अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी को नई दिशा देने के मकसद से तैयार किए गए इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर की आर्थिक संभावनाओं की जहां चौतरफा चर्चा हो रही है, वहीं अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने इसकी जमीनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की है। जॉन बोल्टन का मानना है कि जब तक तेहरान में सत्ता परिवर्तन नहीं होता, तब तक मध्य पूर्व के समुद्री मार्गों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, वर्तमान भू-राजनीतिक हालात में इस गलियारे के जरिए बिना रुकावट व्यापार की उम्मीद करना आसान नहीं होगा।
वर्ष 2023 में रखी गई थी कॉरिडोर की रूपरेखा
साल 2023 में औपचारिक रूप से सामने आए इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को मुख्य रूप से दो प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है। इसमें एक ईस्टर्न कॉरिडोर है, जो भारत को अरब की खाड़ी से जोड़ता है। वहीं दूसरा नॉर्दर्न कॉरिडोर है, जिसका काम खाड़ी क्षेत्र को सीधे यूरोप से जोड़ना है। भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच इस तरह की व्यापारिक साझेदारी को रणनीतिक नजरिए से एक स्वाभाविक और तार्किक विकास माना जा रहा है।
ट्रंप प्रशासन के पास व्यापक रणनीति की कमी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इस कॉरिडोर को दिए जा रहे समर्थन और उनकी विदेश नीति की दिशा पर टिप्पणी करते हुए जॉन बोल्टन ने कड़ा रुख अपनाया। बोल्टन का कहना है कि प्रशासन के पास किसी ठोस और समग्र क्षेत्रीय रणनीति का अभाव है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान अमेरिकी नेतृत्व भू-राजनीतिक चुनौतियों को समग्रता में देखने के बजाय अलग-थलग करके आंकता है, जिससे दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीतियां कमजोर पड़ जाती हैं।
समुद्री रास्तों के चोक पॉइंट्स पर मंडराता संकट
जॉन बोल्टन ने चेतावनी दी कि भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच नजदीकी संबंध एक सकारात्मक कदम हैं, लेकिन सुरक्षा की अनदेखी करके व्यापारिक सफलता हासिल नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि ईरान से उत्पन्न होने वाले खतरों के कारण अंतरराष्ट्रीय समुद्र में स्थित प्रमुख चोक पॉइंट्स पर व्यापारिक जहाजों की आवाजाही कभी भी संकट में घिर सकती है। जब तक जलडमरूमध्य सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक वैश्विक माल ढुलाई स्थिर नहीं रह सकती।
ईरान की वर्तमान सरकार को बताया मुख्य अड़चन
मध्य पूर्व में यूरोपीय देशों और भारत की बढ़ती साझेदारी को समझदारी भरा कदम बताते हुए बोल्टन ने पूरी समस्या के केंद्र में ईरान की वर्तमान हुकूमत को रखा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मध्य पूर्व में शांति, सुरक्षा और स्थिरता के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट वहां का मौजूदा शासन है। बोल्टन का दावा है कि जब तक तेहरान की बागडोर वहां के आम नागरिकों के हाथों में नहीं आती, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकती।
हॉर्मुज और बाब अल-मन्दब पर सीधा असर
बोल्टन ने समुद्री मार्गों का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि मौजूदा दौर में केवल स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज ही नहीं, बल्कि लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य में भी सुरक्षा का गहरा संकट बना हुआ है। इस पूरे समुद्री इलाके से गुजरने वाला हर व्यापारिक जहाज संभावित खतरे के दायरे में है। ऐसे में ईरान की मौजूदा नीतियों को बदले बिना किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार कॉरिडोर का सुचारू संचालन लगभग असंभव रहेगा।
डोनाल्ड ट्रंप पहले जता चुके हैं कॉरिडोर को समर्थन
दूसरी तरफ, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस कॉरिडोर के पक्ष में मजबूती से अपनी बात रख चुके हैं। ट्रंप का कहना रहा है कि ईरान के आक्रामक रुख ने दुनिया को साफ दिखा दिया है कि मध्य पूर्व के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को ईरानी चेकपॉइंट्स के प्रभाव से दूर ले जाना बेहद जरूरी है। इसी सोच के तहत ट्रंप प्रशासन ने इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर और पाइपलाइन जैसे ऊर्जा निकासी के वैकल्पिक रास्तों का पुरजोर समर्थन किया है, ताकि वैश्विक व्यापार को सुरक्षित रखा जा सके।



















