छोटे बच्चों के पालन-पोषण में अभिभावकों के सामने अक्सर यह उलझन आती है कि बच्चा सचमुच भूखा है या फिर केवल मन बहलाने के लिए कुछ चबाना चाहता है। कई बार बच्चे ऊबने, स्वाद बदलने या महज एक तय आदत के चलते खाने की मांग दोहराते रहते हैं। इन दोनों स्थितियों की पहचान करना सेहत के लिहाज से बेहद अहम है, क्योंकि बेवजह कुछ न कुछ खाते रहने से बच्चों में वजन बढ़ने और पाचन से जुड़ी दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं। इसके उलट, यदि बढ़ते बच्चे की सच्ची भूख को अनदेखा कर दिया जाए, तो उसके शारीरिक विकास और पोषण पर गहरा असर पड़ सकता है।
सच्ची भूख के शारीरिक लक्षण और व्यवहार
जब किसी बच्चे के शरीर को असल में कैलोरी और पोषण की दरकार होती है, तो उसका व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। ऐसे वक्त में बच्चा केवल अपनी मनपसंद चीजें ही नहीं खोजता, बल्कि साधारण थाली भी चाव से स्वीकार कर लेता है। भूख लगने पर बच्चे के पेट में हल्की आवाजें या गुड़गुड़ाहट होना स्वाभाविक है। इसके अलावा शरीर में ऊर्जा का स्तर गिरना, अचानक चिड़चिड़ापन आना, सुस्ती महसूस होना और किसी काम या खेल में मन न लगना भी असली भूख के पक्के संकेत माने जाते हैं।
समय का अंतर भी इस बात का बहुत बड़ा पैमाना है। यदि बच्चे ने अपना पिछला भोजन तीन से चार घंटे पहले किया है और अब वह दाल, रोटी, हरी सब्जियां, फल या कोई अन्य पौष्टिक चीज खाने को पूरी तरह राजी है, तो यह मान लेना चाहिए कि यह मांग बिल्कुल स्वाभाविक और शारीरिक जरूरत से प्रेरित है।
स्वाद की चाह और बोरियत का फर्क
इसके विपरीत, जब बच्चे किसी खालीपन या सिर्फ स्वाद के फेर में खाने की जिद करते हैं, तो उनका रवैया एकदम अलग होता है। ऐसे पलों में वे आमतौर पर चॉकलेट, चिप्स, बिस्कुट, नमकीन या आइसक्रीम जैसे पैकेज्ड स्नैक्स की ही रट लगाते हैं। यदि उनके सामने फल, दलिया या सादा खाना परोस दिया जाए, तो वे तुरंत मुंह बना लेते हैं और खाने से साफ मना कर देते हैं।
एक और सीधा तरीका यह है कि यदि बच्चे ने थोड़ी ही देर पहले पेट भरकर खाया है और वह फिर कुछ मांगने लगे, तो उसका ध्यान किसी खिलौने, रोचक कहानी, चित्रकारी या खेल की ओर मोड़ने का प्रयास करें। यदि किसी दूसरी गतिविधि में उलझते ही वह खाने की बात पूरी तरह भूल जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह मांग केवल मनोवैज्ञानिक थी या ऊब मिटाने का एक जरिया मात्र थी।
मांग उठने पर अभिभावक क्या कदम उठाएं
जब भी बच्चा अचानक कुछ खाने की जिद करे, तो सीधे स्नैक थमाने के बजाय सबसे पहले उसे एक गिलास सादा पानी पीने के लिए दें। कई बार बच्चे प्यास के अहसास को सही ढंग से पहचान नहीं पाते और उसे भूख समझ बैठते हैं। पानी पीने के थोड़ी देर बाद भी यदि उसकी मांग बनी रहती है, तो उसे दही, ताजे फल, कटे हुए सलाद या घर के बने हल्के नाश्ते का विकल्प पेश करें। यदि वह इन्हें खुशी-खुशी खा लेता है, तो इसका अर्थ है कि उसके पेट को पोषण की दरकार थी।
यदि वह सिर्फ मीठा या जंक फूड लेने पर ही अड़ा रहे, तो इसे महज स्वाद की जिद समझें और अनुशासित ढंग से समझाएं। इसके साथ ही घर में भोजन और हल्के नाश्ते की एक नियमित समय सारिणी बनाएं। भोजन के तय समय का अभाव भी बच्चों को दिनभर असमय कुछ न कुछ खाने की ओर धकेलता है।
दीर्घकालिक आदतों और भावनाओं का संतुलन
बच्चों की दिनचर्या में संतुलित आहार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जिसमें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, फाइबर और हेल्दी फैट्स मौजूद हों। यह संयोजन पेट को लंबे समय तक भरा रखता है और जल्दी-जल्दी लगने वाली बनावटी भूख को रोकता है। टीवी, मोबाइल या टैबलेट की स्क्रीन के सामने बैठकर भोजन करने की आदत पर रोक लगाएं, क्योंकि स्क्रीन में खोए रहने पर दिमाग पेट भरने का संकेत समय पर दर्ज नहीं कर पाता। इसके अलावा बच्चे की मानसिक स्थिति पर भी गौर करें, क्योंकि कभी-कभार अकेलापन, मानसिक तनाव या बोरियत भी बार-बार मुंह चलाने की आदत को जन्म देती है।



















