छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में इन दिनों धान की फसल कंसा फूटने की अवस्था में पहुंच चुकी है, और यही वह समय है जब किसान बड़ी संख्या में खेतों में उर्वरक डालने में जुटे हैं. लेकिन कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के मृदा वैज्ञानिक डॉ एआर गौर का कहना है कि अगर इस दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही हो जाए तो यूरिया पर खर्च किया गया पैसा और मेहनत दोनों बेकार जा सकते हैं.
यूरिया ही टॉप ड्रेसिंग के लिए सही उर्वरक क्यों
डॉ गौर के मुताबिक खड़ी फसल में उर्वरक डालने की प्रक्रिया को टॉप ड्रेसिंग कहते हैं, और धान में इसके लिए सबसे उपयुक्त उर्वरक यूरिया ही है. डीएपी, सुपर फास्फेट और पोटाश जैसे उर्वरकों की जगह खेत में जुताई या रोपाई से पहले ही मिट्टी में मिला देनी चाहिए. इसकी वजह यह है कि फास्फोरस और पोटाश जैसे तत्व मिट्टी में आसानी से घुलते नहीं और पौधे की जड़ें इन्हें तभी बेहतर तरीके से सोख पाती हैं जब ये पहले से मिट्टी में मौजूद हों. खड़ी फसल में इन्हें ऊपर से डालने का फायदा उतना नहीं मिलता जितना उम्मीद की जाती है.
खेत में पानी की मात्रा पर रखें नजर
डॉ गौर ने साफ कहा कि अगर खेत में पानी पूरी तरह भरा हुआ है तो उस हालत में यूरिया बिल्कुल न डालें. ऐसा करने पर यूरिया पानी के साथ बह जाता है या मिट्टी की निचली परतों में रिसकर बर्बाद हो जाता है, जिसे लीचिंग कहा जाता है. नतीजा यह होता है कि पौधे को नाइट्रोजन का लाभ मिलने से पहले ही खाद खेत से बाहर निकल जाती है. उनके मुताबिक टॉप ड्रेसिंग के लिए सही स्थिति यह है कि खेत में सिर्फ हल्की नमी या छपछपाहट भर हो, पानी लबालब न भरा हो.
डीएपी का छिड़काव और जिंक मिलाना कितना नुकसानदेह
डॉ गौर ने यह भी बताया कि आजकल कुछ किसान धान की खड़ी फसल पर सीधे डीएपी का छिड़काव करने लगे हैं, जो सही तरीका नहीं है. डीएपी को हमेशा बुआई या रोपाई से पहले ही मिट्टी में मिलाना चाहिए, ऊपर से छिड़कने पर पौधे को उसका पूरा फायदा नहीं मिलता. इसके अलावा कुछ किसान डीएपी के साथ जिंक मिलाकर छिड़काव कर रहे हैं, जिससे भी बचना चाहिए. डॉ गौर के अनुसार दोनों को एक साथ मिलाने पर पौधे को न तो फास्फोरस का पूरा लाभ मिलता है और न ही जिंक का, यानी दोनों उर्वरकों की ताकत आपस में ही कम हो जाती है.
कंसा अवस्था में यूरिया की तीन खुराक का पूरा गणित
डॉ गौर के अनुसार धान की फसल इस समय कंसा निकलने की अवस्था में है, जो टॉप ड्रेसिंग के लिहाज से बेहद अहम पड़ाव है. इस दौरान यूरिया के साथ जिंक सल्फेट मिलाकर देने से पौधे को नाइट्रोजन के साथ जिंक भी मिल जाता है, जिसका सीधा फायदा फसल की बढ़वार को मिलता है. सामान्य तौर पर धान के लिए एक एकड़ में कुल 70 से 80 किलो यूरिया की जरूरत बताई गई है, जिसे तीन बार में बांटकर देना चाहिए. रोपाई के करीब एक हफ्ते के भीतर पहली खुराक के तौर पर 20 से 25 किलो प्रति एकड़ यूरिया दिया जाना चाहिए. इसके बाद 30 से 35 दिन के आसपास, जब कंसा निकलने लगे, तब दूसरी खुराक के रूप में 30 से 35 किलो प्रति एकड़ यूरिया डालना चाहिए. आखिर में करीब 60 दिन की अवस्था पर तीसरी और अंतिम खुराक के तौर पर 20 से 30 किलो प्रति एकड़ यूरिया दिया जा सकता है.


















