भारत की ऐतिहासिक सैन्य सोच मुख्य रूप से जमीनी सीमाओं और पारंपरिक टकरावों पर केंद्रित रही है, जबकि देश का भौगोलिक स्वरूप और भविष्य अनिवार्य रूप से समुद्री शक्ति पर निर्भर करता है। भारतीय प्रायद्वीप के पास 7,516 किलोमीटर से भी अधिक लंबी समुद्री तटरेखा मौजूद है। इसके साथ ही देश का एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन 20 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है। भारतीय उपमहाद्वीप विश्व व्यापार और रणनीतिक समुद्री मार्गों के केंद्र बिंदु पर स्थित है। इस विशाल समुद्री विस्तार और रणनीतिक महत्व के बावजूद देश के समग्र रक्षा नियोजन में नौसेना को मिलने वाली प्राथमिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
जमीनी मोर्चों का तनाव और रक्षा तंत्र की पारंपरिक प्राथमिकताएं
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा योजनाएं लंबे समय से उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर केंद्रित रही हैं। देश की इन दोनों सीमाओं पर दो परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसी देश मौजूद हैं, जिनकी आक्रामक नीतियां लगातार दबाव बनाए रखती हैं। पाकिस्तान के साथ लगती नियंत्रण रेखा पर निरंतर जारी रहने वाली अशांति और गोलीबारी भारी सैन्य तैनाती की मांग करती है।
दूसरी तरफ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा समय-समय पर की जाने वाली घुसपैठ ने थलसेना को हमेशा अत्यधिक सतर्कता की स्थिति में रखा है। 1962 का संघर्ष, 1965 और 1971 के युद्ध तथा 1999 की कारगिल जंग के अनुभवों ने भारतीय रक्षा तंत्र की प्राथमिकताओं को मुख्य रूप से जमीनी पहरेदारी तक सीमित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इन ऐतिहासिक टकरावों के कारण रक्षा योजनाकारों की सोच में थल सीमाओं की रक्षा सर्वोपरि बनी रही।
पहाड़ों की चौकसी के बीच समुद्री मोर्चे को खुला छोड़ने का ऐतिहासिक सबक
किसी भी देश की संपूर्ण सुरक्षा रणनीति तभी कारगर हो सकती है जब उसमें सभी भौगोलिक मोर्चों का संतुलित मूल्यांकन हो। यदि कोई देश अपनी पर्वतीय और जमीनी सीमाओं को पूरी तरह मजबूत कर ले लेकिन समुद्री सीमाओं की निगरानी कमजोर छोड़ दे, तो यह स्थिति एक ऐसे किले के समान होती है जिसका पिछला दरवाजा खुला रह गया हो। प्राचीन काल में चोल साम्राज्य ने इस रणनीतिक यथार्थ को भली-भांति समझा था कि समुद्र पर प्रभुत्व स्थापित किए बिना जमीनी प्रभाव को दीर्घकाल तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। हालांकि बाद के कालखंडों में भारतीय शासकों की दृष्टि केवल अपनी क्षेत्रीय जमीनी सीमाओं तक ही सिमट कर रह गई।
इतिहास गवाह है कि पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में जब यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियां भारत पहुंचीं, तो उन्होंने उत्तरी सीमाओं से कोई बड़ा सैन्य आक्रमण नहीं किया था। वे हिंद महासागर के समुद्री मार्गों से दाखिल हुईं और उन्होंने धीरे-धीरे व्यापारिक चौकियों पर नियंत्रण करते हुए विशाल राजनीतिक और भौगोलिक सत्ता स्थापित कर ली। समुद्री प्रभुत्व की कमजोरी ने पूरे उपमहाद्वीप को औपनिवेशिक पराधीनता की ओर धकेल दिया था।
मुंबई आतंकी हमले से उजागर हुई तटीय निगरानी की कमजोरियां
आधुनिक दौर में समुद्री सुरक्षा की ढिलाई किस कदर घातक साबित हो सकती है, इसका दर्दनाक उदाहरण 26/11 का मुंबई आतंकी हमला है। भारी हथियारों से लैस 10 आतंकवादियों ने भारत की खुली समुद्री सीमाओं का लाभ उठाकर देश के सबसे बड़े वित्तीय केंद्र को निशाना बनाया था। वे कराची से एक साधारण नौका के जरिए बिना किसी रुकावट के सीधे मुंबई के तट पर उतरने में कामयाब रहे थे।
उस भयानक त्रासदी ने देश की तत्कालीन तटीय निगरानी व्यवस्था और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय के अभाव को पूरी तरह सामने ला दिया था। सीमित क्षमता वाला कोस्ट गार्ड और बिखरा हुआ तटीय सुरक्षा ढांचा रबर की एक छोटी नाव में सवार मुट्ठी भर हमलावरों को समय रहते रोकने में असमर्थ रहा था। यदि गैर-सरकारी आतंकी तत्व निगरानी के इस अंधे मोड़ का इस्तेमाल करके इतना बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं, तो किसी संगठित और आधुनिक नौसैनिक शक्ति के साथ टकराव की स्थिति में पैदा होने वाले जोखिमों की गंभीरता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
हिंद महासागर में चीन का निरंतर बढ़ता नौसैनिक दायरा
वर्तमान समय में हिंद महासागर में चीन की नौसेना अपनी गतिविधियों और प्रभाव का तेजी से विस्तार कर रही है। बीजिंग ने काफी पहले यह समझ लिया था कि वैश्विक स्तर पर प्रभाव स्थापित करने के लिए नौसैनिक श्रेष्ठता सबसे प्राथमिक आवश्यकता है। जहाजों और युद्धपोतों की कुल संख्या के लिहाज से चीन ने दुनिया की सबसे विशाल नौसेना तैयार कर ली है। उसने अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी को महज एक तटीय सुरक्षा बल की सीमा से बाहर निकालकर सुदूर सागरों में अभियान चलाने में सक्षम ब्लू-वाटर नेवी का रूप दे दिया है।
चीन ने अफ्रीका के जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा स्थापित किया और इसके बाद श्रीलंका के हंबनटोटा तथा पाकिस्तान के ग्वादर जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर रणनीतिक नियंत्रण हासिल किया। इस पूरे जाल को स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स यानी मोतियों की माला रणनीति के रूप में देखा जाता है, जिसका सीधा उद्देश्य भारतीय समुद्री क्षेत्र के चारों ओर रणनीतिक दबाव बनाना है। यह नौसैनिक विस्तार भारत की संप्रभुता, व्यापारिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्वायत्तता के लिए एक बड़ा रणनीतिक दबाव उत्पन्न कर रहा है।
व्यापारिक जीवनरेखा और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता की भूमिका
भारत का 90 प्रतिशत से अधिक विदेशी व्यापार समुद्री रास्तों के माध्यम से ही संचालित होता है। यदि समुद्री व्यापारिक गलियारों की सुरक्षा में कोई व्यवधान उत्पन्न होता है, तो इसका सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा और संपूर्ण आर्थिक व्यवस्था पर पड़ेगा। इसके अलावा दक्षिण एशिया में नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर यानी प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत का पारंपरिक दायित्व काफी हद तक उसकी नौसैनिक क्षमताओं पर ही टिका हुआ है।
श्रीलंका और मालदीव जैसे पड़ोसी द्वीपीय देश समुद्री खतरों, मानवीय संकटों या चक्रवात और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सहायता के लिए सबसे पहले नई दिल्ली की ओर देखते हैं। यदि भारत अपने नौसैनिक संसाधनों और उपस्थिति में कमी करता है, तो उत्पन्न होने वाले रणनीतिक शून्य को भरने के लिए प्रतिद्वंद्वी ताकतें पूरी तरह सक्रिय हैं। एक सशक्त और आधुनिक नौसेना न केवल पश्चिमी तट पर पारंपरिक चुनौतियों को रोक सकती है, बल्कि पूर्वी समुद्री सीमा और बंगाल की खाड़ी में भी स्थिरता सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाती है।
रक्षा बजट आवंटन में संसाधनों का असंतुलन
इन तमाम गंभीर रणनीतिक जिम्मेदारियों और उभरती चुनौतियों के बावजूद देश के रक्षा बजट में तीनों अंगों के बीच संसाधनों का भारी असंतुलन देखने को मिलता है। ऐतिहासिक और प्रशासनिक कारणों से भारतीय सेना के पास कर्मियों और जवानों की विशाल संख्या होने के कारण रक्षा बजट का सबसे बड़ा हिस्सा थलसेना को जाता है, जो अमूमन 55 से 60 प्रतिशत के आसपास रहता है।
दूसरी तरफ भारतीय वायुसेना को आम तौर पर लगभग 19 प्रतिशत के करीब संसाधन प्राप्त होते हैं, जबकि नौसेना को सबसे कम वित्तीय आवंटन से संतोष करना पड़ता है। आधुनिक युद्धपोतों, पनडुब्बियों और अत्याधुनिक निगरानी प्रणालियों की भारी लागत को देखते हुए नौसेना को पर्याप्त बजटीय प्राथमिकता न मिलना समुद्री सुरक्षा की दीर्घकालिक तैयारियों को प्रभावित कर सकता है। समय रहते इस असंतुलन को दुरुस्त करना देश की आर्थिक और सामरिक संप्रभुता के लिए आवश्यक माना जा रहा है।



















