मिर्जापुर जिले के किसानों के लिए फल और सब्जियों की खेती में फल मक्खी कीट एक गंभीर चुनौती बन चुका है। कद्दू वर्गीय सब्जियों और खट्टे फलों के बागों में यह कीट फसलों को भारी नुकसान पहुंचाता है। कीटों के डंक मारने से फल सड़ने लगते हैं और उत्पादन में तेज गिरावट आती है। इस प्राकृतिक संकट से निपटने के लिए कृषि विशेषज्ञ आमतौर पर खेतों में फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह देते हैं। बाजार में मिलने वाले ये ट्रैप काफी महंगे होते हैं, जिससे छोटे और सीमांत किसानों की खेती की लागत अचानक बढ़ जाती है। इसी अतिरिक्त आर्थिक बोझ को कम करने के लिए मिर्जापुर के किसान योगेंद्र कुमार सिंह ने घर पर ही कबाड़ की मदद से एक बेहद सस्ता और असरदार देसी ट्रैप विकसित किया है।
सब्जियों और बागवानी पर फल मक्खी का बढ़ता हमला
वर्तमान समय में इलाके के किसान बड़े पैमाने पर सब्जियों की खेती कर रहे हैं। खेतों में कोहड़ा, लौकी, खीरा और ककड़ी जैसी लता वाली फसलें लगी हुई हैं। इसके साथ ही बागवानी करने वाले किसान मुसंबी, संतरा और नींबू जैसे नींबू वर्गीय फलों की पैदावार ले रहे हैं। मौसम के बदलाव के साथ ही इन सभी फसलों पर फल मक्खी कीटों का प्रकोप अत्यधिक बढ़ गया है। यह कीट कोमल फलों में छेद करके अंडे दे देता है, जिससे फल भीतर से नष्ट हो जाते हैं और बाजार में बेचने लायक नहीं रहते।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस कीट के जीवन चक्र को तोड़ने के लिए खेतों में मक्खी ट्रैप लगाना सबसे सुरक्षित उपाय माना जाता है। योगेंद्र कुमार सिंह के अनुसार सामान्य तौर पर बाजार में उपलब्ध एक फल मक्खी ट्रैप करीब 90 से 100 रुपये में बिकता है। यदि किसी किसान को अपने पूरे खेत या बगीचे में दर्जनों ट्रैप लगाने हों, तो उसका बजट हजारों रुपये तक पहुंच जाता है।
वैज्ञानिक सिद्धांत और कीट नियंत्रण की देसी तकनीक
बाजार में मिलने वाले वाणिज्यिक ट्रैप में एक खास ल्यूर यानी गंध वाली टिकिया लगी होती है, जिसमें मिथाइल यूजीनॉल नाम का रसायन होता है। योगेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि इस दवा की महक से केवल नर कीट आकर्षित होते हैं। जब नर मक्खियां ट्रैप के भीतर पहुंचती हैं, तो वे उसमें फंस जाती हैं। नर कीटों के नष्ट हो जाने से मादा मक्खियों का प्रजनन रुक जाता है और खेत में उनकी आबादी तेजी से घट जाती है।
योगेंद्र ने इसी वैज्ञानिक सिद्धांत को अपनाते हुए घरेलू स्तर पर बेहद कम लागत में समाधान निकाला। बाजार के महंगे सांचे की जगह उन्होंने बेकार पड़ी प्लास्टिक की पानी की बोतलों का उपयोग किया। जहां बाजार का एक ट्रैप 100 रुपये का पड़ता है, वहीं घर पर तैयार किए गए इस देसी मॉडल की प्रति यूनिट लागत मात्र 5 से 7 रुपये बैठती है।
घर पर बोतल से कीट ट्रैप तैयार करने की सरल विधि
इस देसी फल मक्खी ट्रैप को बनाने के लिए किसी खास उपकरण की जरूरत नहीं पड़ती। योगेंद्र कुमार सिंह ने इसे तैयार करने की पूरी विधि साझा की
- सामग्री का चुनाव: किसान पानी की पुरानी खाली बोतल ले सकते हैं। यदि प्लास्टिक की बोतल उपलब्ध न हो, तो बिस्कुट का खाली प्लास्टिक डब्बा भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
- हवा और प्रवेश के लिए छेद: सबसे पहले बोतल या डब्बे के ढक्कन में एक छेद करें। इसके बाद बोतल के ऊपरी और मध्य हिस्से में अलग-अलग जगहों पर 5 से 8 छोटे छेद बना दें, जिनसे मक्खियां भीतर प्रवेश कर सकें।
- रुई और दवा लगाना: एक पतले लकड़ी के टुकड़े की मदद से बोतल के भीतर रुई का फाहा फंसा दें। इसके बाद उसी रुई पर मिथाइल यूजीनॉल दवा की लगभग 5 बूंदें टपका दें।
- लटकाने की व्यवस्था: दवा डालने के बाद ढक्कन को अच्छी तरह बंद कर दें और बोतल को धागे या पतले तार के सहारे पौधे या मचान पर लटका दें।
जैसे ही बोतल में मौजूद दवा की गंध बाहर फैलती है, नर कीट छेदों के रास्ते अंदर दाखिल हो जाते हैं और ढक्कन बंद होने के कारण बाहर नहीं निकल पाते।
हजारों रुपये की बचत और जबरदस्त परिणाम
इस नवाचार की सबसे बड़ी खूबी इसका किफायती होना है। बाजार में मिथाइल यूजीनॉल की 25 एमएल की शीशी करीब 200 रुपये में मिल जाती है। योगेंद्र कुमार सिंह के आकलन के अनुसार 200 रुपये की इस 25 एमएल दवा से लगभग 50 देसी ट्रैप आसानी से तैयार किए जा सकते हैं।
यदि कोई किसान बाजार से 50 रेडीमेड ट्रैप खरीदता है, तो उसे लगभग 5000 रुपये खर्च करने पड़ेंगे। वहीं घर पर खाली डब्बे, घर में उपलब्ध तार और 200 रुपये की दवा से किसान पूरा काम कर लेते हैं। योगेंद्र कुमार सिंह का कहना है कि यह देसी जुगाड़ खेत में बेहद तगड़ा काम करता है और बाजार के महंगे उत्पादों की तुलना में किसानों के लिए कहीं अधिक फायदेमंद साबित हो रहा है।


















