पश्चिम चम्पारण में एक खास किस्म के आम की खेती इन दिनों खासी चर्चा में है, जिसकी तुड़ाई और कटाई सितंबर से लेकर अक्टूबर के मध्य तक की जाती है। आम तौर पर उत्तर भारत के बाजारों में अगस्त का महीना बीतते-बीतते आम का सीजन समाप्त हो जाता है और फल मिलने बंद हो जाते हैं। ऐसे समय में बाजार में एक ऐसा फल अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, जो न केवल दिखने में बेहद मनमोहक होता है बल्कि स्वाद में भी चीनी या मिश्री की तरह बहुत मीठा होता है। जिले के नौतन प्रखंड क्षेत्र में रहने वाले प्रगतिशील कृषक शिशिर दूबे ने इस खास प्रजाति की बागवानी की है, और अब फसल पूरी तरह तैयार होकर बाजार में बिक्री के लिए निकल पड़ी है।
पांच साल से हो रही है इस विलंबित किस्म की बागवानी
इस अनूठी बागवानी के बारे में बात करते हुए कृषक शिशिर दूबे का कहना है कि वह पिछले पांच वर्षों से लगातार अरुणिमा आम की खेती कर रहे हैं। इस प्रजाति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका फलन अन्य पारंपरिक और सामान्य किस्मों की तुलना में काफी देरी से होता है। जब जुलाई महीने का अंतिम सप्ताह आते-आते उत्तर भारत के स्थानीय बाजारों से सभी आम गायब हो जाते हैं, तब जाकर सितंबर और अक्टूबर के बीच के हफ्तों में अरुणिमा आम अपनी चमक बिखेरता हुआ बाजार में पहुंचता है।
आकर्षक रंग-रूप और बेहतरीन बनावट
बाजार में बिकने वाले अधिकांश आमों की तुलना में अरुणिमा की रंगत और शारीरिक बनावट बेहद आकर्षक और ग्राहकों को लुभाने वाली होती है। इस प्रजाति के एक फल का औसत वजन लगभग 350 ग्राम से लेकर 400 ग्राम तक दर्ज किया जाता है। जब यह फल पूरी तरह पककर तैयार हो जाता है, तो इसके छिलके के ऊपर एक सुंदर लाल और नीले रंग की परत उभर आती है, जो दूर से ही फल प्रेमियों और खरीदारों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है।
बिना रेशे का गूदा और शानदार बाजार भाव
खेती करने वाले कृषक शिशिर दूबे का यह भी कहना है कि अरुणिमा आम का अंदरूनी गूदा रस से पूरी तरह लबालब भरा होता है, जिसमें किसी भी तरह के रेशे नहीं होते और इसका स्वाद बेहद लजीज होता है। बाजार में इस फल की मांग इतनी अधिक है कि यह 300 रुपए से लेकर 400 रुपए प्रति किलोग्राम तक के ऊंचे दामों पर बिकता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि बाजार में उस समय कोई दूसरा आम उपलब्ध नहीं होता, इसलिए स्वाद के शौकीन ग्राहक बिना किसी मोलभाव के इस प्रीमियम फल की खरीदारी करते हैं।




















