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झारखंड का पारंपरिक व्यंजन: ₹20 में मिलता है सेहत और स्वाद से भरपूर 'मुर्गा पीठा'जीवनशैली
8 जुल॰ 2026, 11:21 am (45 दिन पहले)· 2

झारखंड का पारंपरिक व्यंजन: ₹20 में मिलता है सेहत और स्वाद से भरपूर 'मुर्गा पीठा'

झारखंड के ग्रामीण अंचलों का मशहूर 'मुर्गा पीठा' अरवा चावल और चिकन के अनोखे मेल से बनता है। यह पारंपरिक व्यंजन अपनी पौष्टिकता और किफायती दाम के लिए जाना जाता है।

झारखंड राज्य की पहचान केवल यहां के विहंगम प्राकृतिक दृश्यों और समृद्ध आदिवासी संस्कृति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां का पारंपरिक खानपान भी दुनिया भर में अपनी विशिष्ट जगह रखता है। राज्य के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ऐसे कई व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जो न केवल स्वाद में लाजवाब होते हैं बल्कि पोषक तत्वों से भी भरपूर होते हैं। इन्हीं में से एक बेहद लोकप्रिय व्यंजन 'मुर्गा पीठा' है, जिसे गांवों में लोग बहुत पसंद करते हैं। विशेष रूप से हाट-बाजारों, मेलों और विभिन्न त्योहारों के अवसर पर इसकी मांग कई गुना बढ़ जाती है। अपनी किफायती कीमत और शानदार स्वाद के चलते यह हर वर्ग की पहली पसंद बना हुआ है।

तैयारी की अनूठी विधि

मुर्गा पीठा को बनाने की प्रक्रिया काफी धैर्य और कुशलता की मांग करती है। इसकी शुरुआत अरवा चावल को अच्छी तरह साफ करके भिगोने से होती है। चावल को भिगोने के बाद इसे पीसकर एक मुलायम और चिकना आटे जैसा मिश्रण तैयार किया जाता है। दूसरी तरफ, चिकन के छोटे-छोटे टुकड़े किए जाते हैं। इन टुकड़ों में हल्दी, नमक, ताजी लहसुन, अदरक और अन्य देसी मसालों का मिश्रण मिलाया जाता है। ये मसालेदार चिकन ही इस डिश का मुख्य आकर्षण और जान माने जाते हैं, जो इसे अन्य पीठा किस्मों से अलग करते हैं।

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साल के पत्तों में भाप का जादू

जब चावल का घोल और चिकन का मसाला पूरी तरह तैयार हो जाता है, तब इसे पकाने के लिए एक पारंपरिक तकनीक का उपयोग किया जाता है। इन सामग्रियों को साल के पत्तों में लपेटा जाता है। साल के पत्तों की विशिष्ट खुशबू और उनके प्राकृतिक औषधीय गुण इस व्यंजन के स्वाद को कई गुना बढ़ा देते हैं। पत्ते में लपेटने के बाद इन्हें भाप में पकाया जाता है। धीमी आंच पर भाप में पकने के कारण चावल और चिकन के फ्लेवर आपस में मिल जाते हैं, जिससे एक अनूठा और लाजवाब स्वाद उभर कर आता है।

लोक संस्कृति और सेहत का मेल

ग्रामीण इलाकों में मुर्गा पीठा महज एक भोजन नहीं है, बल्कि यह वहां की परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। गांवों में लगने वाली साप्ताहिक हाट और मेलों में लोग अपने दोस्तों और परिवार के साथ बैठकर इसका आनंद लेते हैं। यह व्यंजन विशेष अवसरों पर घर की रसोई में भी प्रमुखता से बनाया जाता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी इसमें तेल और मसालों का कम उपयोग होना है, जो इसे फास्ट फूड के मुकाबले एक स्वास्थ्यवर्धक विकल्प बनाता है।

वर्तमान समय में जब खानपान में फास्ट फूड का प्रभाव बढ़ रहा है, मुर्गा पीठा लोगों को एक देसी और हेल्दी विकल्प प्रदान करता है। चावल से मिलने वाली ऊर्जा और चिकन से प्राप्त होने वाला प्रोटीन इसे एक संतुलित भोजन बनाता है। यही कारण है कि अब शहरी क्षेत्रों के लोग भी इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसकी सबसे आकर्षक बात इसकी कीमत है। बाजारों में एक बड़ा मुर्गा पीठा मात्र ₹20 में मिल जाता है, जिसे खाने के बाद पेट भर जाता है। कम खर्चे में परंपरा और स्वाद का संगम चखना हो, तो मुर्गा पीठा का अनुभव जरूर लेना चाहिए।

सवाल-जवाब

मुर्गा पीठा क्या है?
मुर्गा पीठा झारखंड का एक पारंपरिक व्यंजन है जो अरवा चावल के घोल और मसालेदार चिकन के मिश्रण से तैयार किया जाता है।
इसे कैसे पकाया जाता है?
इस व्यंजन को साल के पत्तों में लपेटकर भाप में पकाया जाता है, जिससे पत्ते की खुशबू इसमें समा जाती है।
मुर्गा पीठा की कीमत क्या है?
बाजारों और हाटों में एक मुर्गा पीठा की कीमत आमतौर पर ₹20 के आसपास होती है।
क्या यह स्वस्थ है?
जी हां, इसमें तेल और मसालों का उपयोग काफी कम होता है और यह चावल तथा चिकन से भरपूर होने के कारण पौष्टिक माना जाता है।
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