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महाराष्ट्र में कांग्रेस नेता नाना पटोले का पैर धुलवाने वाला वीडियो वायरल होने पर भड़का विवाद, व्यक्तिपूजा और लोकतंत्र पर उठे सवालराजनीति
2 अग॰ 2026, 8:20 pm (10 घंटे पहले)· 1

महाराष्ट्र में कांग्रेस नेता नाना पटोले का पैर धुलवाने वाला वीडियो वायरल होने पर भड़का विवाद, व्यक्तिपूजा और लोकतंत्र पर उठे सवाल

महाराष्ट्र कांग्रेस नेता नाना पटोले का समर्थकों द्वारा दूध और पानी से पैर धोने का वीडियो वायरल होने पर बीजेपी ने तीखा हमला बोला है, जबकि सोशल मीडिया पर लोकतंत्र में व्यक्तिपूजा को लेकर बहस छिड़ गई है।

महाराष्ट्र में राजनीति उस समय गरमा गई जब राज्य कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नाना पटोले का एक वीडियो तेजी से प्रसारित होने लगा। इस दृश्य में नाना पटोले एक सोफे पर विराजमान दिखाई दे रहे हैं, जबकि पार्टी के दो कार्यकर्ता एक बड़ी थाल में दूध और पानी भरकर उनके पैर धो रहे हैं। पैर धोने के बाद एक कपड़े से उन्हें सुखाया जाता है, जिसके बाद कार्यकर्ता उनके चरणों में फल अर्पित करते हैं। इतना ही नहीं, समर्थकों द्वारा उन्हें तिलक लगाया जाता है, सिर पर सफेद टोपी पहनाई जाती है और कंधे पर पटका डाला जाता है। फूलों की पंखुड़ियों की बौछार करने, चरणों में शीश झुकाने और फूलों का एक गुलदस्ता भेंट करने तक यह पूरी प्रक्रिया चलती रहती है। इस दौरान नाना पटोले बेहद शांत भाव से बैठे नजर आते हैं और उनका ध्यान अधिकांश समय अपने मोबाइल फोन में व्यस्त रहता है।

राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं और कांग्रेस का बचाव

वीडियो के सार्वजनिक मंचों पर आने के बाद आम जनता और राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है। आम लोगों की ओर से बढ़ती तीखी आलोचनाओं के बीच कांग्रेस पार्टी ने इस वाकये का बचाव करने का प्रयास किया है। पार्टी का तर्क है कि कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया यह कृत्य किसी दबाव में नहीं, बल्कि नेता के प्रति उनकी व्यक्तिगत श्रद्धा और सम्मान की अभिव्यक्ति था। हालांकि विरोधी दलों ने इस सफाई को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

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भारतीय जनता पार्टी ने इस पूरी घटना को लेकर कांग्रेस पर चौतरफा हमला बोला है और इसे पार्टी की आंतरिक संस्कृति का परिचायक करार दिया है। महाराष्ट्र सरकार के राजस्व मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता चंद्रशेखर बावनकुले ने इस प्रकरण पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा कि कांग्रेस नेताओं का आचरण और हरकतें हमेशा से ऐसी ही रही हैं। उन्होंने आगे कहा कि ऐसी घटनाओं से सबक लिया जाना चाहिए और ऐसी प्रथाओं से दूर रहना चाहिए जो केवल नकारात्मकता और जन-आलोचना को जन्म देती हैं।

नेताओं का मौन समर्थन और 2024 का पुराना विवाद

इस विवाद के केंद्र में मुख्य बात यह निकलकर आ रही है कि जनप्रतिनिधियों की अपने समर्थकों के प्रति क्या जिम्मेदारी बनती है। यद्यपि यह संभव है कि कार्यकर्ताओं ने अपनी मर्जी और भावना में बहकर नाना पटोले के पैर धोए हों, लेकिन किसी भी जिम्मेदार नेता का कर्तव्य केवल भाषण देने तक सीमित नहीं होता। किसी सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति का यह दायित्व भी होता है कि वह अपने समर्थकों के अनुचित कृत्यों को रोके और समाज में सही संदेश दे। यदि आपके सामने कोई आपके पैर धो रहा है और आप उसे मना नहीं करते, तो इसे मौन सहमति माना जाता है।

विशेष रूप से, नाना पटोले के साथ पैर धुलवाने या साफ करवाने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले वर्ष 2024 में भी वह इसी तरह के विवाद में घिर चुके हैं। उस समय एक कार्यक्रम के दौरान नाना पटोले के जूतों पर कीचड़ लग गया था, जिसे पार्टी के एक कार्यकर्ता ने पानी डालकर अपने हाथों से साफ किया था। उस घटना के बाद भी सार्वजनिक जीवन में नेताओं के व्यवहार पर तीखे सवाल खड़े हुए थे।

लोकतंत्र बनाम व्यक्तिपूजा: गुरु और जनप्रतिनिधि में अंतर

पार्टी प्रवक्ताओं के दावों और राजनीतिक बयानों से इतर आम नागरिकों का सवाल बेहद बुनियादी और गंभीर है। सोशल मीडिया पर लोग यह पूछ रहे हैं कि क्या एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिनिधियों की इस प्रकार पूजा की जानी चाहिए? यह घटना केवल एक नेता या एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में गहरी जड़ें जमा चुकी व्यक्तिपूजा की प्रवृत्ति को उजागर करती है। व्यक्तिपूजा वह स्थिति है जहां किसी नेता को इतना महान बना दिया जाता है कि उससे सवाल पूछना या उसकी नीतियों की आलोचना करना अपराध की भांति लगने लगता है।

भारतीय परंपरा में गुरु पूर्णिमा एक अत्यंत पवित्र अवसर है, जब लोग अपने शिक्षकों और मार्गदर्शकों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने उन्हें ज्ञान दिया, सोचने का सामर्थ्य प्रदान किया और सही-गलत का बोध कराया। गुरु का स्थान समाज में सदैव ऊंचा रहा है क्योंकि वह आत्मिक और बौद्धिक दिशा दिखाता है। परंतु जब किसी राजनीतिक नेता को उस सिंहासन पर बैठा दिया जाता है, तो परंपरा का मूल स्वरूप ही बिगड़ जाता है।

राजनीति में एक नेता जनता का मालिक या गुरु नहीं, बल्कि जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि होता है। आम नागरिक अपने वोट से उसे सत्ता सौंपते हैं, उसके वेतन और सुविधाओं का खर्च उठाते हैं और हर पांच साल के कार्यकाल के बाद उससे कामकाज का ब्योरा मांगते हैं। जब वही जनप्रतिनिधि स्वयं को पूजा का पात्र समझने लगता है या समर्थकों से पूजा स्वीकार करने लगता है, तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगाने लगता है।

राजनीतिक दलों में व्याप्त अंधभक्ति का व्यापक तंत्र

इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि आलोचना करने वाले अन्य राजनीतिक दल भी इस बुराई से अछूते नहीं हैं। भारत के राजनीतिक परिदृश्य में लगभग हर प्रमुख दल के भीतर अंधभक्ति का यह रूप देखने को मिलता है। किसी पार्टी में नेताओं के बड़े कटआउट और पोस्टरों को दूध से नहलाया जाता है, तो कहीं उन्हें हजारों किलोग्राम वजनी विशाल फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं।

कई स्थानों पर समर्थकों द्वारा अपने नेताओं को ईश्वर का साक्षात अवतार घोषित कर दिया जाता है, जबकि उनके जन्मदिवस के अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। राजनीतिक दल और नेताओं के चेहरे भले ही बदल जाएं, लेकिन नेताओं को भगवान का दर्जा देने की यह सामंती मानसिकता हर तरफ दिखाई देती है। नाना पटोले के ताजा विवाद ने एक बार फिर देश के नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत का लोकतंत्र नागरिक चेतना पर भारी पड़ रही व्यक्तिपूजा से मुक्त हो पाएगा।

सवाल-जवाब

नाना पटोले के वायरल वीडियो में क्या दिख रहा है?
वीडियो में दो कार्यकर्ता सोफे पर बैठे नाना पटोले के पैर दूध और पानी से धोते हैं, फल अर्पित करते हैं, तिलक लगाते हैं और सफेद टोपी व पटका पहनाते हैं, जबकि पटोले मोबाइल में व्यस्त दिखते हैं।
इस वीडियो पर बीजेपी की क्या प्रतिक्रिया रही?
महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने इसे कांग्रेस की संस्कृति बताते हुए कहा कि नेताओं को ऐसी प्रथाओं से बचना चाहिए जो केवल नकारात्मकता लाती हैं।
कांग्रेस पार्टी ने इस घटना पर क्या सफाई दी है?
कांग्रेस पार्टी ने कहा कि यह कार्यकर्ताओं का अपने नेता के प्रति व्यक्तिगत सम्मान और श्रद्धा का प्रकटीकरण था।
क्या नाना पटोले का ऐसा कोई मामला पहले भी सामने आया है?
हां, वर्ष 2024 में भी एक कार्यकर्ता द्वारा नाना पटोले के जूतों पर लगा कीचड़ पानी से साफ करने का वीडियो सामने आने पर विवाद हुआ था।
लोकतंत्र और व्यक्तिपूजा के मुद्दे पर क्या सवाल उठ रहे हैं?
सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि जनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं, इसलिए उन्हें गुरु या भगवान का दर्जा देकर पूजा करना लोकतंत्र के सिद्धांतों के विपरीत है।
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