अमेरिकी सीनेट में पारित एक नए विधायी प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हलचल मचा दी है। रूस से रियायती दर पर कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर नकेल कसने के मकसद से तैयार किए गए इस कानून का सीधा असर भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातकों पर पड़ सकता है। हालांकि इस समय भारत के आयात पर 100 प्रतिशत का कोई अतिरिक्त शुल्क प्रभावी नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिकी संसद की हालिया गतिविधियों ने भविष्य के कारोबारी समीकरणों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
ब्रिक्स मंच की गर्मजोशी और वाशिंगटन की चिंताएं
हाल के दिनों में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के बीच कूटनीतिक नजदीकी साफ तौर पर नजर आई थी। इस मंच पर भारत, चीन और रूस के बीच बढ़ते समन्वय के अलावा ईरान के साथ भारत के संवाद ने भी वैश्विक स्तर पर सबका ध्यान खींचा। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाला प्रशासन इन भू-राजनीतिक गतिविधियों और ऊर्जा समझौतों पर बारीकी से नजर रखे हुए है। वाशिंगटन में इन त्रिपक्षीय वार्ताओं और निरंतर ऊर्जा व्यापार को लेकर नीतिगत स्तर पर असहजता महसूस की जा रही है।
सीनेट में पारित हुआ ग्राहम विधेयक
रूसी तेल पर निर्भरता को निशाना बनाने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के दिवंगत सांसद लिंडसे ओ ग्राहम के नाम पर सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026 तैयार किया गया है। अमेरिकी सांसदों के बीच इस विधेयक पर लंबी चर्चा के बाद सीनेट ने इसे 86 के मुकाबले 11 मतों के भारी अंतर से अपनी मंजूरी दे दी। सीनेट की हरी झंडी मिलने के बाद अब इस पूरे मसौदे को प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में विचार-विमर्श और मतदान के लिए भेजा गया है।
100 प्रतिशत टैरिफ का कड़ा प्रावधान
इस प्रस्तावित कानून में बेहद सख्त आर्थिक दंड शामिल किए गए हैं। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, जो भी देश रूस से कच्चे तेल का आयात लगातार जारी रखेंगे, उन पर 100 प्रतिशत तक का अतिरिक्त आयात शुल्क थोपा जा सकता है। चूंकि भारत अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है, इसलिए यदि यह विधेयक प्रतिनिधि सभा से पारित होकर कानून बनता है, तो भारतीय निर्यात और दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।



















