था कि पत्नी का खर्च उठाना पति की ही जिम्मेदारी है, चाहे पत्नी खुद कितना भी कमा रही हो। जस्टिस सुमलता ने स्पष्ट किया कि जो पत्नियां आर्थिक रूप से मजबूत हैं, पति से ज्यादा कमाती हैं और जिन पर बच्चों की देखभाल जैसी कोई जिम्मेदारी नहीं है, वे केवल कानून का दरवाजा खटखटाकर पति से पैसे वसूल करने को अपना स्वत: अधिकार नहीं मान सकतीं। इस फैसले ने मेंटेनेंस के मामलों में एक संतुलित और सबूत-आधारित नजरिए की जरूरत को रेखांकित किया है।
EMI का दावा अदालत में नहीं टिका
1 लाख रुपये से अधिक मासिक कमाने वाली पत्नी यह साबित नहीं कर पाई कि वह आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर है। उसने शादी के खर्चों की वजह से कर्ज का दावा किया लेकिन ऋण समझौते या EMI का कोई भी दस्तावेजी सबूत अदालत के सामने पेश नहीं कर सकी। जस्टिस सुमलता ने माना कि जब पत्नी खुद आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम है, तो निचली अदालत को 20,000 रुपये मासिक मेंटेनेंस दिलवाने का आदेश देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने वह आदेश निरस्त कर दिया।













