मकान की नींव रखने से लेकर छत ढलने तक हर व्यक्ति का प्रयास यही रहता है कि उसका घर पीढ़ियों तक मजबूती से टिका रहे। इसके लिए सरिया, बालू और सीमेंट के ब्रांड की तो लोग गहराई से पड़ताल करते हैं, लेकिन निर्माण की सबसे बुनियादी इकाई यानी ईंटों के चयन में अक्सर लापरवाही बरत दी जाती है। ईंटों की गुणवत्ता में की गई थोड़ी सी भी चूक आगे चलकर दीवारों में दरारें पड़ने और सीलन आने का बड़ा कारण बन जाती है। बाजार में कई किस्म की ईंटें उपलब्ध रहती हैं, जिन्हें अव्वल, दोयम, तृतीय श्रेणी या झामा जैसे नामों से बेचा जाता है। ऐसे में मकान मालिक के लिए यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि कौन सी ईंट किस हिस्से के लिए उपयुक्त है और उसकी वास्तविक मजबूती कैसे आंकी जाए।
राजमिस्त्री प्रदीप वर्मा बताते हैं कि घर की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए ईंट की गुणवत्ता की सही परख होना अनिवार्य है। ग्रामीण इलाकों में सबसे टिकाऊ और बेहतरीन ईंट को अव्वल ईंट या मजबूत ईंट कहा जाता है। प्रदीप वर्मा के अनुसार केवल बाहरी रंग देखकर ईंट की गुणवत्ता तय नहीं की जा सकती। ईंट का सटीक आकार, भट्ठे में उसकी पकाई का स्तर और उसकी वास्तविक मजबूती ही उसकी असली श्रेणी तय करती है। इसके अलावा वे स्पष्ट करते हैं कि अकेले अच्छी ईंट से ही घर मजबूत नहीं बनता, बल्कि उसके साथ मजबूत नींव, बालू और सीमेंट के मसाले का सही अनुपात तथा दीवारों की समय पर तराई भी उतनी ही आवश्यक प्रक्रियाएं हैं।
निर्माण में उपयोग होने वाली ईंटों की प्रमुख श्रेणियां
भट्ठे में पकाई और मिट्टी की बनावट के आधार पर ईंटों को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। निर्माण बाजार में आमतौर पर अव्वल, दोयम, तृतीय श्रेणी, कच्ची ईंट, झामा ईंट और खराब गुणवत्ता वाली ईंटों का वर्गीकरण देखने को मिलता है। स्थानीय स्तर पर इनके क्षेत्रीय नाम थोड़े भिन्न हो सकते हैं, इसलिए केवल विक्रेता द्वारा बताए गए नाम पर भरोसा न करके ईंट की भौतिक स्थिति की जांच करना सुरक्षित रहता है।
अव्वल ईंट की पहचान और दीवार निर्माण में इसकी भूमिका
अव्वल ईंट को निर्माण कार्य में सर्वोत्तम दर्जा दिया जाता है। यह भट्ठे में तय तापमान पर पूरी तरह से पकी हुई होती है और इसकी बनावट काफी ठोस होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे आम बोलचाल में मजबूत ईंट भी पुकारते हैं। इस श्रेणी की ईंटों का आकार पूरी तरह मानक और एक समान होता है। इसके कोने और किनारे एकदम नुकीले, सीधे और सटीक बने होते हैं।
अव्वल ईंट में किसी प्रकार की गहरी दरारें या किनारे से टूटने-फूटने की खामियां नहीं होतीं। घर की मुख्य और लोड उठाने वाली दीवारों के निर्माण के लिए हमेशा इसी उच्च श्रेणी की ईंट का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। खरीदारी के दौरान यह ध्यान रखना जरूरी है कि ईंट छूने पर भुरभुरी न हो और उसकी बाहरी सतह पर किसी प्रकार के नमक जैसे सफेद धब्बे दिखाई न दे रहे हों।
दोयम और तृतीय श्रेणी की ईंटों की विशेषताएं
दोयम ईंट को गुणवत्ता के पैमाने पर अव्वल ईंट से कम आंका जाता है। इसकी पकाई, आंतरिक मजबूती और बाहरी माप में अव्वल की तुलना में अंतर देखा जाता है। कई मामलों में दोयम ईंटों के किनारे थोड़े टेढ़े-मेढ़े हो सकते हैं और उनका आकार एक समान नहीं रहता। इनका उपयोग गैर-जरूरी या कम भार वाले ढांचों में किया जाता है।
वहीं तृतीय श्रेणी की ईंटों में पकाई और मजबूती की दृष्टि से अधिक कमियां पाई जाती हैं। भट्ठे में कम पकी होने के कारण ये ईंटें मौसम की मार जल्दी झेल नहीं पातीं और पानी का असर इन पर तेजी से पड़ता है, जिससे ये जल्दी खराब हो सकती हैं। मकान के महत्वपूर्ण और मुख्य हिस्सों में इन्हें लगाने से पहले पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए। तृतीय श्रेणी की ईंट का उपयोग कहां और कैसे करना है, यह पूरी तरह निर्माण की जरूरत और ईंट की वास्तविक दशा पर निर्भर करता है।
कच्ची ईंट, झामा और खराब ईंटों का अंतर समझें
कच्ची ईंट और भट्ठे में अग्नि से पकाई गई पक्की ईंट के बीच भारी तकनीकी अंतर होता है। कच्ची ईंट को केवल मिट्टी को सांचे में ढालकर धूप में सुखाया जाता है, उसे भट्ठे के ऊंचे तापमान में पकाया नहीं जाता। इस कारण कच्ची ईंट की भार सहने की क्षमता और नमी से मुकाबला करने की ताकत पक्की ईंट से एकदम भिन्न होती है। इनका उपयोग पारंपरिक मिट्टी के मकानों और कुछ विशिष्ट निर्माण कार्यों तक ही सीमित रहता है।
झामा ईंट की बात करें तो यह भट्ठे के भीतर अत्यधिक तापमान की वजह से जरूरत से ज्यादा पक जाती है। अधिक गर्मी मिलने के कारण ईंट का आकार बिगड़ जाता है या वह आपस में जुड़कर टुकड़ों में टूट जाती है। इस विकृत और टूटी हुई सामग्री को ही झामा कहा जाता है। इनका उपयोग सामान्य समतल ईंटों की तरह नियमित दीवारें बनाने में नहीं किया जा सकता। इसके अलावा खराब गुणवत्ता वाली ईंटें, जिन्हें कुछ इलाकों में खारिया या अन्य क्षेत्रीय नामों से पुकारा जाता है, पकाई, आकार, बाहरी सतह और मजबूती के हर पैमाने पर घटिया साबित होती हैं।
ईंट खरीदते समय ध्यान रखने योग्य सावधानियां
घर बनाने के लिए ईंट की खेप मंगवाते समय केवल नाम पर विश्वास करने के बजाय उसके भौतिक गुणों का परीक्षण स्वयं करें। ईंट में कोई बड़ी दरार नहीं होनी चाहिए, वह छूने पर हाथ से रेत की तरह न झड़ती हो और उस पर सफेद क्षारीय लवण के निशान न हों। अव्वल ईंट का चयन दीवारों के लिए सबसे मुफीद होता है, जबकि दोयम ईंट का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार किया जा सकता है। मकान की संपूर्ण उम्र सुनिश्चित करने के लिए ईंट के साथ-साथ मजबूत नींव, सही सीमेंट-मसाला और पर्याप्त तराई का ध्यान जरूर रखें।


















