उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद शहर में पान के दीवानों के बीच कविनगर का एक ठिकाना दशकों से बेहद खास बना हुआ है। यहां सुबह दुकान का शटर उठने से पहले ही सड़क पर लग्जरी गाड़ियों की कतारें लग जाती हैं। कारों में बैठे लोग सब्र के साथ दुकान खुलने की राह देखते हैं और अपनी पसंद का खास बीड़ा लगवाकर ही अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं। चार दशकों से भी ज्यादा समय से यह स्थान सिर्फ एक दुकान नहीं, बल्कि शहर की सुबह की दिनचर्या का अहम पड़ाव बन चुका है।
सड़क किनारे 15 पैसे के पान से हुई थी शुरुआत
इस प्रतिष्ठित दुकान की नींव साल 1980 में रखी गई थी। दुकान के संचालक अरुण सिंघल ने अपने काम का आगाज किसी आलीशान शोरूम या बड़ी दुकान से नहीं, बल्कि फुटपाथ पर बैठकर किया था। उस दौर में वह महज 15 पैसे में एक पान बनाकर बेचते थे। उस शुरुआती दौर में शायद ही किसी ने यह कल्पना की होगी कि सड़क की पटरी पर रखा वह छोटा सा संदूक एक दिन पूरे गाजियाबाद में शोहरत की मिसाल बन जाएगा। वक्त के साथ अरुण सिंघल के हाथों का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ता गया और ग्राहकों का कारवां लगातार बड़ा होता चला गया।
कारोबारियों से लेकर नौकरीपेशा लोगों का रोज का ठिकाना
आज 46 साल बीत जाने के बाद भी यहां आने वाले ग्राहकों का लगाव जस का तस बना हुआ है। शहर के जाने-माने व्यापारी, दफ्तर जाने वाले नौकरीपेशा लोग और समाज के कई प्रतिष्ठित नागरिक यहां रोजाना नियमित तौर पर हाजिरी लगाते हैं। कई नियमित ग्राहक ऐसे हैं जो अपने दफ्तर या व्यापारिक प्रतिष्ठान की शुरुआत करने से पहले यहां आकर पान का स्वाद लेना अपनी दैनिक आदत मानते हैं। वहीं कुछ शौकीन हफ्ते के तय दिनों पर विशेष रूप से यहां पहुंचते हैं। ग्राहकों का कहना है कि उन्हें यहां सिर्फ पान का लजीज स्वाद ही नहीं खींचता, बल्कि चार दशकों के लंबे सफर में बना गहरा अपनापन और आत्मीय व्यवहार भी जोड़कर रखता है।
युवा पीढ़ी में भी क्रेज, पूजा और सगाई के लिए खास मांग
इस दुकान की लोकप्रियता सिर्फ पुरानी पीढ़ी तक सीमित नहीं रही है, बल्कि आज के युवा भी इस स्वाद के मुरीद हो चुके हैं। सुबह के वक्त से लेकर दिन ढलने तक यहां ग्राहकों का आना-जाना बिना रुके चलता रहता है। दुकान के मेन्यू में हर मिजाज और पसंद के हिसाब से कई किस्में उपलब्ध हैं। यहां देसी सादा, देसी तंबाकू, देसी मीठा, बनारसी सादा, बनारसी मीठा और स्पेशल मीठा पान ग्राहकों के लिए खास तौर पर तैयार किया जाता है। कीमतों की बात करें तो यहां पान की शुरुआत 25 रुपये से होती है और सबसे खास वैरायटी 180 रुपये तक में बिकती है। इनमें से स्पेशल मीठे पान का उपयोग लोग घरों में पूजा-पाठ, सगाई समारोह और अन्य शुभ मांगलिक अवसरों के लिए भी बड़े पैमाने पर करते हैं।
ग्राहक की पसंद के मुताबिक बीड़ा लगाने की कला
पान लगाने का अंदाज पूरी तरह से ग्राहक की व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता है। ताजे और चुने हुए पान के पत्ते पर सबसे पहले कत्था और चूना लगाया जाता है। इसके उपरांत ग्राहक की मांग के अनुसार सुगंधित इलायची, बारीक कटी सुपारी और अन्य पारंपरिक मसाले डाले जाते हैं। अरुण सिंघल के काम की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्हें वर्षों से आ रहे अपने नियमित ग्राहकों की खास पसंद जबानी याद रहती है। ग्राहक के सामने आते ही वह उनकी रूचि के अनुसार सटीक सामग्री वाला पान बनाकर थमा देते हैं, जिससे ग्राहकों का भरोसा हमेशा अटूट बना रहता है।

















