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कर्नाटक हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: जब पत्नी की आय पति से तीन गुना हो तो मेंटेनेंस नहीं मिलेगाकर्नाटक
3 घंटे पहले· 4

कर्नाटक हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: जब पत्नी की आय पति से तीन गुना हो तो मेंटेनेंस नहीं मिलेगा

कर्नाटक हाईकोर्ट ने मैसूरु के एक पति को बड़ी राहत देते हुए निचली अदालत का 20,000 रुपये प्रति माह का मेंटेनेंस आदेश रद्द कर दिया। जस्टिस चिलाकुर सुमलता ने स्पष्ट किया कि 1,64,285 रुपये मासिक कमाने वाली पत्नी अपने पति से गुजारा भत्ता मांगने की हकदार नहीं है।

Karan MalhotraKaran MalhotraCrime Correspondent 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
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वैवाहिक विवादों में गुजारा भत्ते को लेकर आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि पति को हर हाल में पत्नी का खर्च उठाना होगा। लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट के एक ताजे फैसले ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। जस्टिस चिलाकुर सुमलता ने मैसूरु के एक व्यक्ति को राहत देते हुए निचली अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें उसे अपनी पत्नी को 20,000 रुपये प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण देने को कहा गया था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि 1,64,285 रुपये मासिक कमाने वाली पत्नी अपने 57,000 रुपये प्रति माह कमाने वाले पति से गुजारा भत्ता नहीं ले सकती।

मामले की शुरुआत

पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत अपने पति और उसके परिवार के खिलाफ मैसूरु की एक अदालत में याचिका दायर की थी। उसने अपने रोजमर्रा के खर्चों के लिए 1,13,515 रुपये प्रति माह की मांग की, साथ ही मुकदमे के खर्च के रूप में 50,000 रुपये अलग से मांगे। पति ने अदालत को बताया कि वे दोनों केवल दो महीने ही साथ रहे थे। TDS दस्तावेजों से यह साबित हुआ कि पत्नी की मासिक सैलरी 1,64,285 रुपये है जबकि पति की आय मात्र 57,000 रुपये प्रति माह है। इस तरह पत्नी पति से करीब तीन गुना अधिक कमाती थी।

निचली अदालत का आदेश और हाईकोर्ट में चुनौती

मैसूरु की अदालत ने 19 दिसंबर 2025 को पति को 20,000 रुपये प्रति माह अंतरिम मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया। इस आदेश से असंतुष्ट होकर पति ने कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान पत्नी ने खुद स्वीकार किया कि वह हर महीने 1 लाख रुपये से अधिक कमाती है, लेकिन उसने दलील दी कि शादी के खर्चों की वजह से वह कर्ज में है और EMI चुका रही है। जब अदालत ने उससे ऋण या EMI का दस्तावेज मांगा तो वह कुछ भी पेश नहीं कर सकी। इस कमजोरी ने उसकी पूरी याचिका की स्थिति को और कमजोर कर दिया।

जस्टिस सुमलता का अहम फैसला

जस्टिस चिलाकुर सुमलता ने सभी तथ्यों की गहन जांच के बाद निचली अदालत का आदेश पलट दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि गुजारा भत्ता, चाहे वह अंतरिम हो या अंतिम, तभी दिया जाना चाहिए जब यह साबित हो जाए कि पत्नी के पास पति के जीवनस्तर के अनुरूप खुद को बनाए रखने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं। जब पत्नी की कमाई पति से तीन गुना अधिक हो और उस पर बच्चों की परवरिश जैसी कोई जिम्मेदारी भी न हो, तो मेंटेनेंस देने का कोई तर्क नहीं बनता। जस्टिस सुमलता ने इसी आधार पर मैसूरु के उस व्यक्ति को राहत दी।

सिर्फ याचिका दाखिल करने से नहीं मिलेगा मेंटेनेंस

कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया। अदालत ने साफ किया कि महज इसलिए कि पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, भरण-पोषण अधिनियम या BNSS के तहत याचिका दाखिल की है, पति को अपने-आप मेंटेनेंस देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। हर मामले में अदालत को तथ्यों की बारीकी से जांच करनी होगी और फिर तय करना होगा कि पत्नी वास्तव में गुजारा भत्ता पाने की हकदार है या नहीं। याचिका दाखिल करना और मेंटेनेंस पाने का अधिकार दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

पुरानी एकतरफा धारणा पर प्रहार

इस फैसले ने उस पुरानी सोच पर भी कड़ा प्रहार किया जिसके तहत हमेशा यह मान लिया जाता था कि पत्नी का खर्च उठाना पति की ही जिम्मेदारी है, चाहे पत्नी खुद कितना भी कमा रही हो। जस्टिस सुमलता ने स्पष्ट किया कि जो पत्नियां आर्थिक रूप से मजबूत हैं, पति से ज्यादा कमाती हैं और जिन पर बच्चों की देखभाल जैसी कोई जिम्मेदारी नहीं है, वे केवल कानून का दरवाजा खटखटाकर पति से पैसे वसूल करने को अपना स्वत: अधिकार नहीं मान सकतीं। इस फैसले ने मेंटेनेंस के मामलों में एक संतुलित और सबूत-आधारित नजरिए की जरूरत को रेखांकित किया है।

EMI का दावा अदालत में नहीं टिका

1 लाख रुपये से अधिक मासिक कमाने वाली पत्नी यह साबित नहीं कर पाई कि वह आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर है। उसने शादी के खर्चों की वजह से कर्ज का दावा किया लेकिन ऋण समझौते या EMI का कोई भी दस्तावेजी सबूत अदालत के सामने पेश नहीं कर सकी। जस्टिस सुमलता ने माना कि जब पत्नी खुद आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम है, तो निचली अदालत को 20,000 रुपये मासिक मेंटेनेंस दिलवाने का आदेश देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने वह आदेश निरस्त कर दिया।

इसका आप पर असर

  • भारत में: यह फैसला देशभर की अदालतों के लिए एक अहम मिसाल बनेगा, जिससे आर्थिक रूप से सक्षम पत्नियों के लिए केवल याचिका दाखिल करके मेंटेनेंस हासिल करना कठिन होगा।
  • पति-पत्नी दोनों के लिए: अब अदालतें मेंटेनेंस का निर्णय दोनों पक्षों की वास्तविक आय और वित्तीय स्थिति के आधार पर लेंगी, न कि सिर्फ लिंग के आधार पर।

सवाल-जवाब

कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या फैसला सुनाया?
जस्टिस चिलाकुर सुमलता ने मैसूरु की निचली अदालत का 20,000 रुपये प्रति माह का अंतरिम मेंटेनेंस आदेश रद्द कर दिया और कहा कि 1,64,285 रुपये मासिक कमाने वाली पत्नी गुजारा भत्ते की हकदार नहीं है।
इस मामले में पति और पत्नी की आय में क्या अंतर था?
पति की मासिक आय 57,000 रुपये थी जबकि पत्नी 1,64,285 रुपये प्रति माह कमाती थी, यानी पत्नी की आय पति से करीब तीन गुना अधिक थी।
पत्नी ने कितने मेंटेनेंस की मांग की थी?
पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत 1,13,515 रुपये प्रति माह गुजारे के लिए और 50,000 रुपये मुकदमा खर्च के तौर पर मांगे थे।
निचली अदालत ने कब और कितना मेंटेनेंस तय किया था?
मैसूरु की अदालत ने 19 दिसंबर 2025 को आदेश जारी करते हुए पति को 20,000 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था।
पत्नी की EMI वाली दलील क्यों नहीं मानी गई?
पत्नी ने शादी के खर्चों के कारण कर्ज में होने का दावा किया लेकिन किसी भी ऋण या EMI का दस्तावेजी सबूत अदालत में पेश नहीं कर सकी, इसलिए यह दलील खारिज हो गई।
अदालत के अनुसार मेंटेनेंस देने की क्या शर्त है?
कोर्ट ने कहा कि मेंटेनेंस तभी दिया जाना चाहिए जब यह साबित हो जाए कि पत्नी के पास पति के जीवनस्तर के अनुरूप खुद को बनाए रखने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं।
पति-पत्नी कितने समय तक साथ रहे?
पति के अनुसार दोनों केवल दो महीने साथ रहे थे।
यह फैसला किन कानूनों पर लागू होता है?
यह फैसला घरेलू हिंसा अधिनियम, भरण-पोषण अधिनियम और BNSS के तहत दाखिल मेंटेनेंस याचिकाओं पर लागू होता है।
Karan Malhotra
लेखक के बारे मेंKaran MalhotraCrime Correspondent Prayagraj
विशेषज्ञताCrime News, Investigations, Law Enforcement, Courts, Legal Affairs, Public Safety, Breaking Crime Stories, Justice System, Criminal Cases

Karan Malhotra is a Crime Correspondent covering breaking crime news, investigations, law enforcement updates, and major criminal cases. He reports on public safety and justice-related developments.

Karan Malhotra is a Crime Correspondent specializing in crime reporting, criminal investigations, law enforcement, and justice system coverage. He reports on breaking crime stories, police operations, court proceedings, high-profile cases, and public safety issues. With a focus on factual and responsible journalism, Karan provides detailed coverage of criminal activities, legal developments, and investigative updates. His reporting highlights the work of law enforcement agencies, judicial outcomes, and the impact of crime on communities, offering readers clear and timely information on security and justice matters.

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