आधुनिक जीवनशैली में बच्चों को शांत रखने के लिए स्मार्टफोन थमा देना कई परिवारों में एक आम आदत बन चुका है। शुरुआत में भले ही यह तरकीब आसान लगे, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत गंभीर निर्भरता का रूप ले लेती है और रोजमर्रा के तनाव की वजह बन जाती है। जब माता-पिता अचानक हाथ से फोन खींचते हैं, तो बच्चों का चीखना, रोना और जिद्द पर अड़ जाना स्वाभाविक हो जाता है। इस स्थिति से निपटने के लिए जबरदस्ती करने के बजाय व्यवहार से जुड़े पांच व्यावहारिक तरीके अपनाए जा सकते हैं, जिससे बच्चे बिना किसी हंगामे के खुद फोन छोड़ना सीख जाएं।
अचानक छीनने के बजाय पहले से चेतावनी देने की आदत डालें
ज्यादातर घरों में माता-पिता अक्सर यह गलती करते हैं कि खेल या वीडियो में मग्न बच्चे के हाथ से अचानक डिवाइस छीन लेते हैं। इससे बच्चे में तीव्र गुस्सा और चिड़चिड़ापन पैदा होता है। इसकी जगह बच्चे को मानसिक रूप से स्क्रीन बंद करने के लिए तैयार करना बेहद जरूरी है। स्क्रीन टाइम खत्म होने से ठीक पांच मिनट पहले शांत आवाज में बताएं कि पांच मिनट बाद फोन रखने का समय हो जाएगा। जब बच्चे को पहले से यह सूचना मिल जाती है, तो वह अपने दिमाग में खेल या वीडियो को खत्म करने की तैयारी कर लेता है और फोन वापस मांगते वक्त विरोध काफी घट जाता है।
टाइमर की मदद लें और नियम में खुद को भी शामिल करें
जब माता-पिता सीधे तौर पर फोन वापस लेने का फैसला सुनाते हैं, तो बच्चे उन्हें अपना विरोधी मानने लगते हैं। इस धारणा को बदलने के लिए मोबाइल फोन या घड़ी में टाइमर का इस्तेमाल करना चाहिए। बच्चे से स्पष्ट कहें कि अलार्म या टाइमर बजते ही दोनों मिलकर फोन एक तरफ रख देंगे। ऐसा करने से पाबंदी किसी एक व्यक्ति की जिद न लगकर एक निष्पक्ष नियम बन जाती है, जिसमें माता-पिता विरोधी के बजाय साथी की भूमिका में नजर आते हैं। इससे बच्चों में नियमों का सम्मान करने का अनुशासन स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
फोन बंद होते ही सामने रखें कोई मजेदार विकल्प
अक्सर देखा गया है कि बच्चे किसी खास आकर्षण की वजह से नहीं, बल्कि खालीपन या बोरियत की वजह से बार-बार स्क्रीन की मांग करते हैं। जैसे ही बच्चे से मोबाइल रखने के लिए कहा जाए, ठीक उसी पल उसके सामने किसी दूसरी रचनात्मक गतिविधि का प्रस्ताव रखना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, कोई बोर्ड गेम खेलना, स्केचिंग या ड्राइंग करना, मजेदार कहानी की किताब पढ़ना या थोड़ी देर के लिए पार्क में बाहर खेलने जाना। जब बच्चे का ध्यान किसी दूसरी मनपसंद और सक्रिय गतिविधि में लग जाता है, तो स्क्रीन छूटने का अहसास कम हो जाता है।
कड़े आदेश देने के बजाय चुनने की आजादी दें
बच्चों पर सीधे हुक्म चलाना या डांट-फटकार करना अक्सर उल्टा असर डालता है और उनके अंदर जिद्दी स्वभाव को बढ़ावा देता है। इसकी जगह उन्हें सीमित विकल्पों के साथ खुद फैसला लेने का मौका देना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, उनसे पूछें कि वे फोन अभी रखना पसंद करेंगे या ठीक दो मिनट बाद। भले ही यह बहुत छोटा विकल्प हो, लेकिन इससे बच्चे को लगता है कि परिस्थिति पर उसका खुद का नियंत्रण है। यह अहसास उनके विरोध और गुस्से को तुरंत शांत करने में मददगार साबित होता है।
स्क्रीन रूटीन में निरंतरता बनाए रखें और खुद उदाहरण बनें
अक्सर माता-पिता की सबसे बड़ी चूक नियमों में निरंतरता न रख पाना होती है। किसी दिन व्यस्त होने पर दो घंटे तक फोन चलाने देना और किसी दिन तीस मिनट में ही छीन लेना बच्चे को भ्रमित करता है। स्क्रीन के उपयोग का एक निश्चित और नियमित समय तय होना चाहिए, चाहे कोई भी दिन हो। इसके साथ ही, इस नियम का पालन माता-पिता को भी अपने व्यवहार में दिखाना होता है, क्योंकि छोटे बच्चे उपदेश सुनने से ज्यादा बड़ों के आचरण को देखकर सीखते हैं। धैर्य और निरंतरता के साथ इन तरीकों को अमल में लाने पर घर में शांति बनी रहती है और बच्चे बिना किसी कलह के स्क्रीन से दूरी बना लेते हैं।



















