चाय के साथ बनाएं कुरकुरा आलू चूड़ा फ्राई, मिनटों में तैयार होगा टेस्टी स्नैकबजट एसयूवी सेगमेंट में भारतीय परिवारों की पहली पसंद बनी ये दस गाड़ियां, सनरूफ और छह एयरबैग के साथ बेहतरीन ईंधन दक्षताबकरियों के गले में बंधी लकड़ी की घंटी से गूंजते हैं जंगल, सरगुजा के बुजुर्ग ने जीवित रखी पुरखों की कलाद्वारका एक्सप्रेसवे पर डिवाइडर से टकराकर उड़ी तेज रफ्तार स्कोडा, ग्रीन बेल्ट में पलटने से चालक की हालत नाजुकदक्खिन की पावन धरती पर स्फटिक से शिवलिंग तराशने का नायाब हुनर, जानिए कैसे आकार लेता है यह पावन स्वरूपडाकघर की पीएलआई योजना से युवा तैयार कर सकते हैं 31 लाख से अधिक का फंड, सुरक्षित भविष्य के लिए मिलेंगे कई लाभस्मार्टफोन खरीदारी और रिपेयरिंग का बड़ा केंद्र बना शाह मार्केट, आसपास के जिलों से उमड़ रहे खरीदारपश्चिम एशिया संघर्ष की चपेट में आए भारतीय नागरिक, समुद्र और हवाई अड्डे पर हुए हमलों में एक की जान गई व दो लापताविदेशी निवेशकों ने अक्टूबर में बेचे 44,166 करोड़ रुपये के शेयर, 2026 में कुल बिकवाली 3.04 लाख करोड़ के पाररूस और यूक्रेन के बीच ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने के समझौते से कच्चे तेल में फिसलन, डब्ल्यूटीआई 90 डॉलर के करीब
बकरियों के गले में बंधी लकड़ी की घंटी से गूंजते हैं जंगल, सरगुजा के बुजुर्ग ने जीवित रखी पुरखों की कलाछत्तीसगढ़
12 अक्तू॰ 2026, 12:00 pm (1 घंटे पहले)· 1

बकरियों के गले में बंधी लकड़ी की घंटी से गूंजते हैं जंगल, सरगुजा के बुजुर्ग ने जीवित रखी पुरखों की कला

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में एक चरवाहे ने आधुनिक धातु की घंटियों के बजाय पिपरेल की लकड़ी से तराशी गई पारंपरिक घंटी का इस्तेमाल जारी रखा है, जिससे जंगल में भटकने वाली बकरियों की पहचान आसानी से हो सके।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण अंचल बंदना में मवेशी पालन की एक सदियों पुरानी अनूठी व्यवस्था आज भी दैनिक जीवन का हिस्सा बनी हुई है। यहां बकरियों के गले में लोहे या पीतल के बने आधुनिक घंटे लटकाने के बजाय हाथ से तराशी गई लकड़ी की घंटी बांधी जाती है। बंदना के बुजुर्ग पशुपालक सौभनाथ अपनी बकरी के गले में लकड़ी का यह घंटा बांधकर चराने निकलते हैं। जब बकरियों का झुंड घने जंगलों में चरने के लिए पहुंचता है, तो झाड़ियों के बीच किसी भी जानवर के बिछड़ने या रास्ता भटकने का जोखिम हमेशा बना रहता है। ऐसी परिस्थिति में लकड़ी से निकलने वाली प्राकृतिक और विशिष्ट गूंज चरवाहों को अपने झुंड की सही स्थिति जानने में मदद करती है।

लकड़ी तराशने की पारंपरिक शिल्पकला

इस घंटी को तैयार करने का तरीका बेहद श्रमसाध्य और स्थानीय कारीगरी से जुड़ा हुआ है। सौभनाथ के अनुसार, बकरी के गले में लटकने वाले इस घंटे को बनाने के लिए विशेष रूप से पिपरेल की लकड़ी का चयन किया जाता है। पिपरेल की लकड़ी को काटकर पहले आवश्यक नाप में ढाला जाता है और फिर उसे बारीक औजारों से तराशा जाता है। एक चौकोर घंटी तैयार करने की पूरी प्रक्रिया में दो से तीन दिन का लंबा वक्त लग जाता है। लकड़ी को बाहर से सटीक चौकोर आकार देने के बाद उसके भीतरी हिस्से को गहराई से खोखला किया जाता है, ताकि भीतर ध्वनि पैदा करने के लिए पर्याप्त खाली जगह बन सके। इसके साथ ही घंटे के ऊपरी हिस्से में रस्सी या डोरी पिरोने के लिए सावधानीपूर्वक छेद बनाया जाता है।

ये भी पढ़ें

जंगलों में झुंड की पहचान का आसान साधन

ग्रामीण जीवन में इस लकड़ी के घंटे की उपयोगिता सीधे तौर पर पशुओं की सुरक्षा से जुड़ी हुई है। जब कई बकरियां एक साथ वन क्षेत्र में चरने जाती हैं, तो बकरियों के अलग दिशा में भटक जाने का अंदेशा लगातार रहता है। खोखली पिपरेल की लकड़ी से जो ध्वनि निकलती है, वह धातु की तीखी आवाज से बिल्कुल अलग, साफ और गूंजदार होती है। सौभनाथ का कहना है कि उन्होंने फिलहाल अपनी एक बकरी के गले में यह लकड़ी का घंटा बांध रखा है। इस घंटी की आवाज पहचानकर चरवाहा घनी हरियाली के बीच दूर से ही समझ जाता है कि उसकी बकरी किस दिशा में चर रही है और किसी भटकी हुई बकरी को खोजना आसान हो जाता है।

पुरखों से सीखी धरोहर को सहेजने का जज्बा

सौभनाथ ने लकड़ी से घंटा बनाने का यह हुनर किसी औपचारिक प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को काम करते हुए देखकर सीखा है। उनके बुजुर्ग भी इसी पद्धति से पिपरेल की लकड़ी को तराशकर मवेशियों के लिए घंटियां बनाते थे और उन्हें बकरियों के गले में पहनाया करते थे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह विद्या अब बाजार में आसानी से मिलने वाली पीतल और लोहे की घंटियों के चलते कम ही दिखाई देती है। इसके बावजूद, बंदना गांव में सौभनाथ अपने पुरखों की इस विरासत को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।

स्थानीय संसाधनों और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का उदाहरण

बाजार में हर तरह के आधुनिक उत्पाद सुलभ होने के दौर में भी अपने आस-पास मिलने वाली लकड़ी से उपयोगी उपकरण तैयार करना ग्रामीण आत्मनिर्भरता की गहरी समझ को दर्शाता है। सरगुजा के ग्रामीण परिवेश से सामने आई यह तस्वीर यह सिद्ध करती है कि आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव के बीच भी कुछ लोग अपनी जड़ों, पुरानी पद्धतियों और पारंपरिक ज्ञान को केवल यादों में समेटने के बजाय वास्तविकता में जिंदा रखे हुए हैं।

सवाल-जवाब

बकरी के गले में लकड़ी की घंटी बांधने की यह परंपरा कहां की है?
यह परंपरा छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाके बंदना की है, जहां बुजुर्ग पशुपालक सौभनाथ इसे अपनाए हुए हैं।
लकड़ी का यह घंटा बनाने में किस पेड़ की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है?
इस पारंपरिक घंटे को तैयार करने के लिए विशेष रूप से पिपरेल की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है।
लकड़ी की एक घंटी तैयार करने में कितना समय लगता है?
लकड़ी को तराशने, उसे चौकोर आकार देने और भीतर से खोखला करने में लगभग दो से तीन दिन का समय लग जाता है।
बकरियों के गले में यह लकड़ी का घंटा क्यों बांधा जाता है?
जंगलों में चराने के दौरान बकरियां झुंड से भटक न जाएं, इसलिए यह घंटा बांधा जाता है ताकि उसकी आवाज से उनका पता लगाया जा सके।
सौभनाथ ने लकड़ी का घंटा बनाने की यह कला कहां से सीखी?
उन्होंने यह पारंपरिक कला किसी औपचारिक जगह से नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को काम करते हुए देखकर सीखी है।
लकड़ी के इस घंटे की बनावट कैसी होती है?
यह घंटा चौकोर आकार का होता है, जिसे भीतर से खोखला किया जाता है और डोरी डालने के लिए उसमें छेद बनाया जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·26 मिनट पहले

बचपन में गाँव जाता था तो ऐसे ही लकड़ी की घंटियों की आवाज़ गूंजती थी। अब तो सब जगह पीतल वाले डिब्बे बिकने लगे हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·26 मिनट पहले

रोहन जी, बात तो सही है। अब तो हर जगह वही मशीन से बनी पीतल की घंटियाँ ही दिखती हैं, पुरखों की यह कारीगरी सचमुच गायब सी हो गई है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp