अक्सर घरों में ऐसा नजारा देखने को मिलता है जब कोई छोटा बच्चा अपना खिलौना किसी दोस्त या भाई-बहन को देने से साफ मना कर देता है। जैसे ही कोई दूसरा बच्चा उसकी किताब या खिलौने को हाथ लगाता है, वह तुरंत उसे वापस छीनने दौड़ता है और जोर देकर कहता है कि यह सिर्फ उसका है। ऐसे हालात में ज्यादातर अभिभावक फौरन यह नतीजा निकाल लेते हैं कि उनका बच्चा जिद्दी, स्वार्थी या बदतमीज हो रहा है। वे यह मान बैठते हैं कि बच्चे के भीतर चीजों को बांटने की भावना बिल्कुल नहीं है। वास्तव में हर बार ऐसा व्यवहार किसी बुरी आदत या अड़ियल रवैये का परिचायक नहीं होता। शुरुआती उम्र में बच्चे दुनिया को समझने के एक बेहद अहम विकासात्मक दौर से गुजर रहे होते हैं। इस नाजुक उम्र में वे अपनी निजी मिल्कियत और दूसरों की चीजों के बीच बुनियादी फर्क पहचानना सीख रहे होते हैं। इसके साथ ही वे अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद जाहिर करने, अपनी बारी का सब्र से इंतजार करने और आसपास के लोगों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होने का शुरुआती पाठ पढ़ रहे होते हैं।
बच्चे के भीतर हर वस्तु पर अधिकार जमाने की भावना क्यों पनपती है
छोटे बच्चों के नजरिए से देखें तो उनका कोई पसंदीदा खिलौना, खास गुड़िया, कहानी की किताब या कंबल सिर्फ खेलने या इस्तेमाल करने की साधारण वस्तु नहीं होती। उन चीजों के साथ उनका बहुत गहरा भावनात्मक जुड़ाव बन जाता है। जब कोई दूसरा व्यक्ति या साथी उनकी उस प्रिय वस्तु को छूता या अपने हाथ में लेता है, तो वे अंदर से बेहद विचलित, असहज और असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। बच्चों के मन में लगातार यह अनजाना डर समाया रहता है कि अगर उन्होंने अपनी चीज किसी और को सौंप दी, तो शायद वह उनसे हमेशा के लिए छिन जाएगी और कभी वापस नहीं मिलेगी। उन्हें यह भरोसा नहीं होता कि कोई वस्तु कुछ देर के लिए देकर दोबारा हासिल की जा सकती है। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं और उनकी समझ विकसित होती है, वे अपनी बारी की प्रतीक्षा करना, साथियों के साथ मिल-जुलकर खेलना और अपनी अंदरूनी घबराहट को संभालना सीखते हैं। इसलिए जब कोई नन्हा बच्चा बार-बार अपनी चीज को 'मेरा है' कहकर पकड़ने की कोशिश करे, तो बिना सोचे-समझे उस पर जिद्दी होने का ठप्पा लगाना अनुचित है। इसके बजाय अभिभावकों को यह गहराई से देखना चाहिए कि बच्चा किन खास परिस्थितियों में ऐसा कर रहा है और उस वक्त उसके मन में क्या चल रहा है।
परिवार में बोली जाने वाली बातें जो बच्चों में बढ़ाती हैं असुरक्षा
बच्चों को अपनी चीजों का ध्यान रखना और उनकी हिफाजत करना सिखाना बेशक बहुत जरूरी है, लेकिन बड़ों द्वारा यह बात किस लहजे और किस सोच के साथ कही जा रही है, उसका बच्चे के कोमल मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है। मिसाल के तौर पर, यदि किसी बच्चे को घर में बार-बार ऐसी नसीहतें सुनने को मिलती हैं कि यह तुम्हारा खिलौना है इसलिए इसे किसी को मत छूने देना, कोई तुम्हारी वस्तु उठा ले जाएगा, या अपनी चीज पर किसी का हाथ मत लगने देना, तो वह अनजाने में हर किसी के प्रति शक्की और अत्यधिक सतर्क बन जाता है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि ऐसी बातें एक-दो बार कहने से बच्चा रातों-रात साझा करना पूरी तरह बंद कर देगा। लेकिन जब परिवार के भीतर लगातार चीजों के छिन जाने, खो जाने या चोरी हो जाने का डर दिखाया जाता है, तो बच्चे के अवचेतन में अपनी वस्तुएं खोने की गहरी चिंता घर कर जाती है।
इसके विपरीत पहलू पर गौर करें तो परिवार के बड़ों का आपसी व्यवहार भी बच्चे की सोच को ढालता है। यदि घर के सदस्य एक-दूसरे के सामान को बिना इजाजत या बिना पूछे ही उठा लेते हैं और मनमाने ढंग से इस्तेमाल करते हैं, तो बच्चा भी वही तौर-तरीका सीखता है। वह यह मान लेता है कि दूसरों की चीजें बिना पूछे ली जा सकती हैं और अपनी चीज बचाने के लिए आक्रामक होना पड़ता है। लिहाजा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को समझाएं कि अपनी चीजें दूसरों के साथ मिलकर इस्तेमाल करना एक खूबसूरत आदत है, लेकिन किसी दूसरे की संपत्ति को हाथ लगाने से पहले उसकी बाकायदा अनुमति लेना भी उतना ही अनिवार्य नियम है।
बच्चों में मिल-बांटकर खेलने की प्रवृत्ति विकसित करने के असरदार तरीके
बच्चों में शेयरिंग की स्वस्थ आदत डालने के लिए जोर-जबरदस्ती या डांट-फटकार का सहारा लेने के बजाय धैर्यपूर्ण और समझदारी भरे तरीके आजमाने चाहिए।
जबरदस्ती छीनने के बजाय बच्चे को विकल्प और समय सीमा दें
जब बच्चा अपनी कोई पसंदीदा चीज किसी दूसरे बच्चे को देने से कतराए, तो कभी भी उसके हाथ से झपटकर या बलपूर्वक वह चीज लेकर दूसरे को न दें। ऐसा सख्त रुख अपनाने से बच्चा खुद को लाचार महसूस करता है और उसके भीतर नाराजगी, गुस्सा और असुरक्षा और ज्यादा भड़क उठती है। इसके विकल्प के रूप में आप उसे प्यार से समझा सकते हैं कि वह अपनी बारी पूरी होने तक उस खिलौने से खेल ले, और जब उसका खेल खत्म हो जाए तो वह उसे अपने भाई, बहन या साथी को सौंप दे। समय का यह दायरा और विकल्प देने से बच्चे को यह भरोसा होता है कि उसकी पसंद का सम्मान हो रहा है, और वह आहिस्ता-आहिस्ता बारी-बारी से खेलने की कला सीख जाता है।
खुद अपने व्यवहार से साझा करने का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करें
बच्चे उपदेशों या भाषणों से कम और अपने इर्द-गिर्द मौजूद बड़ों के आचरण को देखकर सबसे ज्यादा सीखते हैं। यदि माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य घर में खाने-पीने की चीजें आपस में बांटकर खाते हैं, जरूरतमंदों की मदद करते हैं और एक-दूसरे की जरूरतों का ख्याल रखते हैं, तो बच्चा स्वाभाविक रूप से इन संस्कारों को अपनाता है। इसके अलावा जब बड़े भी किसी दूसरे का सामान उठाने से पहले विनम्रता से अनुमति मांगते हैं, तो बच्चा यह समझ जाता है कि किसी भी वस्तु के उपयोग के लिए सहमति लेना पारिवारिक शिष्टाचार का हिस्सा है।
साझा करने की हर छोटी पहल पर बच्चे की खुलकर सराहना करें
जब भी आपका बच्चा अपनी मर्जी से अपना कोई खिलौना किसी दोस्त के साथ बांटता है या अपनी बारी समाप्त होने पर खुशी-खुशी दूसरे को खेलने का मौका देता है, तो उस पल उसकी दिल खोलकर प्रशंसा करें। आप सकारात्मक शब्दों में कह सकते हैं कि अपनी बारी पूरी होने के बाद खिलौना साझा करके उसने बहुत समझदारी और अच्छाई का परिचय दिया है। जब बच्चों को उनके अच्छे आचरण के लिए सकारात्मक प्रोत्साहन और शाबाशी मिलती है, तो वे यह महसूस करते हैं कि दूसरों का ध्यान रखना एक सराहनीय व्यवहार है और वे इसे बार-बार दोहराने के लिए प्रेरित होते हैं।
बच्चे की व्यक्तिगत और बेहद प्रिय वस्तुओं की सीमाओं का सम्मान करें
हर चीज को साझा करने का दबाव बनाना भी सही दृष्टिकोण नहीं है। जिस तरह बड़ों की अपनी कुछ निजी वस्तुएं होती हैं, ठीक उसी तरह हर बच्चे के पास भी कुछ ऐसे खास खिलौने, किताबें या उपहार हो सकते हैं जिनसे उसका बहुत गहरा लगाव होता है और जिन्हें वह सिर्फ अपने पास सहेजकर रखना चाहता है। माता-पिता को बच्चे के इस भावनात्मक लगाव का सम्मान करना चाहिए। उसे प्यार से समझाना चाहिए कि कौन-सी चीजें वह सबके साथ मिलकर खेल सकता है और किन गिनी-चुनी चीजों को वह पूरी तरह अपनी निजी संपत्ति मानकर सुरक्षित रख सकता है। जब बच्चे की अपनी निजी सीमाओं का आदर होता है, तभी वह दूसरों की सीमाओं और अधिकारों का आदर करना भी सीख पाता है।
हर इनकार को जिद्दीपन का नाम देने से बचें
अंततः यह समझना बेहद जरूरी है कि अगर कोई बच्चा कभी अपनी चीज देने से 'ना' कह देता है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उसका व्यवहार बिगड़ गया है या वह बदतमीज हो चुका है। असली बात यह सिखाने की है कि वह दूसरों की चीजें छीनने की गलती न करे और अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए शांत व शालीन भाषा का इस्तेमाल करे। अभिभावकों का मुख्य उद्देश्य बच्चे को शेयरिंग सिखाने के साथ-साथ यह भी समझाना होना चाहिए कि अपनी और दूसरों की चीजों की सीमाएं कहां तक हैं, ताकि वह समाज में एक संवेदनशील और संतुलित इंसान बनकर बड़ा हो सके।



















