देशभर के अधिकांश कृषि क्षेत्रों में रबी मौसम के तहत गेहूं की बुवाई की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन सीमित जल संसाधन वाले क्षेत्रों के काश्तकारों के लिए सिंचाई सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरती है। सामान्य तौर पर गेहूं की परंपरागत फसलों को पकने तक कई दौर की सिंचाई की जरूरत होती है। बार-बार पानी लगाने के कारण डीजल, बिजली और सिंचाई उपकरणों पर होने वाला खर्च काफी बढ़ जाता है, जिससे किसानों के शुद्ध मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा केवल पानी के प्रबंध में ही निकल जाता है। इस बार अलनीनो के संभावित असर और कमजोर मानसून के चलते कई इलाकों में कम बारिश की आशंका जताई गई है, जिसने किसानों की चिंता को और गहरा कर दिया है। ऐसी स्थिति में कम पानी की खपत वाली और सूखा सहने में सक्षम उन्नत किस्मों का चयन सबसे व्यावहारिक समाधान बनकर सामने आया है।
कम पानी में भरपूर पैदावार देने वाली प्रमुख किस्में
देवघर के कृषि विशेषज्ञ अम्बिका कुशवाहा के अनुसार, पानी की किल्लत का सामना कर रहे किसान गेहूं की ऐसी विशिष्ट प्रजातियों को चुन सकते हैं जो महज एक से दो पटवन में ही संतोषजनक उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं। वर्तमान समय खेतों में बुवाई शुरू करने के लिहाज से पूरी तरह अनुकूल माना जा रहा है, बशर्ते खेत की जमीन में बुवाई के वक्त जरूरी नमी मौजूद हो। सही बीज के चुनाव से न सिर्फ फसल सुरक्षित रहती है, बल्कि सिंचाई पर लगने वाली भारी लागत से भी सीधे तौर पर राहत मिलती है।
कृषि विशेषज्ञ ने चार प्रमुख किस्मों की सिफारिश की है, जिनमें लोकवन, शक्तिवर्धक 4282, शक्तिवर्धक 8292 और सरबती शामिल हैं। इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अनुकूल मौसम और सही देखरेख मिलने पर यह फसल लगभग 120 दिनों की अवधि के भीतर पूरी तरह पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके अलावा, इन किस्मों से निकलने वाले दाने आकार में मोटे और वजनदार होते हैं, जिससे बाजार में इनका अच्छा मूल्य मिलता है। जिन किसानों के पास नलकूप या नहर जैसी पक्की सिंचाई व्यवस्था नहीं है, वे अपनी स्थानीय जलवायु और मिट्टी की प्रकृति के आधार पर इनमें से किसी भी किस्म का चयन कर सकते हैं। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि उन्नत बीजों के साथ-साथ बुवाई का सही समय और उचित फसल प्रबंधन भी उत्पादन बढ़ाने के लिए समान रूप से आवश्यक है।
बुवाई से पहले बीजोपचार की अहम भूमिका
फसल की सुरक्षा और शुरुआती बढ़वार को सुनिश्चित करने के लिए बुवाई से पहले बीजों का शोधन करना बेहद अनिवार्य कदम है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर देखा जाता है कि किसान बाजार से बीज लाकर सीधे खेतों में डाल देते हैं। बिना उपचार किए सीधे बुवाई करने से बीजों में फफूंद और मिट्टी जनित विभिन्न रोगों का खतरा काफी बढ़ जाता है, जिससे अंकुरण प्रभावित होता है और पौधे शुरुआती दौर में ही कमजोर पड़ने लगते हैं।
इस जोखिम से बचाव के लिए कृषि विशेषज्ञ अम्बिका कुशवाहा ने सलाह दी है कि बुवाई से पूर्व बीजों को कार्बेन्डाजिम या थायरम से उपचारित किया जाना चाहिए। बीजों का उपचार कृषि विशेषज्ञों द्वारा निर्धारित मात्रा और तय दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए। रासायनिक उपचार करने से बीज जनित रोगों की रोकथाम होती है, जमाव की दर बेहतर होती है और शुरुआती अवस्था में पौधों का वानस्पतिक विकास तेजी से होता है।
लागत घटाने और टिकाऊ उत्पादन की व्यावहारिक रणनीति
मौजूदा कृषि परिदृश्य में किसानों को केवल उन किस्मों के पीछे भागने से बचना चाहिए जो बहुत अधिक पानी मांगती हैं। इसके बजाय अपने खेत के जलस्तर और उपलब्ध संसाधनों का वास्तविक आकलन करके ही किस्म का फैसला लेना चाहिए। सही प्रजाति का चयन, प्रमाणित बीज का उपयोग, बीजोपचार और समयबद्ध बुवाई जैसे बुनियादी तकनीकी कदम खेती की समग्र लागत में उल्लेखनीय कमी लाते हैं। प्रारंभिक स्तर पर बरती गई यह सतर्कता पानी की भारी कमी के बावजूद किसानों को गेहूं का टिकाऊ और मुनाफेदार उत्पादन दिलाने में सक्षम बना सकती है।























