मध्य प्रदेश में केंद्र सरकार की सामाजिक सुरक्षा योजना को निशाना बनाकर एक बड़ा वित्तीय फर्जीवाड़ा सामने आया है। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के दायरे में आने वाली इस ठगी में शातिर अपराधियों ने जीवित व्यक्तियों को कागजों में मृत बताकर बीमा कंपनियों से भारी-भरकम राशि क्लेम कर ली। इस सनसनीखेज खुलासे ने वित्तीय संस्थानों और स्थानीय प्रशासनिक निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यह पूरा खेल अधिकारियों और बैंकों की नाक के नीचे लंबे समय तक चलता रहा।
व्यापक स्तर पर फैला आपराधिक नेटवर्क
जांच एजेंसियों के अनुसार यह संगठित सिंडिकेट केवल एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका दायरा ग्वालियर, मुरैना, रतलाम और राजस्थान की सीमाओं तक फैला हुआ था। गिरोह ने गरीब और जरूरतमंद लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का झांसा देकर उनके पहचान दस्तावेज हासिल किए। इन दस्तावेजों के आधार पर अलग-अलग बैंकों में सैकड़ों संदिग्ध खाते खुलवाए गए और खाताधारकों की जानकारी के बिना ही विभिन्न बीमा कंपनियों से पॉलिसी खरीद ली गईं। शुरुआती एक या दो किश्तों का भुगतान खुद गिरोह ने किया ताकि योजना सक्रिय बनी रहे। इसके बाद स्थानीय नगरीय निकायों के कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र तैयार कराए गए और प्राकृतिक मौत का दावा पेश करके क्लेम की पूरी राशि अपने चहेते लोगों के खातों में ट्रांसफर करवा ली गई।
असामान्य पैटर्न और तकनीकी सुराग
इस पूरे घोटाले की परतें तब खुलीं जब पुलिस और सीआईडी ने दस्तावेजों की गहराई से जांच शुरू की। अधिकारियों के सामने कई ऐसे चौंकाने वाले तथ्य आए जिनसे इस सुनियोजित साजिश का पर्दाफाश हुआ। कई मामलों में एक ही परिवार के दो से तीन सदस्यों की मौत एक ही सप्ताह या एक महीने के भीतर दिखाई गई। इसके अलावा दस्तावेजों की तकनीकी जांच में गंभीर अनियमिताएं मिलीं। कई अलग-अलग खाताधारकों के केवाईसी फॉर्म और बीमा आवेदनों में एक ही मोबाइल नंबर और एक ही ई-मेल आईडी दर्ज पाई गई। उदाहरण के लिए, प्रीति शाक्य, पुष्पा, सावित्री वर्मा, गिरजा, उषा बाथम और रिंकू के खातों में एक ही ई-मेल आईडी का इस्तेमाल किया गया। इसी तरह कई अन्य खातों में भी समान संपर्क सूत्र मिलने से एजेंसियों का शक पुख्ता हो गया कि इन सभी मामलों के तार आपस में जुड़े हुए हैं और इन्हें एक ही गिरोह द्वारा संचालित किया जा रहा था।
फेडरल बैंक और दूसरे राज्यों तक पहुंची जांच
कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बचने के लिए आरोपियों ने बेहद चालाकी से पैसों की निकासी की। बैंक खाते मध्य प्रदेश के चंबल संभाग और आसपास के जिलों में खुलवाए गए, लेकिन क्लेम का पैसा आते ही उसे तुरंत राजस्थान और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों जैसे रतलाम, सवाई माधोपुर और श्रीगंगानगर के एटीएम से नकद निकाल लिया जाता था। रतलाम स्थित फेडरल बैंक की शाखा के 62 खातों से ही करीब ढाई करोड़ रुपये की ठगी किए जाने की बात सामने आई है। जांच का दायरा अब मध्य प्रदेश की सीमाओं को पार कर चुका है। सीआईडी ने इंदौर की पीपल्याहाना शाखा से दर्जनों खातों के दस्तावेज जब्त किए हैं, वहीं बेंगलुरु और छत्तीसगढ़ से जुड़े बीमा रिकॉर्ड भी खंगाले जा रहे हैं। अब तक 121 मामलों में सीधी ठगी की पुष्टि हो चुकी है और 482 से अधिक बैंक खातों की गहन छानबीन जारी है।


















