प्रशांत महासागर की सतह पर तापमान में आ रही लगातार वृद्धि ने दुनिया भर के मौसम तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करना शुरू कर दिया है। समुद्री सतह के असामान्य रूप से गर्म होने की इस घटना, जिसे अल नीनो कहा जाता है, ने प्रशांत क्षेत्र में तूफानी गतिविधियों को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया है। वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का आकलन है कि जून के महीने में सक्रिय होने के बाद से यह मौसमी तंत्र लगातार तीव्र होता चला गया है। इसका सीधा नतीजा यह निकला है कि इस पूरे समुद्री क्षेत्र में अब तक कम से कम 17 चक्रवाती तूफान दस्तक दे चुके हैं, जिनमें से कई तूफानों ने प्रचंड हरिकेन और टाइफून का रूप लेकर तटीय देशों में भारी तबाही मचाई है। प्रशांत क्षेत्र में जहां मूसलाधार बारिश और तूफानों की झड़ी लगी है, वहीं भारत में इसका बिल्कुल उल्टा असर देखने को मिल रहा है, जहां मानसूनी हवाओं की गति कमजोर पड़ने से देश के बड़े भूभाग पर सूखे का साया गहराने लगा है।
प्रशांत महासागर में तूफानों का असामान्य दौर और भारी आर्थिक नुकसान
प्रशांत महासागर के गर्म पानी ने उष्णकटिबंधीय तूफानों के लिए मुफीद माहौल तैयार कर दिया है। इसके असर से उठे शक्तिशाली चक्रवातों ने न केवल भारी जनहानि पहुंचाई है बल्कि बुनियादी ढांचे और वैश्विक व्यापार को भी गंभीर चोट पहुंचाई है। अप्रैल के महीने से अब तक प्रशांत क्षेत्र में सक्रिय हुए तूफानों की चपेट में आने से 230 से ज्यादा नागरिक अपनी जान गंवा चुके हैं। तेज हवाओं और समुद्री हलचल के चलते अरबों डॉलर का वित्तीय नुकसान हो चुका है। हाल ही में एक नया तूफान जापान के समुद्री तटों के बेहद करीब पहुंच गया, जबकि मौसम विज्ञानियों का अंदेशा है कि आने वाले नवंबर महीने तक इस क्षेत्र में और भी तीव्र तूफान आकार ले सकते हैं।
चीन में भी प्राकृतिक आपदाओं का भीषण रूप देखा गया है, जहां अकेले जुलाई महीने के भीतर लगातार तीन विशाल तूफानों ने भयंकर तबाही दर्ज की। अमेरिकी सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ जुलाई के दौरान ही चीन में इन आपदाओं से हुआ प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान लगभग 8.5 अरब डॉलर यानी करीब ₹81409 करोड़ तक पहुंच गया है। तूफानों के कारण पैदा हुए इन हालातों ने केवल स्थानीय जमीन पर ही तबाही नहीं मचाई, बल्कि दुनिया भर की सप्लाई चेन और जहाजरानी उद्योग को भी गहरे संकट में डाल दिया है।
वैश्विक बंदरगाहों पर दबाव और मालवाहक जहाजों की आवाजाही प्रभावित
लगातार उठ रहे तूफानों के कारण एशिया-प्रशांत समुद्री गलियारों में व्यापारिक परिवहन बुरी तरह बाधित हुआ है। प्रमुख अंतरराष्ट्रीय कंटेनर शिपिंग कंपनी मार्स्क द्वारा जारी की गई आधिकारिक सलाह में बताया गया है कि बैक-टू-बैक आए गंभीर टाइफूनों की वजह से एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई व्यस्त और अहम बंदरगाहों पर जहाजों का भारी जमावड़ा लग गया है। इस भीड़भाड़ के चलते कंटेनर जहाजों के अपने गंतव्य पर तय समय पर पहुंचने की दर में भारी गिरावट आई है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माल ढुलाई की लागत और आपूर्ति पर पड़ रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि प्रशांत महासागर में जारी इस अभूतपूर्व उथल-पुथल के मुकाबले अटलांटिक महासागर में स्थिति बेहद शांत बनी हुई है। मौसम संबंधी ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक, अटलांटिक महासागर में तूफान के मौसम की शुरुआत 1941 के बाद की सबसे शांत शुरुआतों में गिनी जा रही है, जो दोनों महासागरों के बीच के वायुमंडलीय अंतर को साफ उजागर करती है।
समुद्र की गर्मी और अगस्त में 63 साल का रिकॉर्ड ध्वस्त
वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान में प्रशांत महासागर में तूफानी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए समुद्री तापमान के दो अलग-अलग स्रोत मिलकर काम कर रहे हैं। इनमें मुख्य कारक अल नीनो ही है, जिसके तहत महासागर की ऊपरी सतह सामान्य औसत से कहीं अधिक गर्म हो जाती है। यह अत्यधिक गर्म समुद्री जल चक्रवातों को भारी ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे हवा की गति और बादलों का घनत्व बहुत तेजी से बढ़ता है। इसी मौसमी तंत्र का नतीजा रहा कि अकेले अगस्त महीने में प्रशांत महासागर और दक्षिण चीन सागर के दायरे में कुल 12 चक्रवाती तूफान विकसित हुए।
हांगकांग के मौसम विज्ञानियों द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में दर्ज किए गए 12 चक्रवात किसी भी एक महीने में बनने वाले तूफानों की अब तक की सबसे बड़ी तादाद है। वर्ष 1961 के बाद से मौसम के इतिहास में यह आंकड़ा सबसे अधिक है, जो प्रशांत क्षेत्र में चक्रवाती गतिविधियों की असाधारण और विनाशकारी तीव्रता को प्रमाणित करता है। मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में भी यह सक्रियता उतनी ही उग्र रही है, जहां कम से कम 17 प्रणालियां पूर्ण तूफान की ताकत में तब्दील हुईं। इनमें से 6 तूफान सीधे हरिकेन बने, जबकि 4 को प्रमुख हरिकेन की श्रेणी में रखा गया, जहां हवाओं की गति 179 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे भी ज्यादा दर्ज की गई। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र की लगातार बनी गर्मी जापान और अन्य एशियाई देशों में बंदरगाहों और जनजीवन पर लंबे समय तक खतरा बनाए रखेगी।
भारतीय मानसून पर अल नीनो की मार और सूखे की आहट
प्रशांत क्षेत्र में अति-सक्रियता पैदा करने वाले इस अल नीनो तंत्र ने भारतीय उपमहाद्वीप में दक्षिण-पश्चिम मानसून को बुरी तरह शिथिल कर दिया है। 1 जून 2026 से लेकर 18 सितंबर तक के मानसून सीजन के आधिकारिक आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि देश में बारिश का वितरण बेहद असंतुलित और चिंताजनक रहा है। पूरे भारत में केवल ऐसे चुनिंदा राज्य हैं जहां बहुत ज्यादा या अत्यधिक बारिश दर्ज हुई है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का महज 2 फीसदी हिस्सा है।
इसके विपरीत, 18 राज्य ऐसे हैं जो देश के 55 फीसदी क्षेत्रफल का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां बारिश सामान्य के दायरे में रही है। सबसे चिंताजनक स्थिति देश के उन 16 राज्यों में बनी हुई है जो मानसूनी बारिश की गंभीर कमी और अत्यधिक सूखे से जूझ रहे हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि भारत का 43 फीसदी भूभाग वर्तमान में गंभीर बारिश की कमी और संभावित सूखे के संकट का सामना कर रहा है। राज्यों के स्तर पर देखें तो बिहार में औसत से तकरीबन 37 फीसदी कम वर्षा हुई है, जबकि राजस्थान में सामान्य से 20 फीसदी से कम बारिश दर्ज की गई है। इस बड़े पैमाने पर हुई बारिश की कमी से आने वाले समय में फसलों की बुवाई, सिंचाई और कृषि अर्थव्यवस्था पर सीधा और गंभीर नकारात्मक असर पड़ना तय माना जा रहा है।




















