ऑस्ट्रेलियन ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स द्वारा गुरुवार को सार्वजनिक किए गए आधिकारिक विदेशी व्यापार आंकड़ों के मुताबिक जुलाई महीने के दौरान ऑस्ट्रेलिया के व्यापार अधिशेष में मामूली कमी दर्ज की गई है। महीने-दर-महीने आधार पर यह अधिशेष घटकर 1,923 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (A$1,923M) पर आ गया है, जबकि इससे पिछले महीने यानी जून में यह 1,929 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर दर्ज किया गया था। वित्तीय बाजार के विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने जुलाई में व्यापार संतुलन 1,390 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर रहने का अनुमान जताया था, जिसकी तुलना में यह नया आंकड़ा काफी मजबूत बनकर सामने आया है। इस आंकड़े के सार्वजनिक होने के तुरंत बाद विदेशी मुद्रा बाजार में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर सीमित असर देखा गया और AUD/USD मुद्रा जोड़ी 0.01 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 0.7168 के स्तर पर कारोबार करती नजर आई।
जुलाई महीने में ऑस्ट्रेलिया के आयात और निर्यात आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण
व्यापार आंकड़ों के गहन विश्लेषण से पता चलता है कि जुलाई के दौरान देश के कुल निर्यात में महीने-दर-महीने आधार पर 3.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट जून महीने में दर्ज की गई 9.6 प्रतिशत की मजबूत बढ़ोतरी के बिल्कुल विपरीत है। दूसरी ओर, जुलाई में ऑस्ट्रेलिया के कुल आयात में भी 2.5 प्रतिशत की कमी देखी गई, जबकि जून महीने में आयात में 0.2 प्रतिशत की हल्की गिरावट दर्ज की गई थी। आयात और निर्यात दोनों में हुई इस सिकुड़न के बावजूद निर्यात का कुल मूल्य आयात से अधिक रहने के कारण देश का व्यापार संतुलन सकारात्मक बना हुआ है।
व्यापार अधिशेष किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी मुद्रा की मांग को सीधे प्रभावित करता है। जब कोई देश आयात की तुलना में अधिक वस्तुओं का निर्यात करता है, तो विदेशी खरीदारों को उन सामानों का भुगतान करने के लिए स्थानीय मुद्रा की आवश्यकता होती है। इससे मुद्रा की जैविक मांग बढ़ती है और उसकी विनिमय दर को समर्थन मिलता है। ऑस्ट्रेलिया के मामले में 1,923 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का अधिशेष यह दर्शाता है कि वैश्विक व्यापारिक चुनौतियों के बावजूद देश का शुद्ध व्यापार संतुलन मजबूती से कायम है।
रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की नीतियां और मुद्रा पर उनका प्रभाव
ऑस्ट्रेलियन डॉलर के मूल्य को निर्धारित करने में रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) द्वारा तय की जाने वाली ब्याज दरें सबसे निर्णायक कारक मानी जाती हैं। RBA अंतर-बैंक उधारी दरों को नियंत्रित करके पूरी अर्थव्यवस्था में वाणिज्यिक दरों का दायरा तय करता है। केंद्रीय बैंक का मुख्य लक्ष्य देश में मुद्रास्फीति दर को 2 से 3 प्रतिशत के लक्षित दायरे में बनाए रखना होता है। जब RBA अन्य प्रमुख केंद्रीय बैंकों की तुलना में ब्याज दरों को उच्च स्तर पर बनाए रखता है, तो ऑस्ट्रेलियन डॉलर को मजबूती मिलती है क्योंकि निवेशक अधिक ब्याज दर वाले परिसंपत्तियों की ओर आकर्षित होते हैं।
इसके अलावा, रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया साख की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए क्वांटिटेटिव ईज़िंग (QE) और क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (QT) जैसे अपरंपरागत मौद्रिक उपायों का भी उपयोग कर सकता है। क्वांटिटेटिव ईज़िंग से बाजार में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ती है, जो आमतौर पर AUD के लिए नकारात्मक मानी जाती है। इसके विपरीत, क्वांटिटेटिव टाइटनिंग अर्थव्यवस्था से नकदी को कम करती है, जिससे ऑस्ट्रेलियन डॉलर के मूल्य को समर्थन मिलता है।
कच्चा लोहा निर्यात और चीनी अर्थव्यवस्था से ऑस्ट्रेलिया का सीधा जुड़ाव
ऑस्ट्रेलिया प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश है और कच्चा लोहा (Iron Ore) इसका सबसे बड़ा निर्यात उत्पाद है। वर्ष 2021 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया का कच्चा लोहा निर्यात सालाना 118 बिलियन डॉलर का होता है। चीन इस कच्चे लोहे का मुख्य खरीदार और ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे लोहे की कीमतें और चीनी अर्थव्यवस्था का स्वास्थ्य ऑस्ट्रेलियन डॉलर की चाल को सीधे तौर पर तय करते हैं।
जब चीन की अर्थव्यवस्था में तेजी आती है, तो वहां बुनियादी ढांचे और औद्योगिक उत्पादन के लिए ऑस्ट्रेलिया से कच्चे माल की मांग बढ़ जाती है। इस बढ़ी हुई मांग के कारण ऑस्ट्रेलियन डॉलर की खरीदारी में तेजी आती है, जिससे AUD का विनिमय मूल्य बढ़ता है। इसके विपरीत, यदि चीन के आर्थिक विकास आंकड़े कमजोर रहते हैं या उम्मीद से कम दर्ज किए जाते हैं, तो AUD पर दबाव बनता है। इस प्रकार, कच्चे लोहे की कीमतें और चीन के आर्थिक आंकड़े ऑस्ट्रेलियाई अर्थव्यवस्था और उसकी मुद्रा दोनों के लिए अत्यंत संवेदनशील माने जाते हैं।
वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार की हलचल: GBP/USD और EUR/USD का रुख
वैश्विक मुद्रा बाजारों में ब्रिटिश पाउंड (GBP/USD) लगातार कई दिनों से दबाव में रहने के बाद बुधवार को चार हफ्ते के निचले स्तर 1.3470 के करीब से रिकवर होता दिखाई दिया। अमेरिकी डॉलर में अपेक्षाकृत नरमी और लगातार बनी हुई भू-राजनीतिक चिंताओं के बावजूद पाउंड में यह तेज करेक्शन देखने को मिला है। व्यापारी अब ब्रिटेन के आगामी आर्थिक आंकड़ों और बैंक ऑफ इंग्लैंड के संकेतों पर अपनी नजरें टिकाए हुए हैं।
दूसरी ओर, यूरो (EUR/USD) पर भी दबाव का माहौल देखा गया। उत्तरी अमेरिकी कारोबारी सत्र के समापन के समय यह मुद्रा जोड़ी गिरकर 1.1580 के स्तर के पास पहुंच गई। यूरो ने मंगलवार की अपनी मंदी की चाल को आगे बढ़ाया, जबकि अमेरिकी डॉलर निचले स्तरों से धीरे-धीरे मजबूती हासिल करता हुआ नजर आया। अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़े और फेडरल रिज़र्व की भावी नीतिगत दिशा यूरो की चाल को प्रभावित कर रही है।
सोने की कीमतों में सुस्ती और डीजल क्रैक स्प्रेड में ऐतिहासिक उछाल
एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान सोना (XAU/USD) 4,400 डॉलर प्रति औंस के स्तर से नीचे समेकित होता हुआ देखा गया। इससे पिछले कारोबारी दिन चार हफ्ते के निचले स्तर से हुई रिकवरी की रफ्तार थम गई है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और सितंबर में फेडरल रिज़र्व द्वारा ब्याज दर में कटौती की उम्मीदों ने सोने को समर्थन दिया है, हालांकि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट गैर-प्रतिफल वाली धातु सोने के लिए सकारात्मक साबित हो रही है।
ऊर्जा बाजार में भले ही कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत शांत दिख रही हों, लेकिन मध्यवर्ती डिस्टिलेट्स, विशेष रूप से डीजल, बेहद तनावपूर्ण संकेत दे रहे हैं। अमेरिका में डीजल क्रैक स्प्रेड यानी WTI कच्चे तेल की तुलना में अल्ट्रा-लो सल्फर डीजल फ्यूचर्स का प्रीमियम हाल ही में 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया। कारोबार के दौरान यह 102.00 डॉलर प्रति बैरल से अधिक के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया, जो रिफाइनिंग क्षमता और डिस्टिलेट आपूर्ति में आई गंभीर तंगी को उजागर करता है।
जैक्सन होल में केंद्रीय बैंक का बड़ा बदलाव और भू-राजनीतिक खींचतान
वैश्विक मैक्रो-आर्थिक परिदृश्य में हाल ही में दो बड़े घटनाक्रम सामने आए हैं। 27 से 29 अगस्त के बीच आयोजित जैक्सन होल सम्मेलन में फेडरल रिज़र्व के अध्यक्ष केविन वॉश ने केंद्रीय बैंक के संचार और परिचालन ढांचे में एक संरचनात्मक बदलाव की घोषणा की। वॉश ने स्पष्ट रूप से 'फॉरवर्ड गाइडेंस' के युग के समापन का ऐलान किया, जिसका सीधा मतलब है कि अब केंद्रीय बैंक पूर्व-निर्धारित संकेतों के बजाय पूरी तरह से आने वाले आर्थिक आंकड़ों के आधार पर अपने फैसले लेगा।
दूसरी तरफ, भू-राजनीतिक मोर्चे पर चीन ने G20 समूह में 19-टू-1 का विभाजन खड़ा कर दिया है, जिससे वैश्विक आर्थिक नीतियों पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया है। इसके साथ ही, स्कॉट बेसेंट ने चेतावनी दी है कि इस सप्ताह के अंत से पहले नए वित्तीय प्रतिबंध लागू किए जाएंगे। ये सभी घटनाक्रम वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बना रहे हैं और निवेशकों को जोखिम वाली परिसंपत्तियों से दूर सुरक्षित ठिकानों की ओर रुख करने पर मजबूर कर रहे हैं।



















