गुलाबी नगरी जयपुर का चौड़ा रास्ता और चारदीवारी इलाका अपने शानदार बाजारों और परंपरागत खानपान के कारण देश-दुनिया में जाना जाता है। यहां खरीदारी के साथ-साथ हर गली-बाजार में किसी न किसी खास जायके की महक बसी मिलती है, जिसे लोगों ने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संजोकर रखा है। यूं तो शहर में कचौरी बेचने वाली सैकड़ों दुकानें मौजूद हैं, जहां लोग चटपटी कचौरियों का लुत्फ उठाते हैं, मगर कुछ कचौरियां ऐसी भी हैं जिनका स्वाद लेने के लिए लोग दूर-दराज से खिंचे चले आते हैं। ऐसी ही एक मशहूर जगह है चारदीवारी क्षेत्र में अजमेरी गेट पर बना राष्ट्रीय मिष्ठान भंडार, जो अपनी खास जीमण की कचौरी के लिए पूरे जयपुर में पहचाना जाता है।
राष्ट्रीय मिष्ठान भंडार के संचालक महेश अग्रवाल ने बातचीत में बताया कि जीमण की इस अनूठी कचौरी की नींव वर्ष 1951 में उनके दादाजी मदनलाल अग्रवाल ने रखी थी। शुरुआत में उन्होंने इसे राजस्थानी ज्योनार यानी जीमण के मेन्यू का हिस्सा बनाया था। इसके बाद यह कचौरी जयपुर की शादियों और दूसरे समारोहों में खूब पसंद की जाने लगी। धीरे-धीरे इस खास गोल कचौरी को दुकान पर भी तैयार किया जाने लगा। आज 70 साल से ज्यादा का वक्त गुजर जाने के बावजूद इसका जायका बिल्कुल पहले जैसा ही बना हुआ है।
70 साल पुराने जायके के आज भी दीवाने हैं लोग
महेश अग्रवाल कहते हैं कि गोल आकार की कचौरी के रूप में गुजराती कचौरी की खूब प्रसिद्धि है, लेकिन उनकी यह खास कचौरी बिल्कुल अलग ढंग से बनाई जाती है। इसे बनाने के लिए दाल को पहले पूरे 12 घंटे तक भिगोकर रखा जाता है, ताकि मसालों का स्वाद उसमें भीतर तक रच-बस जाए। इस कचौरी की सबसे बड़ी विशेषता इसमें पड़ने वाले 18 तरह के खड़े मसाले हैं, जो इसे बाकी सबसे जुदा और लाजवाब स्वाद देते हैं।
उन्होंने बताया कि आम कचौरी और जीमण की इस गोल कचौरी के बीच सबसे बड़ा फर्क इसके मसाले का है। इसके भीतर भरा जाने वाला मसाला सूखा होता है, इसी वजह से यह कचौरी 1 से 2 दिन तक खराब नहीं होती। यही कारण है कि लोग दूर-दूर से इसका स्वाद चखने आते हैं। शादी-ब्याह जैसे आयोजनों के लिए भी इस कचौरी के बड़े-बड़े ऑर्डर मिलते रहते हैं। कचौरी के अलावा राष्ट्रीय मिष्ठान भंडार अपने उम्दा लड्डुओं और मिठाइयों के लिए भी खासा मशहूर है।
1 आने से 22 रुपये तक पहुंची कचौरी की कीमत
महेश अग्रवाल बताते हैं कि आज इस स्वाद की विरासत को उनकी तीसरी पीढ़ी आगे बढ़ा रही है। अगर दाम की बात करें तो उनके दादाजी के दौर में इस कचौरी की कीमत महज 1 आना हुआ करती थी। उस जमाने में अगर कोई ग्राहक 4 आने की कचौरी खरीदता था तो उसे एक कचौरी मुफ्त में दे दी जाती थी। आज इसी खास जीमण की कचौरी की कीमत 22 रुपये है, जिसे ग्राहक इसके बेमिसाल स्वाद के सामने पूरी तरह वाजिब मानते हैं। उन्होंने बताया कि पूरे जयपुर में इस तरह की जीमण की कचौरी सिर्फ उन्हीं की दुकान पर बनती है। यही वजह है कि आज भी यहां ऐसे कई ग्राहक पहुंचते हैं, जो उनके दादा और पिता के समय से लगातार इस कचौरी का स्वाद लेते आ रहे हैं।













