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मणिपुर में ३६,000 विस्थापित लोगों की घर वापसी, अभी भी २४,000 राहत शिविरों में रहने को मजबूरमणिपुर
3 सित॰ 2026, 9:58 pm (3 घंटे पहले)· 0

मणिपुर में ३६,000 विस्थापित लोगों की घर वापसी, अभी भी २४,000 राहत शिविरों में रहने को मजबूर

मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने विधानसभा में जानकारी दी कि मणिपुर में हुई जातीय हिंसा के बाद बेघर हुए करीब 60,000 लोगों में से 36,000 को उनके घरों में बसा दिया गया है, जबकि 24,000 लोग अभी भी राहत शिविरों में रह रहे हैं।

मणिपुर में 3 मई 2023 को भड़की जातीय हिंसा की वजह से अपने घरों से बेघर हुए लगभग 60,000 लोगों में से करीब 36,000 नागरिकों को अब तक दोबारा उनके घरों में बसाया जा चुका है। इस बात की जानकारी मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने गुरुवार को राज्य विधानसभा के सत्र के दौरान सदन को दी।

राहत शिविरों और पुनर्वास की स्थिति

कांग्रेस विधायक थ लोंगेश्वर सिंह द्वारा लाए गए एक प्रस्ताव पर जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने सदन को बताया कि लगभग 24,000 आंतरिक रूप से विस्थापित लोग यानी आईडीपी अभी भी राज्यभर में बनाए गए विभिन्न राहत शिविरों में जीवन बिताने को मजबूर हैं। पुनर्वास प्रक्रिया में हुई इस प्रगति का श्रेय मुख्यमंत्री ने सभी विधायकों के सामूहिक प्रयासों को दिया है।

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वित्तीय सहायता और आजीविका का संकट

मुख्यमंत्री ने आगे स्पष्ट किया कि सरकार कुल 60,000 विस्थापित लोगों में से लगभग 59,000 लोगों को लगातार वित्तीय सहायता दे रही है, जिसमें वे लोग भी शामिल हैं जो अपने घरों को लौट चुके हैं। उन्होंने समझाया कि जो लोग अपने घर वापस जा चुके हैं, उन्हें भी आजीविका और कमाई के साधनों की भारी कमी के कारण अभी भी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह है कि सरकार उन परिवारों को भी हर महीने आर्थिक मदद मुहैया करा रही है।

विस्थापितों की मुख्य इच्छा और मानसिक स्वास्थ्य

पहाड़ी और घाटी दोनों क्षेत्रों से बेघर हुए लोगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों तरफ के लोगों की बस एक ही इच्छा है कि वे अपने घरों को लौट सकें। राहत शिविरों और हिंसा से प्रभावित इलाकों के अपने दौरों को याद करते हुए युमनाम खेमचंद सिंह ने साझा किया कि उन्होंने विभिन्न समुदायों के लोगों से बातचीत की और पाया कि हर कोई शांति के साथ अपने घर वापस लौटना चाहता है। लंबे समय तक चले इस संघर्ष की वजह से कई प्रभावित लोग मानसिक सदमे और तनाव से भी जूझ रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि इस मनोवैज्ञानिक तनाव को कम करने और लोगों को आवश्यक सहायता देने के लिए स्वास्थ्य विभाग लगातार कदम उठा रहा है। इसके अलावा, विस्थापितों के पुनर्वास और आजीविका के साधनों को बेहतर बनाने के लिए नई योजनाएं तैयार करने पर योजना विभाग के साथ भी चर्चा चल रही है।

राजनीति से ऊपर उठकर सहयोग की अपील

मुख्यमंत्री ने अंत में यह भी कहा कि सरकार हर तरफ से आने वाले अच्छे सुझावों के लिए पूरी तरह तैयार है और उन्होंने सभी से आग्रह किया कि इस गंभीर मुद्दे को किसी भी तरह की राजनीतिक प्राथमिकताओं या विचारों से ऊपर उठकर हल किया जाना चाहिए।

सवाल-जवाब

मणिपुर में जातीय हिंसा की शुरुआत कब हुई थी?
मणिपुर में जातीय हिंसा की शुरुआत 3 मई 2023 को हुई थी।
अब तक कितने विस्थापित लोगों को उनके घरों में बसाया जा चुका है?
अब तक लगभग 36,000 विस्थापित लोगों को उनके घरों में बसाया जा चुका है।
वर्तमान में कितने लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं?
लगभग 24,000 आंतरिक रूप से विस्थापित लोग अभी भी राहत शिविरों में रह रहे हैं।
किसने विधानसभा में विस्थापन और पुनर्वास से जुड़े आंकड़े साझा किए?
मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने विधानसभा में इन आंकड़ों की जानकारी दी।
सरकार द्वारा विस्थापितों को किस तरह की सहायता दी जा रही है?
सरकार घर लौट चुके लोगों सहित लगभग 59,000 विस्थापित लोगों को लगातार मासिक वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है।
विस्थापितों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए कौन सा विभाग काम कर रहा है?
स्वास्थ्य विभाग विस्थापितों के मनोवैज्ञानिक तनाव को कम करने के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·2 घंटे पहले

मणिपुर के पुनर्वास आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि 24,000 लोगों का अब भी शिविरों में रहना और लौटे हुए लोगों के लिए आजीविका का संकट एक गहरी चुनौती है। हालांकि सरकार वित्तीय सहायता और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का हवाला दे रही है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर सुरक्षा का भरोसा और रोजगार के स्थायी साधन बहाल किए बिना स्थायी शांति और पूर्ण वापसी संभव नहीं होगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·2 घंटे पहले

यह स्पष्ट है कि वित्तीय सहायता तात्कालिक राहत दे सकती है, लेकिन जब तक घाटी और पहाड़ियों के बीच विश्वास की कमी दूर नहीं होती और आजीविका के स्थायी साधन नहीं बनते, तब तक 24,000 विस्थापितों की सुरक्षित घर वापसी अधूरी रहेगी। राजनीतिक दलों को वाकई इस संवेदनशील मुद्दे पर संकीर्ण घेरे से बाहर निकलकर दीर्घकालिक शांति और सामाजिक सौहार्द के लिए एक ठोस रोडमैप तैयार करना होगा।

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