मध्य प्रदेश के सतना जिले में गिद्धों की तादाद ने नया रिकॉर्ड बना दिया है। हाल ही में हुई ग्रीष्मकालीन गणना में यहां एक ही दिन में 1568 गिद्ध देखे गए, जबकि तीन दिन की गिनती का औसत 1178 गिद्ध प्रतिदिन रहा। यह आंकड़ा सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में गिद्ध संरक्षण के लिहाज से बड़ी कामयाबी मानी जा रही है। कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके ये पक्षी अब विंध्य की पहाड़ियों और जंगलों में बड़ी संख्या में नजर आने लगे हैं।
सर्दी और गर्मी दोनों मौसम में क्यों होती है गिनती
सतना के डीएफओ मयंक चांदीवाल ने बताया कि जिले में हर साल गिद्धों की गिनती दो बार कराई जाती है, एक बार सर्दी में और दूसरी बार गर्मी में। इसकी वजह यह है कि गिद्धों की कुछ प्रजातियां प्रवासी स्वभाव की होती हैं और मौसम बदलने के साथ दूसरे इलाकों की ओर निकल जाती हैं, फिर वापस लौट आती हैं। यही वजह है कि दोनों मौसमों में अलग अलग गिनती कराई जाती है, ताकि सही और भरोसेमंद आंकड़े सामने आ सकें।
मयंक चांदीवाल के मुताबिक, इस साल 20 से 22 फरवरी के बीच हुई विंटर काउंटिंग में तीन दिन का औसत 757 गिद्ध प्रतिदिन दर्ज हुआ था। इसके बाद 22 से 24 मई के बीच समर काउंटिंग हुई, जिसमें यह संख्या बढ़कर औसतन 1178 प्रतिदिन तक जा पहुंची। सबसे खास बात यह रही कि 24 मई को अकेले 1568 गिद्ध एक साथ गिने गए, जिसे अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा बताया जा रहा है।
फरवरी में पांच तो मई में चार प्रजातियां आईं नजर
मध्य प्रदेश में सामान्य तौर पर गिद्धों की सात प्रजातियां पाई जाती हैं, इनमें तीन प्रवासी और चार स्थानीय प्रजातियां शामिल हैं। फरवरी की गणना के दौरान पांच प्रजातियां रिकॉर्ड की गई थीं, जिनमें इजिप्शियन वल्चर, व्हाइट रम्प्ड वल्चर, सिनेरियस वल्चर, किंग वल्चर और लॉन्ग-बिल्ड वल्चर शामिल थे। इनमें सिनेरियस वल्चर प्रवासी प्रजाति है, जबकि बाकी चारों स्थानीय मानी जाती हैं। वहीं मई की गिनती में चारों स्थानीय प्रजातियां बड़ी तादाद में देखी गईं।
गिनती से पहले कर्मचारियों को दी गई खास ट्रेनिंग
डीएफओ मयंक चांदीवाल ने बताया कि इस बार गणना शुरू होने से पहले वन विभाग ने अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण आयोजित किया था। गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ता दिलशेर खान ने इससे पहले सीधी में एक कार्यशाला आयोजित की थी। उनके सहयोग से सतना में भी दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम कराया गया। इस ट्रेनिंग में वन रक्षक, फॉरेस्ट गार्ड, डिप्टी रेंजर, रेंज ऑफिसर और एसडीओ कार्यालय के अधिकारियों को गिद्धों की सही पहचान, उनकी गणना के वैज्ञानिक तरीके और आम तौर पर होने वाली गलतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। वन विभाग का मानना है कि इसी प्रशिक्षण की वजह से इस बार गिद्धों की गणना पहले से कहीं ज्यादा सटीक और व्यापक तरीके से हो सकी।
कजाकिस्तान तक उड़ान भरकर सतना को मिली पहचान
सतना पहले भी गिद्ध संरक्षण को लेकर देशभर में चर्चा में रह चुका है। कुछ समय पहले यहां खेत में घायल हालत में मिले एक यूरेशियन गिद्ध का रेस्क्यू कर भोपाल में इलाज कराया गया था। बाद में इस गिद्ध पर जीपीएस ट्रैकर लगाया गया, जिसके जरिए इसकी करीब 2300 किलोमीटर लंबी उड़ान दर्ज की गई। यह गिद्ध भारत से उड़कर कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान तक जा पहुंचा था। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सतना और मध्य प्रदेश के गिद्ध संरक्षण कार्यों को पहचान दिलाई।
प्रकृति के सफाईकर्मी को बचाना क्यों जरूरी
गिद्धों को प्रकृति का सबसे बड़ा सफाईकर्मी माना जाता है। ये मृत पशुओं को खाकर वातावरण को स्वच्छ रखने और कई तरह की बीमारियों को फैलने से रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं। एक समय दवाओं के दुष्प्रभाव के कारण इनकी संख्या तेजी से घट गई थी, लेकिन अब वन विभाग की लगातार निगरानी, रेस्क्यू, इलाज, संरक्षण अभियान और वैज्ञानिक मॉनिटरिंग के चलते इनकी संख्या में सुधार देखने को मिल रहा है। सतना में सामने आए नए आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि अगर संरक्षण के प्रयास इसी तरह जारी रहे, तो आने वाले वर्षों में गिद्धों की आबादी और भी मजबूत हो सकती है।













