रोहतास और शाहाबाद अंचल में सदियों से पारंपरिक फसलों को तरजीह मिलती रही है, लेकिन अब फसल के चुनाव में अर्थशास्त्र की नई समझ किसानों की किस्मत बदल सकती है। इलाके में बड़े पैमाने पर बोई जाने वाली नाटी मंसूरी किस्म के मुकाबले सोनाचूर धान उत्पादकों के लिए मुनाफे का एक बेहद आकर्षक जरिया साबित हो रहा है। आमतौर पर खेतों में नाटी मंसूरी की पैदावार कहीं ज्यादा दिखती है, मगर जब बाजार में उपज बिकने पहुंचती है तो सोनाचूर अपने प्रीमियम दाम की बदौलत बाजी मार लेता है।
उत्पादन के आंकड़े बनाम बाजार का हिसाब
धान अनुसंधान केंद्र, रोहतास के कृषि विशेषज्ञ डॉ. प्रकाश सिंह के विश्लेषण के मुताबिक, शाहाबाद क्षेत्र में एक हेक्टेयर खेत से नाटी मंसूरी धान की उपज औसतन 70 से 75 क्विंटल तक दर्ज की जाती है। जब इस धान की कुटाई होती है, तो किसानों को तकरीबन 55 से 60 क्विंटल चावल हासिल होता है। इसके उलट, यदि कोई किसान उसी एक हेक्टेयर रकबे में सोनाचूर धान उगाता है, तो उसे महज 32 से 35 क्विंटल धान की पैदावार मिलती है। इस मात्रा से तैयार होने वाले चावल का वजन लगभग 25 क्विंटल ही बैठता है। पहली नजर में वजन के तराजू पर नाटी मंसूरी काफी भारी पड़ती है, मगर असली गणित मंडी में पहुंचकर बदल जाता है।
प्रति हेक्टेयर 85 हजार रुपये तक का सीधा फासला
बाजार की हकीकत यह है कि सोनाचूर चावल का खुदरा व थोक भाव अमूमन 100 रुपये प्रति किलोग्राम से नीचे नहीं गिरता। इस दर के हिसाब से देखें तो एक हेक्टेयर से मिलने वाले 25 क्विंटल सोनाचूर चावल का कुल बाजार मूल्य करीब 2.50 लाख रुपये आंका जाता है। दूसरी तरफ, बहुतायत में उपलब्ध नाटी मंसूरी चावल का सामान्य भाव केवल 28 से 30 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास ही सिमट कर रह जाता है। यदि एक हेक्टेयर से 55 क्विंटल चावल की प्राप्ति मानी जाए और 30 रुपये प्रति किलो की अधिकतम दर लगाई जाए, तो भी कुल मूल्य लगभग 1.65 लाख रुपये ही बनता है। इस तरह पैदावार आधी होने के बावजूद सोनाचूर की कुल बाजार कीमत नाटी मंसूरी से लगभग 85 हजार रुपये अधिक बैठती है।
कम खाद और जैविक पद्धति से लागत घटाने की राह
डॉ. प्रकाश सिंह इस बात पर जोर देते हैं कि अधिक उपज के पीछे भागने के बजाय उपज की गुणवत्ता और उसके प्रति किलो मिलने वाले दाम पर ध्यान केंद्रित करना अधिक लाभकारी है। सोनाचूर की खासियत यह है कि इसमें रासायनिक खादों की खपत को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। मिट्टी के प्राकृतिक गुणों को समझते हुए यदि पोषक तत्वों का संतुलित प्रबंधन किया जाए, तो इसे पूरी तरह प्राकृतिक या जैविक ढंग से भी उगाया जा सकता है। ऐसा करने से न केवल खेती का शुरुआती खर्च घटता है, बल्कि जैविक सोनाचूर के रूप में इसके और भी ऊंचे दाम मिलने की गुंजाइश बन जाती है।
भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग की दहलीज पर फसल
शाहाबाद क्षेत्र की इस अनमोल धरोहर को आधिकारिक पहचान दिलाने की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जा चुके हैं। डॉ. प्रकाश सिंह के अनुसार स्थानीय किसानों के सहयोग से सोनाचूर को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई (GI) टैग दिलाने की फाइल तैयार करके सक्षम प्राधिकरण को सौंपी जा चुकी है। कानूनी व तकनीकी जांच का यह काम अब अपने आखिरी चरण में पहुंच चुका है और अगले एक महीने के भीतर इसके लिए औपचारिक जीआई टैग जारी होने की पूरी उम्मीद है।
क्षेत्रीय पहचान से खुलेंगे राष्ट्रीय व वैश्विक बाजार
जीआई टैग मिलने के बाद सोनाचूर चावल की प्रामाणिकता और इसकी ऐतिहासिक विरासत को कानूनी संरक्षण हासिल हो जाएगा। इससे बाजार में नकली या मिलावटी किस्मों की बिक्री पर रोक लगेगी और असली उत्पादकों को अपनी फसल का उचित प्रीमियम हासिल होगा। रोहतास और पूरे शाहाबाद पट्टी के किसानों के लिए यह बदलाव सिर्फ फसल बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक कृषि को आधुनिक ब्रांडिंग और ऊंची आमदनी से जोड़ने का एक ठोस मॉडल तैयार करता है।



















