सोमवार को वैश्विक ऊर्जा बाजार में एकाएक उथल-पुथल मच गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी और इसके बाद कच्चे तेल की कीमतें तेजी से उछल पड़ीं। ब्रेंट क्रूड 2% से ज्यादा बढ़कर 82 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड भी 78 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया। इस तेजी ने निवेशकों और तेल आयात करने वाले देशों की चिंताएं एक बार फिर बढ़ा दी हैं।
ट्रंप ने दी किस बात पर चेतावनी?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने ईरान को स्पष्ट संदेश दिया है कि अगर हिजबुल्लाह की ओर से इजरायल पर हमले जारी रहे, या होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की कोशिश की गई, तो अमेरिका सख्त कदम उठाएगा। इस बयान के बाद बाजार में यह डर फैल गया कि दोनों देशों के बीच चल रही शांति वार्ता पटरी से उतर सकती है, जिसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ेगा।
स्विट्जरलैंड में वार्ता जारी, लेकिन माहौल अनिश्चित
अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में बातचीत चल रही है। लेकिन ट्रंप की धमकी के बाद ईरानी मीडिया ने दावा किया कि तेहरान ने कुछ समय के लिए वार्ता से कदम खींच लिया था। वहीं, वार्ता से जुड़े सूत्रों का कहना है कि बातचीत वास्तव में रुकी नहीं और कई अहम मुद्दों पर दोनों पक्षों ने चर्चा की। इस परस्पर विरोधी जानकारी ने बाजार की बेचैनी और गहरी कर दी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे संवेदनशील मुद्दा
इस पूरे विवाद के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ईरान ने एक बार फिर दावा किया कि उसने इस रास्ते को बंद कर दिया है, लेकिन फिलहाल तेल की आपूर्ति सामान्य बनी हुई है। अगर यह रास्ता वाकई बाधित होता है, तो पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहरा सकता है।
पहले गिरे थे दाम, अब अचानक उछाल
बीते कुछ हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी का दौर था। निवेशकों को उम्मीद थी कि अमेरिका-ईरान के बीच तनाव कम होने से ऊर्जा बाजार स्थिर रहेगा। इसी सोच के कारण तेल 73 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया था। लेकिन ट्रंप के ताजा बयान ने उस राहत पर पानी फेर दिया और कीमतें एक झटके में 82 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं।
भारत की जेब पर क्या होगा असर?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का अधिकांश हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। इसलिए जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों पर सीधा दबाव आता है। परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो सकती हैं। अगर यह तेजी लंबे समय तक बनी रही, तो देश में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।













