छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण अंचल बंदना में मवेशी पालन की एक सदियों पुरानी अनूठी व्यवस्था आज भी दैनिक जीवन का हिस्सा बनी हुई है। यहां बकरियों के गले में लोहे या पीतल के बने आधुनिक घंटे लटकाने के बजाय हाथ से तराशी गई लकड़ी की घंटी बांधी जाती है। बंदना के बुजुर्ग पशुपालक सौभनाथ अपनी बकरी के गले में लकड़ी का यह घंटा बांधकर चराने निकलते हैं। जब बकरियों का झुंड घने जंगलों में चरने के लिए पहुंचता है, तो झाड़ियों के बीच किसी भी जानवर के बिछड़ने या रास्ता भटकने का जोखिम हमेशा बना रहता है। ऐसी परिस्थिति में लकड़ी से निकलने वाली प्राकृतिक और विशिष्ट गूंज चरवाहों को अपने झुंड की सही स्थिति जानने में मदद करती है।
लकड़ी तराशने की पारंपरिक शिल्पकला
इस घंटी को तैयार करने का तरीका बेहद श्रमसाध्य और स्थानीय कारीगरी से जुड़ा हुआ है। सौभनाथ के अनुसार, बकरी के गले में लटकने वाले इस घंटे को बनाने के लिए विशेष रूप से पिपरेल की लकड़ी का चयन किया जाता है। पिपरेल की लकड़ी को काटकर पहले आवश्यक नाप में ढाला जाता है और फिर उसे बारीक औजारों से तराशा जाता है। एक चौकोर घंटी तैयार करने की पूरी प्रक्रिया में दो से तीन दिन का लंबा वक्त लग जाता है। लकड़ी को बाहर से सटीक चौकोर आकार देने के बाद उसके भीतरी हिस्से को गहराई से खोखला किया जाता है, ताकि भीतर ध्वनि पैदा करने के लिए पर्याप्त खाली जगह बन सके। इसके साथ ही घंटे के ऊपरी हिस्से में रस्सी या डोरी पिरोने के लिए सावधानीपूर्वक छेद बनाया जाता है।
जंगलों में झुंड की पहचान का आसान साधन
ग्रामीण जीवन में इस लकड़ी के घंटे की उपयोगिता सीधे तौर पर पशुओं की सुरक्षा से जुड़ी हुई है। जब कई बकरियां एक साथ वन क्षेत्र में चरने जाती हैं, तो बकरियों के अलग दिशा में भटक जाने का अंदेशा लगातार रहता है। खोखली पिपरेल की लकड़ी से जो ध्वनि निकलती है, वह धातु की तीखी आवाज से बिल्कुल अलग, साफ और गूंजदार होती है। सौभनाथ का कहना है कि उन्होंने फिलहाल अपनी एक बकरी के गले में यह लकड़ी का घंटा बांध रखा है। इस घंटी की आवाज पहचानकर चरवाहा घनी हरियाली के बीच दूर से ही समझ जाता है कि उसकी बकरी किस दिशा में चर रही है और किसी भटकी हुई बकरी को खोजना आसान हो जाता है।
पुरखों से सीखी धरोहर को सहेजने का जज्बा
सौभनाथ ने लकड़ी से घंटा बनाने का यह हुनर किसी औपचारिक प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को काम करते हुए देखकर सीखा है। उनके बुजुर्ग भी इसी पद्धति से पिपरेल की लकड़ी को तराशकर मवेशियों के लिए घंटियां बनाते थे और उन्हें बकरियों के गले में पहनाया करते थे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह विद्या अब बाजार में आसानी से मिलने वाली पीतल और लोहे की घंटियों के चलते कम ही दिखाई देती है। इसके बावजूद, बंदना गांव में सौभनाथ अपने पुरखों की इस विरासत को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।
स्थानीय संसाधनों और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का उदाहरण
बाजार में हर तरह के आधुनिक उत्पाद सुलभ होने के दौर में भी अपने आस-पास मिलने वाली लकड़ी से उपयोगी उपकरण तैयार करना ग्रामीण आत्मनिर्भरता की गहरी समझ को दर्शाता है। सरगुजा के ग्रामीण परिवेश से सामने आई यह तस्वीर यह सिद्ध करती है कि आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव के बीच भी कुछ लोग अपनी जड़ों, पुरानी पद्धतियों और पारंपरिक ज्ञान को केवल यादों में समेटने के बजाय वास्तविकता में जिंदा रखे हुए हैं।





















