20 जून की तारीख और मुंबई का गहरा नाता
मुंबई में रहने वाले लोगों के लिए 20 जून का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। आज से लगभग 139 साल पहले इसी तारीख को विक्टोरिया टर्मिनस को पहली बार आम जनता के लिए खोला गया था। वर्तमान में छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के नाम से विख्यात इस स्टेशन को मुंबई के लोग आज भी प्यार से वीटी ही बुलाते हैं। यह केवल ट्रेनों के आने-जाने का जरिया नहीं है, बल्कि सपनों के इस शहर की धड़कन और पहचान है। इस भव्य इमारत की वास्तुकला को देखते हुए यूनेस्को ने इसे वैश्विक धरोहर का दर्जा दिया है। आइए, बोरी बंदर से शुरू हुए इस स्टेशन के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस बनने के सफर पर नजर डालते हैं।
बोरी बंदर से हुई थी भारतीय रेल की ऐतिहासिक शुरुआत
इस शानदार इमारत के निर्माण से पहले इस जगह पर बोरी बंदर नाम का एक छोटा रेलवे स्टेशन हुआ करता था। वह दौर व्यापार और माल की ढुलाई के लिए बहुत प्रसिद्ध था। भारत के इतिहास में 16 अप्रैल 1853 का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज है, क्योंकि इसी बोरी बंदर स्टेशन से देश की सबसे पहली पैसेंजर ट्रेन ठाणे के लिए रवाना हुई थी। इस ट्रेन ने करीब 34 किलोमीटर की दूरी तय की थी, जिसने भारतीय रेलवे के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। बोरी बंदर ने देश की रफ्तार को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया था।
वास्तुकार फ्रेडरिक स्टीवेन्स का अनोखा सपना
जैसे-जैसे उन्नीसवीं सदी में रेलवे का विस्तार हो रहा था, ब्रिटिश सरकार मुंबई में एक ऐसा स्टेशन बनाना चाहती थी जो दुनिया भर के लिए मिसाल बने। इस बड़े प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी प्रसिद्ध वास्तुकार फ्रेडरिक विलियम स्टीवेन्स को सौंपी गई। स्टीवेन्स ने इसके डिजाइन के लिए यूरोप का दौरा किया और लंदन के मशहूर सेंट पैंक्रास स्टेशन से प्रेरणा ली। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए शुरुआती बजट लगभग 16 लाख रुपये तय किया गया था, जो केवल एक रेलवे स्टेशन नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभाव का प्रतीक बनने वाला था।
दस वर्षों की कड़ी मेहनत और बॉम्बे गोथिक वास्तुकला
इस ऐतिहासिक इमारत का निर्माण कार्य मई 1878 में शुरू हुआ था और इसे पूरा होने में पूरे दस साल का लंबा समय लगा। आखिरकार 1887 में यह बनकर तैयार हुई। उस समय किसी एक इमारत को बनाने में इतना लंबा वक्त लगना बहुत बड़ी बात थी। इसके निर्माण में पीले मालाड पत्थर, सफेद पोरबंदर पत्थर, ग्रे बेसाल्ट और लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया था। देश-विदेश के हजारों कुशल कारीगरों ने दिन-रात मेहनत करके इसे आकार दिया। यूरोपीय वास्तुकला और भारतीय शिल्पकला के इस खूबसूरत मिलन को इतिहास में बॉम्बे गोथिक शैली के नाम से जाना गया।
वास्तुकला की बेमिसाल कारीगरी
इस इमारत को देखते ही यूरोपीय और भारतीय शैलियों का अद्भुत संगम नजर आता है। इसके ऊंचे मेहराब, सुंदर गुंबद, बारीक नक्काशीदार मीनारें और विशाल गलियारे इसे बेहद आकर्षक बनाते हैं। फ्रेडरिक स्टीवेन्स ने मुंबई की स्थानीय जलवायु को ध्यान में रखकर इस इमारत में गहरे बरामदे और पानी की निकासी के लिए विशेष प्रबंध किए थे। इमारत के बाहरी हिस्सों पर विभिन्न जातियों और समुदायों के चेहरों को तराशा गया है, जो तत्कालीन मुंबई की विविध संस्कृति को प्रदर्शित करता है।
महारानी विक्टोरिया को समर्पित और सबसे महंगी इमारत
महारानी विक्टोरिया के शासनकाल की स्वर्ण जयंती के पावन अवसर पर इस स्टेशन का नाम विक्टोरिया टर्मिनस रखा गया था। इसे 20 जून 1887 को जनता के लिए खोला गया। उस दौर में इस इमारत को बनाने में लगभग 3 लाख पाउंड का खर्च आया था, जिससे यह तत्कालीन मुंबई की सबसे महंगी इमारतों की सूची में शामिल हो गई। स्टेशन के मुख्य द्वार पर दहाड़ते हुए ब्रिटिश शेर और भारतीय बाघ की मूर्तियां स्थापित की गईं। इसके सबसे ऊंचे हिस्से पर करीब 14 फुट ऊंची प्रगति की मूर्ति लगाई गई है, जो हाथ में मशाल थामे निरंतर आगे बढ़ने का संदेश देती है।
रेलवे स्टेशन के भीतर छिपा एक भव्य महल
बाहर से बेहद आकर्षक दिखने वाली यह इमारत अंदर से किसी राजसी महल जैसी प्रतीत होती है। इसके भीतर इतालवी संगमरमर, मजबूत सागौन की लकड़ी, पीतल की रेलिंग और घुमावदार सीढ़ियों का बेहतरीन उपयोग किया गया है। इसकी सुंदर सजावट का अधिकांश कार्य बॉम्बे स्कूल ऑफ आर्ट के विद्यार्थियों और स्थानीय शिल्पकारों ने मिलकर किया था। यहां की दीवारों पर की गई नक्काशी में भारतीय जीवों जैसे मोर, बंदर, सांप और उल्लू की आकृतियों को उकेरा गया है, जो भारतीय कलात्मकता की बेजोड़ मिसाल पेश करता है।
GIPR का मुख्य कार्यालय और व्यापारिक केंद्र
यह स्टेशन केवल यात्रियों के आने-जाने का केंद्र नहीं था, बल्कि ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर रेलवे (GIPR) का मुख्य प्रशासनिक मुख्यालय भी था। इमारत के मुख्य हिस्से पर इसके संस्थापकों और निर्देशकों के चित्र उकेरे गए हैं, जिनमें पहले भारतीय निदेशक जगन्नाथ शंकरशेट्ट का नाम प्रमुखता से शामिल है। रेलवे के इस जाल ने मुंबई को पूरे देश से जोड़ दिया और इसे एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में स्थापित किया। इसी कारण से मुंबई को भारत का प्रवेश द्वार भी कहा जाता था।
विक्टोरिया टर्मिनस से छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस का सफर
आजादी के बाद देश में औपनिवेशिक काल के नामों को बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी के तहत साल 1996 में विक्टोरिया टर्मिनस (वीटी) का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी टर्मिनस कर दिया गया। इसके बाद साल 2017 में इसमें आदर सूचक शब्द जोड़ते हुए इसे छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस का नया नाम मिला। हालांकि, आज भी मुंबई के लोग इसे वीटी कहकर ही पुकारते हैं। यह नाम परिवर्तन केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति और इतिहास को सम्मान देने का एक बड़ा प्रयास था।
यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा
इस इमारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए 2 जुलाई 2004 को यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी। यूनेस्को ने इसे विक्टोरियन गोथिक और भारतीय शैलियों के बेजोड़ समागम का बेहतरीन उदाहरण बताया। आज वैश्विक स्तर पर इसकी गिनती दुनिया के सबसे खूबसूरत और जीवंत रेलवे स्टेशनों में की जाती है, जो मुंबई की पहचान को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करता है।













