तमिल सिनेमा के बहुमुखी प्रतिभा के धनी अभिनेता, निर्देशक, लेखक और पटकथा विशेषज्ञ के. भाग्यराज अब हमारे बीच नहीं रहे। चेन्नई में उनका निधन कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट के कारण हुआ। अपनी अनूठी कहानी कहने की कला के लिए प्रसिद्ध, भाग्यराज ने फिल्म निर्माण का ऐसा खाका तैयार किया था जिसने कई पीढ़ियों को दिशा दिखाई।
राज्यपाल और राजनीतिक जगत की संवेदनाएं
तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने इस क्षति पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने भाग्यराज की रचनात्मकता और तमिल सिनेमा में उनके अद्वितीय योगदान को याद करते हुए उन्हें एक विशेष दर्जा दिया। राज्यपाल ने कहा कि उनकी विरासत आने वाले समय में भी फिल्म जगत को प्रेरित करती रहेगी।
AIADMK के महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने उन्हें अद्वितीय पटकथा लेखक बताया। उन्होंने एम.जी. रामचंद्रन और भाग्यराज के बीच के आत्मीय संबंधों का उल्लेख किया। वहीं, DMK की MP कनिमोझी ने उन्हें 'पटकथा का राजा' करार दिया और उनके पांच दशकों के करियर को श्रद्धांजलि दी।
फिल्म जगत में शोक की लहर
अभिनेता चिरंजीवी ने इस खबर को अविश्वसनीय बताया। उन्होंने बताया कि मात्र दो दिन पहले वे गोवा में खुशबू की बेटी की शादी में एक साथ थे। वेंकटेश डग्गुबाती ने 'सुंदराकांडा' और 'अब्बाईगारू' के साथ उनके जुड़ाव को याद किया।
अभिनेत्री सुहासिनी ने उनके अंतिम पलों का विवरण साझा किया। उन्होंने बताया कि अपनी नियमित सैर से लौटने के बाद भाग्यराज ने छाती में दर्द की शिकायत की थी, जिसके बाद अस्पताल में उनका निधन हुआ। इसके अलावा, कमल हासन, रजनीकांत, ममूटी, नयनतारा, त्रिशा और कीर्ति सुरेश समेत कई सितारों ने उनके आवास पर पहुंचकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए।
सांस्कृतिक और राजनीतिक धरोहर
मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय ने उनके निधन को तमिल सिनेमा के लिए अपूरणीय क्षति बताया। सरकार ने उनकी अंतिम यात्रा को राजकीय सम्मान देने की घोषणा की। उदयनिधि स्टालिन और कई राज्य मंत्रियों ने अंतिम संस्कार में भाग लिया।
भाग्यराज ने 'अवसर पुलिस 100' जैसी फिल्मों के माध्यम से एम.जी. रामचंद्रन की अधूरी इच्छाओं को पूरा किया था। उनकी मौलिकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि डेविड धवन ने उनकी फिल्मों 'रासुकुट्टी', 'सुंदरा कांडम' और 'थाइकुलामे थाइकुलामे' को हिंदी में 'राजा बाबू', 'अंदाज़' और 'घरवाली बाहरवाली' के रूप में रूपांतरित किया। उन्होंने स्वयं भी अमिताभ बच्चन और अनिल कपूर के साथ हिंदी फिल्में निर्देशित कीं।
एक बेमिसाल पटकथाकार
सीमान और थिरुमावलवन जैसे नेताओं ने उन्हें पटकथा का विश्वकोश बताया। उनकी शुरुआती फिल्मों की सफलता का रहस्य आम आदमी के संघर्ष और परिस्थितियों का हास्यपूर्ण चित्रण था। उन्होंने नायक की उस परंपरागत छवि को तोड़ा जो दर्शकों के मन में बसी थी, जिससे वे 'आम आदमी' के नायक बन गए।
रविवार, 28 जून को उनका अंतिम संस्कार पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुआ। उनके जाने से जो खालीपन आया है, वह भारतीय सिनेमा में एक ऐसे युग का अंत है जिसने पटकथा लेखन को एक नया नजरिया दिया था।



















