अपना आशियाना खड़ा करना हर व्यक्ति के जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं और सपनों में शामिल होता है, लेकिन वर्तमान समय में निर्माण सामग्री और श्रम लागत के बढ़ते दामों ने इसे एक बड़ा आर्थिक फैसला बना दिया है. मकान की नींव से लेकर छत ढलने तक सीमेंट, बालू, सरिया और ईंट जैसी बुनियादी वस्तुओं पर एक भारी भरकम रकम खर्च होती है. इसके साथ ही निर्माण कार्य में लगे कुशल कारीगरों और मजदूरों का पारिश्रमिक भी कुल बजट को काफी प्रभावित करता है. निर्माण कार्य शुरू करने से पहले यदि आवश्यक सामग्रियों की मात्रा और उन पर आने वाले खर्च का स्पष्ट आकलन न हो, तो अक्सर योजनाएं बीच में ही बजट की कमी के कारण अटक जाती हैं. खासकर ईंटों की खपत को लेकर लोग असमंजस में रहते हैं कि तय क्षेत्रफल के मकान में कितने फेरे या कितनी संख्या में ईंटें मंगवानी पड़ेंगी.
1200 वर्ग फीट में 2 BHK ढांचे के लिए ईंटों का पैमाना
बिहार के जहानाबाद जिले स्थित घोसी बाजार निवासी बैजू कुमार, जो पिछले 11 वर्षों से राजमिस्त्री के पेशे में कार्यरत हैं और स्वतंत्र रूप से निर्माण ठेके भी लेते हैं, इस विषय पर व्यावहारिक अनुभव के आधार पर विस्तृत जानकारी देते हैं. उनका कहना है कि 1200 स्क्वायर फीट के दायरे में 2 बेडरूम, एक हॉल और एक किचन यानी 2 BHK का ढांचा खड़ा करने के लिए दीवारों की बनावट का विशेष ध्यान रखना होता है. यदि बाहरी परिधि की मुख्य दीवारों को 10 इंच मोटाई में तैयार कराया जाए और कमरों के विभाजन वाली भीतरी दीवारों को 5 इंच मोटाई में रखा जाए, तो इस पूरे निर्माण कार्य में लगभग 6 ट्रैक्टर ईंटों की खपत होती है. सामान्य माप के एक ट्रैक्टर ट्रॉली में करीब 1500 ईंटें लोड होकर आती हैं, जिसका सीधा अर्थ यह है कि इस आकार के मकान को तैयार करने के लिए कुल मिलाकर 9,000 ईंटों की व्यवस्था करनी होगी.
मौजूदा बाजार दर और कुल वित्तीय भार
जहानाबाद जिले की वर्तमान बाजार स्थितियों का हवाला देते हुए बैजू कुमार बताते हैं कि बेहतरीन गुणवत्ता यानी एक नंबर ईंट की एक ट्रैक्टर ट्रॉली, जिसमें 1500 ईंटें शामिल होती हैं, मंगवाने पर लगभग 15,000 रुपये का खर्च बैठता है. इस हिसाब से देखा जाए तो एक ईंट की सीधी कीमत 10 रुपये पड़ रही है. जब कोई व्यक्ति 1200 वर्ग फीट के लिए आवश्यक 6 ट्रैक्टर या 9,000 ईंटें एक साथ या चरणों में खरीदता है, तो केवल ईंटों की मद में ही कुल 90,000 रुपये की धनराशि खर्च हो जाती है. उनका कहना है कि मिट्टी की बढ़ती कीमतों, भट्ठे पर लगने वाले ईंधन और लगातार महंगी होती मजदूरी के कारण ईंटों के दाम पिछले कुछ समय में तेजी से चढ़े हैं, जिससे प्रति नग कीमत 10 रुपये के स्तर पर पहुंच गई है.
क्षेत्रफल, फिनिशिंग और कुल निर्माण लागत
बढ़ती महंगाई के समग्र प्रभाव पर चर्चा करते हुए बैजू कुमार एक अन्य महत्वपूर्ण तुलनात्मक आंकड़ा भी सामने रखते हैं. उनके आकलन के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति 600 वर्ग फीट के रकबे में केवल ढांचागत निर्माण कराता है और उसमें किसी भी प्रकार की फिनिशिंग का काम शामिल नहीं करता, तो न्यूनतम 7 लाख रुपये का खर्च अनिवार्य रूप से सामने आता है. वहीं, यदि उसी 600 वर्ग फीट के मकान को प्लास्टर, पेंट, फर्श और अन्य फिनिशिंग सुविधाओं के साथ पूरी तरह रहने योग्य तैयार कराया जाए, तो यह लागत बढ़कर 12 लाख रुपये तक पहुंच जाती है. इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में जमीन की कीमतें भी लाखों रुपये में होती हैं, जहां अक्सर जितनी रकम जमीन खरीदने में खर्च होती है, उतनी ही रकम निर्माण पर लग जाती है, जिसके परिणामस्वरूप जीवन भर की बचत का एक बहुत बड़ा हिस्सा आवास जुटाने में लग जाता है.



















