बेंगलुरु के हवनूर लेआउट इलाके में सन्नाटे के बीच एक दर्दनाक सच्चाई सामने आई है। लगभग दो वर्षों तक दुनिया से बिल्कुल कटी रहने वाली 57 वर्षीय महिला दक्षायिनी का अवशेष उनके अपने ही घर के एक कमरे से बरामद किया गया। लगातार परिजनों से संवाद बंद होने और लंबे समय तक कोई हलचल न दिखने के बाद जब पुलिस ने मकान में प्रवेश किया, तो वहां केवल कंकाल ही बचा मिला। यह घटना समाज में बढ़ रही एकाकी जिंदगी और उस खामोश त्रासदी को उजागर करती है, जिसने एक हंसते-खेलते परिवार को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
सौंदत्ती से शुरू हुआ सफर और पारिवारिक त्रासदी
दक्षायिनी का मूल निवास कर्नाटक के बेलगावी जिले के अंतर्गत आने वाले सौंदत्ती तालुक में था। कई साल पहले वह बेंगलुरु आ बसी थीं, लेकिन उनकी जिंदगी ने उस वक्त एक बेहद मुश्किल मोड़ लिया जब वर्ष 2005 में उनके इकलौते बेटे की अकाल मृत्यु हो गई। जवान बेटे के जाने का सदमा दक्षायिनी सहन नहीं कर सकीं और इसका सीधा असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा। बेटे के वियोग में उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया, जिसके बाद परिजनों ने उनके इलाज के प्रयास शुरू किए।
मानसिक स्थिति में गिरावट आने पर उन्हें इलाज के लिए बेंगलुरु और शिवमोग्गा के प्रमुख अस्पतालों में ले जाया गया था। वहां विशेषज्ञ चिकित्सकों ने उनकी जांच की और उन्हें स्किजोफ्रेनिया नामक गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित पाया। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए उन्हें एक पुनर्वास केंद्र में भी भर्ती कराया गया, जहां वह लगभग चार महीने तक चिकित्सकों की देखरेख में रहीं। हालांकि, गहन इलाज और रिहैब सेंटर में बिताए समय के बावजूद वह अपने जीवन के इस सबसे बड़े सदमे से पूरी तरह उबर नहीं पाई थीं।
पति के निधन के बाद पूरी तरह खत्म हुआ संपर्क
वर्ष 2017 में दक्षायिनी के जीवन पर दुखों का एक और पहाड़ टूटा, जब उनके पति का भी निधन हो गया। बेटे के बाद पति का साथ छूट जाने से वह अपने घर में बिल्कुल अकेली रह गईं। हवनूर लेआउट स्थित अपने मकान में रहने के दौरान धीरे-धीरे उन्होंने अपने रिश्तेदारों और सामाजिक ताने-बाने से दूरी बना ली। रिश्तेदारों और करीबियों के अनुसार, समय बीतने के साथ उनसे संपर्क साधना मुश्किल होता गया और पिछले करीब दो सालों से परिवार के किसी भी सदस्य की उनसे कोई बातचीत या मुलाकात नहीं हुई थी।
परिजनों से दो वर्षों तक बातचीत न होने के कारण किसी को यह अंदेशा तक नहीं हुआ कि बंद मकान के भीतर दक्षायिनी किस हाल में थीं। एकाकी जीवन बिताते हुए कब उनकी सांसें थम गईं, इसकी खबर किसी को नहीं लग सकी। मकान लगातार बंद रहने और बाहर कोई आवाजाही न होने की वजह से उनकी मौत की घटना लंबे समय तक एक रहस्य बनी रही।
7 अगस्त को बरामद हुए अवशेष और पुलिस की त्वरित कार्रवाई
इस दुखद मामले का खुलासा 7 अगस्त को हुआ, जब स्थानीय स्तर पर मिली सूचना के आधार पर पुलिस की एक टीम हवनूर लेआउट स्थित दक्षायिनी के घर पहुंची। बंद कमरे का दरवाजा खोलने के बाद पुलिस अधिकारियों को वहां एक महिला के कंकाल के अवशेष मिले। घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल मृतका के भाई महेश बसप्पा से संपर्क साधा और उन्हें पूरी स्थिति की जानकारी देकर मौके पर बुलाया।
महेश बसप्पा तुरंत घटनास्थल पर पहुंचे और उन्होंने अवशेषों के साथ मिले साक्ष्यों तथा परिस्थितियों के आधार पर उनकी पहचान अपनी बहन दक्षायिनी के रूप में की। पुलिस द्वारा की गई प्रारंभिक पूछताछ में महेश ने स्पष्ट किया कि उन्हें अपनी बहन की इस दुखद मृत्यु के पीछे किसी भी व्यक्ति पर कोई शक नहीं है। उन्होंने किसी के खिलाफ कोई शंका या शिकायत दर्ज नहीं कराई है।
बीएनएसएस की धारा 194 के तहत कानूनी प्रक्रिया शुरू
बेंगलुरु पुलिस ने मामले का संज्ञान लेते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 194 के तहत अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि कानून के मुताबिक आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा किया जा रहा है और उपलब्ध सबूतों के आधार पर विस्तृत जांच आगे बढ़ाई जा रही है। चूंकि परिवार के सदस्यों की तरफ से किसी साजिश या अपराध की आशंका व्यक्त नहीं की गई है, इसलिए पुलिस मृत्यु के सही समय और कारणों का पता लगाने के लिए फॉरेंसिक व अन्य तकनीकी पहलुओं की मदद ले रही है।
कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक जांच के साथ-साथ यह मामला एकाकीपन के उस खौफनाक पहलू को रेखांकित करता है, जहां अपनों को खोने के बाद मानसिक रूप से टूटी एक महिला दो साल तक अपने घर में मृत पड़ी रही और बाहरी दुनिया को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। पुलिस अब इस बात की सटीक समयसीमा निर्धारित करने में जुटी है कि दक्षायिनी का निधन वास्तव में किस तारीख को हुआ था।



















