मणिपुर में संघर्ष से जूझ रहे क्षेत्रों के भीतर नाबालिगों और छात्र-छात्राओं की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने जमीनी स्तर पर विद्यार्थियों के आने-जाने वाले रास्तों, शिक्षण संस्थानों और जोखिम भरे रिहायशी इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात करने की मांग उठाई है। तमेंगलोंग जिले के अपर न्कोउ (ताकोउ) गांव से जुड़े 17 साल के एक छात्र की जान जाने के मामले को आयोग ने अत्यंत गंभीर माना है। इस दर्दनाक घटना पर संज्ञान लेते हुए संबंधित जिला प्रशासन और पुलिस तंत्र को निर्देश दिया गया है कि वे पूरे मामले पर अगले 15 दिनों के भीतर विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट पेश करें।
प्रशासन से 15 दिनों में मांगी गई विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट
आयोग की तरफ से जारी आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया गया है कि इस एक्शन टेकन रिपोर्ट में कई प्रमुख पहलुओं को शामिल किया जाना जरूरी है। इसमें दर्ज मामले की कानूनी जांच, दोषियों के खिलाफ अभियोजन की प्रगति, पीड़ित परिवार को दी जाने वाली राहत सामग्री तथा अनुग्रह राशि का पूरा ब्योरा शामिल होना चाहिए। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी साफ करना होगा कि संवेदनशील बस्तियों और असुरक्षित पॉकेट्स में बच्चों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए प्रशासन ने अब तक कौन से ठोस कदम उठाए हैं।
सशस्त्र उपद्रवियों द्वारा छात्र की हत्या पर गहरी चिंता
हथियारबंद उपद्रवियों द्वारा छात्र को निशाना बनाए जाने की घटना पर आयोग ने तीखी चिंता जाहिर की है। संस्था ने जोर देकर कहा कि वारदात की त्वरित और निष्पक्ष जांच पूरी की जाए, ताकि घटना के पीछे के तमाम हालात उजागर हो सकें और गुनहगारों की जवाबदेही तय की जा सके। आयोग ने राज्य के भीतर लगातार नाबालिगों के हिंसा का शिकार बनने की प्रवृत्ति को पूरी तरह अस्वीकार्य ठहराया है। आयोग का कहना था,
“ऐसी घटनाएं पूरी तरह अस्वीकार्य हैं और यह प्रत्येक बच्चे के अधिकारों, सुरक्षा और गरिमा का गंभीर उल्लंघन हैं।”
स्कूलों और संवेदनशील रास्तों पर पुख्ता पहरे की जरूरत
आयोग ने इस बात पर विशेष बल दिया कि बच्चों को किसी भी तरह के संघर्षजन्य खतरों के बीच असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। विद्यार्थियों द्वारा नियमित रूप से इस्तेमाल की जाने वाली सड़कों, स्कूली परिसरों और ऐसे गांवों में जहां जोखिम बना रहता है, वहां पर्याप्त पहरेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके साथ ही आयोग ने जिला प्रशासन, स्थानीय पुलिस, शिक्षण संस्थानों और स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों के बीच निरंतर समन्वय पर जोर दिया। एक मजबूत तालमेल के जरिए ही संभावित खतरों की पहले से पहचान की जा सकेगी और बच्चों की सलामती खतरे में पड़ने पर तुरंत जरूरी कदम उठाए जा सकेंगे।





















