कर्नाटक राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच चल रहा राजनीतिक विवाद अब एक नए मुकाम पर पहुंच गया है। राज्य कैबिनेट ने बृहस्पतिवार को एक विशेष विधेयक को अपनी स्वीकृति दे दी है, जिसके तहत सरकारी संपत्तियों और सार्वजनिक स्थलों के किसी भी उपयोग को कड़े नियमों के दायरे में लाया जाएगा। इस नए कानून के लागू होने के बाद राज्य सरकार की देखरेख में आने वाली किसी भी जगह, जमीन या परिसर में किसी भी प्रकार का सार्वजनिक आयोजन, सभा या कार्यक्रम करने से पूर्व सरकार से औपचारिक अनुमति प्राप्त करना पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया गया है।
प्रस्तावित विधेयक के मुख्य प्रावधान और दायरा
राज्य सरकार इस प्रस्तावित विधेयक को कर्नाटक विधानसभा के जारी मानसून सत्र में सदन के पटल पर प्रस्तुत करने की तैयारी में है। कानून का मुख्य उद्देश्य राज्य सरकार के नियंत्रण में आने वाले तमाम सार्वजनिक स्थलों के प्रबंधन और इस्तेमाल के लिए स्पष्ट नियम तय करना है। इस दायरे में सरकारी स्कूल, कॉलेज, खेल के मैदान, पार्क, सार्वजनिक सड़कें और जलाशयों के आसपास के क्षेत्र शामिल किए गए हैं। सरकार के अनुसार, इस कानून का प्राथमिक लक्ष्य 18 अक्टूबर 2025 को गृह विभाग द्वारा जारी किए गए एक विवादित स्टैंडिंग ऑर्डर को प्रतिस्थापित करना और सार्वजनिक संपत्तियों के प्रबंधन को व्यवस्थित रूप देना है।
अक्टूबर 2025 के पुराने आदेश और हाई कोर्ट की रोक की पृष्ठभूमि
इस पूरे मामले की जड़ें 18 अक्टूबर 2025 को गृह विभाग द्वारा जारी किए गए प्रशासनिक आदेश से जुड़ी हुई हैं। उस आदेश में यह प्रावधान किया गया था कि सरकारी संपत्तियों पर 10 से अधिक व्यक्तियों के किसी भी एकत्रण या जमावड़े के लिए पहले से मंजूरी लेना आवश्यक होगा। इस निर्देश को तुरंत अदालत में चुनौती दी गई थी, जिसके बाद कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट के इस कदम के बाद राज्य सरकार ने पुराने स्टैंडिंग ऑर्डर को वापस लेते हुए एक नया और व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करने का फैसला किया है।
आरएसएस के कार्यक्रमों और रूट मार्च पर संभावित प्रभाव
नया विधेयक कानून का रूप लेते ही राज्य सरकार को वे व्यापक अधिकार प्रदान कर देगा, जिनसे वह सरकारी संपत्तियों पर आयोजित होने वाले मार्च, रूट मार्च या अन्य गतिविधियों को विनियमित कर सकेगी या अनुमति देने से इनकार कर सकेगी। इसका सीधा असर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दैनिक और वार्षिक गतिविधियों पर पड़ सकता है, क्योंकि आरएसएस के कई प्रमुख कार्यक्रम, शाखाएं और रूट मार्च परंपरागत रूप से सार्वजनिक मैदानों तथा शैक्षणिक संस्थानों के परिसरों में ही आयोजित किए जाते रहे हैं। यही वजह है कि इस कदम को राजनीतिक गलियारों में बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
सरकार की सफाई: मंत्री संतोष लाड ने आरोपों को किया खारिज
कैबिनेट बैठक के बाद संवाददाताओं से बात करते हुए कर्नाटक के मंत्री संतोष लाड ने इस धारणा को पूरी तरह से नकार दिया कि यह विधेयक विशेष रूप से किसी एक संगठन को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकारी स्थानों के उपयोग को नियमबद्ध बनाना समय की मांग है। लाड ने स्पष्ट किया, "कोई भी संगठन जो सरकारी जगहों का इस्तेमाल करना चाहता है, उसे कुछ नियमों का पालन करना होगा।" उन्होंने सवाल उठाया कि जब बात सभी के लिए समान नियम बनाने की हो रही है, तो इसमें केवल एक संगठन का नाम क्यों घसीटा जा रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का तर्क: अनुच्छेद 19 के उल्लंघन का दावा
दूसरी ओर, कानूनी विशेषज्ञों और विपक्षी दल ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया है। अधिवक्ता गिरीश ने विधेयक की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए इसे मौलिक अधिकारों का हनन करार दिया। उनके अनुसार, यह प्रस्ताव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा दी गई स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन करता है। अधिवक्ता गिरीश ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, "यह बिल उस कागज के भी लायक नहीं है जिस पर इसे छापा गया है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि पुराने आदेश की तरह इस नए कानून को भी अदालत में चुनौती दी जाएगी और आरोप लगाया कि गृह मंत्री अपना अधिकांश समय केवल एक ही संगठन की चर्चा में बिताते हैं।
बीजेपी का आक्रामक रुख: राजनीतिक बदले की कार्रवाई का आरोप
भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस शासन पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि यह कानून विरोधी दलों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाना बनाने की एक राजनीतिक साजिश है। बीजेपी के प्रवक्ता जीएस प्रशांत ने दावा किया कि डीके शिवकुमार की सरकार अपनी प्रशासनिक विफलताओं और कुशासन से जनता का ध्यान भटकाने के लिए यह कदम उठा रही है। जीएस प्रशांत ने कहा, "गृह मंत्री प्रियांक खड़गे कांग्रेस सरकार के कुशासन से ध्यान हटाने के लिए आरएसएस को निशाना बनाना चाहते हैं।" उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आम नागरिकों के किसी संगठन के लिए पंजीकृत होना अनिवार्य नहीं है और सरकार केवल अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए विपक्ष को निशाना बना रही है।


















