वैश्विक वित्तीय बाजार में इस समय दो विपरीत धाराएं देखने को मिल रही हैं। एक तरफ जहां भू-राजनीतिक मोर्चे पर बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक बाजारों में भारी उथल-पुथल मची हुई है, वहीं दूसरी तरफ ब्रिटिश पाउंड विदेशी मुद्रा बाजार में अपनी मजबूती और लचीलापन बनाए रखने में सफल रहा है। ब्रिटेन के सरकारी बॉन्ड, जिन्हें गिल्ट कहा जाता है, उनकी यील्ड में आई भारी गिरावट और देश के भीतर राजकोषीय चिंताओं के शांत रहने से पाउंड को बड़ा सहारा मिला है। यह स्थिरता ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो शिखर सम्मेलन में यह घोषणा करके वैश्विक स्तर पर सनसनी फैला दी है कि ईरान के साथ हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MoU) अब पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। ट्रंप के इस रुख ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षित निवेश के प्रति निवेशकों का आकर्षण बढ़ा दिया है, जिससे अमेरिकी डॉलर (USD) को मजबूती मिली है और कमोडिटी से लेकर अन्य मुद्राओं पर भारी दबाव देखा जा रहा है।
ब्रिटेन का राजनीतिक घटनाक्रम और पाउंड की स्थिति
ब्रिटेन के भीतर चल रहे राजनीतिक बदलावों के बावजूद पाउंड की अंतर्निहित अस्थिरता नियंत्रण में है। वित्तीय विशेषज्ञ नाइजेल फराज के इस्तीफे और क्लेक्टन सीट से दोबारा चुनाव लड़ने के हालिया घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। एमयूएफजी के विश्लेषक डेरेक हैलपेनी ने इस बात को रेखांकित किया है कि नाइजेल फराज के इस फैसले के बाद भी GBP/USD के अंतर्निहित उतार-चढ़ाव में शायद ही कोई हलचल देखी गई हो। विश्लेषक ने इस उपचुनाव को एक तरह का दिखावा करार दिया है, क्योंकि देश का कोई भी अन्य प्रमुख राजनीतिक दल इस सीट पर चुनाव लड़ने की योजना नहीं बना रहा है। इस स्थिति का विश्लेषण करते हुए उन्होंने बताया कि यदि नाइजेल फराज पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो उनके चुनाव लड़ने के दौरान जांच को निलंबित कर दिया जाएगा। हालांकि, चुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो, यानी वे जीतें या हारें, यह जांच फिर से शुरू हो जाएगी।
बाजार के विश्लेषकों का मानना है कि पाउंड में होने वाला उतार-चढ़ाव इस राजनीतिक ड्रामे के बजाय देश के भावी प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम की संभावित आर्थिक नीतियों से अधिक जुड़ा हुआ है। निवेशकों के लिए राहत की बात यह है कि फिलहाल ब्रिटेन की राजकोषीय स्थिति को लेकर चिंताएं नियंत्रण में बनी हुई हैं। राजकोषीय मोर्चे पर स्थिरता के कारण बाजार में घबराहट की स्थिति नहीं है, जो पाउंड की मजबूती का एक बड़ा कारण है।
गिल्ट यील्ड में गिरावट और मुद्रास्फीति के आंकड़े
ब्रिटिश पाउंड के मजबूत प्रदर्शन का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण ब्रिटेन के 10-वर्षीय गिल्ट यील्ड का नीचे आना है। यह यील्ड 15 मई को दर्ज किए गए अपने हालिया उच्चतम स्तर से काफी नीचे आ चुकी है। अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों की तुलना में ब्रिटेन में यील्ड की यह गिरावट कहीं अधिक स्पष्ट और तेज रही है। यील्ड में आई इस कमी को ब्रिटेन में मुद्रास्फीति की कमजोर रफ्तार से मदद मिली है। हालांकि आमतौर पर कम मुद्रास्फीति को अलग नजरिए से देखा जाता है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इसने निवेशकों के भरोसे को बढ़ाने का काम किया है, जिससे पाउंड को सीधे तौर पर समर्थन मिल रहा है।
यदि वैश्विक मुद्राओं की तुलना की जाए, तो पाउंड एक विशिष्ट स्थिति में खड़ा दिखाई देता है। आमतौर पर मुद्राओं के उतार-चढ़ाव में यील्ड स्प्रेड की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन पाउंड के मामले में यह कारक अब कम असरदार रह गया है। फरवरी के अंत में मध्य पूर्व में शुरू हुए संघर्ष के बाद से पाउंड G10 मुद्राओं में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली मुद्रा के रूप में उभरा है। यील्ड स्प्रेड का प्रभाव कम होने के बावजूद पाउंड की यह मजबूती निवेशकों के बीच इसके प्रति बढ़ते आकर्षण को दर्शाती है।
डोनाल्ड ट्रंप के बयान से वैश्विक बाजारों में मची खलबली
दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने पूरे वित्तीय परिदृश्य को बदल कर रख दिया है। ट्रंप ने नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान स्पष्ट किया कि ईरान के साथ संघर्ष को समाप्त करने के लिए हस्ताक्षरित किया गया समझौता ज्ञापन (MoU) अब खत्म हो चुका है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि वे अब तेहरान के साथ किसी भी तरह की बातचीत या जुड़ाव नहीं रखना चाहते हैं। ट्रंप की इस अचानक की गई घोषणा से वित्तीय बाजारों में घबराहट फैल गई और निवेशकों ने जोखिम वाली संपत्तियों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर (USD) में निवेश करना शुरू कर दिया।
सुरक्षित निवेश के इस प्रवाह के कारण अमेरिकी डॉलर में भारी मजबूती आई है, जिसका असर अन्य प्रमुख मुद्रा जोड़ों पर साफ देखा जा सकता है। मजबूत डॉलर के दबाव के कारण GBP/USD का जोड़ा संघर्ष कर रहा है और यह नकारात्मक दायरे में जाते हुए 1.3350 के स्तर से नीचे आ गया है। इसी तरह, EUR/USD पर भी भारी मंदी का दबाव देखा जा रहा है और बुधवार को यह गिरकर 1.1400 के स्तर की तरफ बढ़ता दिखाई दिया। इसके अलावा, अमेरिकी बाजार के कारोबार के दौरान फेडरल रिजर्व द्वारा जून की नीतिगत बैठक के मिनट्स जारी किए जाने हैं, जिसे लेकर निवेशक काफी सतर्कता बरत रहे हैं।
कमोडिटीज और क्रिप्टोकरेंसी बाजार का हाल
भू-राजनीतिक अनिश्चितता का असर कमोडिटी बाजार पर भी गहरा पड़ा है। सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर के अत्यधिक मजबूत होने के कारण सोने की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। बुधवार को सोना लाल निशान में चला गया और यह $4,050 के करीब कारोबार करता देखा गया। निवेशक इस समय सोने के बजाय डॉलर और नकद संपत्तियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके विपरीत, कच्चे तेल के बाजार में जबरदस्त तेजी देखी गई है। यूरोपीय व्यापारिक सत्र के दौरान वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) कच्चे तेल की कीमत 3.2% की भारी बढ़त के साथ लगभग $74.30 प्रति बैरल पर पहुंच गई। यह पिछले दो हफ्तों में कच्चे तेल का सबसे उच्चतम स्तर है। ट्रंप द्वारा ईरान समझौते की समाप्ति की पुष्टि करने से वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की आपूर्ति बाधित होने का खतरा एक बार फिर बढ़ गया है, जिससे तेल की कीमतों में यह उछाल आया है।
क्रिप्टोकरेंसी और डिजिटल संपत्तियों की बात करें तो वहां भी मंदी का माहौल है। पाई नेटवर्क (PI) की कीमत लगातार पांचवें दिन गिरती हुई $0.1000 के करीब पहुंच गई है। खुदरा निवेशकों के बीच इस संपत्ति को लेकर धारणा नकारात्मक बनी हुई है, जिसके कारण ओपन इंटरेस्ट और फंडिंग रेट दोनों में लगातार गिरावट देखी जा रही है। तकनीकी विश्लेषण के लिहाज से पाई नेटवर्क का आउटलुक मंदी का बना हुआ है, और ओवरसोल्ड स्थितियों के बावजूद इस पर बिकवाली का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
केंद्रीय बैंकों की रणनीति में बड़ा बदलाव
इस पूरे घटनाक्रम के बीच, वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों की संचार रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पिछले कई वर्षों से फेडरल रिजर्व, यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ इंग्लैंड जैसे प्रमुख केंद्रीय बैंक बाजार को पहले से यह संकेत देते आ रहे थे कि उनकी भविष्य की नीतियां कैसी होंगी, जिसे वित्तीय जगत में फॉरवर्ड गाइडेंस कहा जाता है। हालांकि, अब ये नीतिकार इस फॉरवर्ड गाइडेंस की नीति से पीछे हट रहे हैं। भविष्य में केंद्रीय बैंक अपनी आगामी योजनाओं के बारे में बहुत कम जानकारी साझा कर सकते हैं, जिससे ट्रेडर्स और निवेशकों को आने वाले समय में अधिक अनिश्चितता और उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है।











