चीन की सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था के बीच वहां की वित्त मंत्रालय ने देश के सबसे बड़े बैंकों और बीमा कंपनियों में भारी पूंजी डालने का फैसला किया है, ताकि इन संस्थानों की बैलेंस शीट मजबूत बनी रहे और आर्थिक विकास की रफ्तार थमने न पाए। यह योजना रविवार को सामने आई।
कितनी बड़ी है यह पूंजी डालने की योजना
कम से कम आठ वित्तीय संस्थान करीब 53.6 अरब डॉलर की ताजा पूंजी जुटाने की कोशिश में हैं। इसमें से 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सीधे चीन की वित्त मंत्रालय की तरफ से आएगा, यानी बाकी बचा हिस्सा ही बाजार से जुटाया जाएगा। इतनी बड़ी रकम का सीधे सरकारी खजाने से आना बताता है कि बीजिंग इस मामले को कितनी गंभीरता से ले रहा है।
बैंकों को पूंजी की जरूरत क्यों पड़ती है
जब किसी अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ती है, तो बैंकों और बीमा कंपनियों के बहीखातों पर दबाव बढ़ने लगता है। कर्ज लौटने की रफ्तार धीमी हो सकती है और नए कारोबार में जोखिम बढ़ जाता है। ऐसे हालात में अगर किसी बैंक के पास पर्याप्त पूंजी न हो, तो वह न सिर्फ डूबे कर्ज को झेलने में कमजोर पड़ता है, बल्कि नए कर्ज बांटने में भी हाथ खींचने लगता है, जिसका सीधा असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसी वजह से सरकारें अक्सर बड़े बैंकों और बीमा कंपनियों में सीधी पूंजी डालकर उनकी क्षमता बढ़ाती हैं, ताकि कर्ज देने का सिलसिला बना रहे और आम कारोबार व उपभोक्ताओं तक पैसा पहुंचता रहे।
बीजिंग के इस कदम के पीछे की सोच
चीन दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसका असर सिर्फ उसकी अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। जब वहां की ग्रोथ धीमी पड़ती है, तो इसका असर उसके व्यापारिक साझेदारों और वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है। इसी वजह से वित्त मंत्रालय का बैंकों और बीमा कंपनियों में सीधे उतरना एक तरह से यह संकेत भी है कि सरकार अपने वित्तीय तंत्र में किसी बड़ी कमजोरी को पनपने नहीं देना चाहती। बड़ी पूंजी झोंककर मंत्रालय यह सुनिश्चित करना चाहता है कि बैंकिंग व्यवस्था कर्ज देने, निवेश करने और आर्थिक गतिविधियों को चलाए रखने में सक्षम बनी रहे, भले ही बाकी अर्थव्यवस्था की चाल धीमी हो।
आगे क्या साफ होना बाकी है
अभी तक यह सार्वजनिक नहीं हुआ है कि किन-किन आठ बैंकों और बीमा कंपनियों को यह पूंजी मिलेगी, न ही यह तय हुआ है कि यह रकम कब तक और किस तरीके से दी जाएगी। बाकी बचे करीब 20 प्रतिशत हिस्से के लिए संस्थानों को बाजार से पूंजी जुटानी होगी, जो यह भी दिखाता है कि सरकार पूरी जिम्मेदारी अकेले नहीं उठा रही, बल्कि बैंकों को भी अपने दम पर मजबूत बनने के लिए कुछ जिम्मेदारी सौंप रही है।


















