वैश्विक विदेशी मुद्रा बाज़ार में यूरोपीय साझा मुद्रा भारी दबाव में आ गई है, जहाँ ब्रिटिश पाउंड के सामने यूरो दो महीने के सबसे निचले स्तर पर फिसल गया है। मुद्रा विनिमय बाज़ार में EUR/GBP जोड़ी ने 0.8525 के स्तर पर तीव्र प्रतिक्रिया दिखाई और यह लुढ़ककर 0.8500 के ठीक ऊपर पहुँच गई। यह गिरावट केवल पाउंड तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के सामने यूरो लगातार कमज़ोर साबित हो रहा है। यूरोज़ोन में महँगाई के ताज़ा और गर्म आँकड़ों के साथ फ़्रांस के गंभीर वित्तीय संकट और कच्चे तेल की ऊँची क़ीमतों ने यूरो पर चौतरफ़ा मार की है।
फ़्रांस का बढ़ता सार्वजनिक क़र्ज़ और जर्मन बॉन्ड स्प्रेड का संकट
यूरोपीय मुद्रा के कमज़ोर होने के पीछे सबसे बड़ा कारण फ़्रांस के उधार लेने की बढ़ती लागत को माना जा रहा है। शुक्रवार को जर्मन और फ़्रांसीसी सरकारी बॉन्ड यील्ड के बीच का अंतर 140 बेसिस पॉइंट से भी अधिक बढ़ गया। यह भारी अंतर वर्ष 2012 में यूरोज़ोन के क़र्ज़ संकट के बाद से अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है। वित्तीय बाज़ार इस बढ़ते अंतर को फ़्रांस की राजकोषीय सेहत के लिए बड़ा ख़तरा मान रहे हैं, जिससे पूरे यूरोज़ोन की वित्तीय स्थिरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
फ़्रांसीसी सरकार ने गुरुवार को अपना वर्ष 2027 का बजट विधेयक पेश किया था। इस मसौदे में वित्तीय घाटे को कम करने के कई कड़े क़दम शामिल किए गए हैं। इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों और वित्तीय जानकारों को बहुत कम उम्मीद है कि यह बजट देश की बँटी हुई संसद से आसानी से पारित हो पाएगा। अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए विपक्षी दल राष्ट्रपति मैक्रों की जगह लेने की होड़ में लामबंद हो रहे हैं और राजनीतिक विरोध के चलते इस बजट प्रस्ताव पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। राजनीतिक अनिश्चितता और सार्वजनिक क़र्ज़ के इस बोझ ने निवेशकों के भरोसे को बुरी तरह डिगा दिया है।
अमेरिकी डॉलर के सामने यूरो में मई 2025 के बाद सबसे बड़ी गिरावट
ब्रिटिश पाउंड के अलावा अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले भी यूरो में भारी बिकवाली देखी गई है। EUR/USD जोड़ी गिरकर मई 2025 के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर आ चुकी है। बुधवार को यह जोड़ी 1.1312 के स्तर तक नीचे गिर गई थी, जो जनवरी में दर्ज किए गए 1.2082 के उच्चतम स्तर से काफ़ी नीचे कारोबार कर रही है। मुद्रा बाज़ार के जानकारों के अनुसार यूरो की इस लगातार गिरावट की मुख्य वजह अमेरिकी डॉलर की मज़बूती, वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितता और महँगी ऊर्जा क़ीमतों के चलते यूरोप की कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था है। कच्चे तेल के महँगे होने से यूरोप के विनिर्माण और घरेलू बाज़ार पर बड़ा असर पड़ रहा है।
अमेरिकी रोज़गार आँकड़ों से पहले वैश्विक बाज़ार की चाल
विदेशी मुद्रा बाज़ार के ट्रेडर अब शुक्रवार को 12:30 GMT पर जारी होने वाले अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो के सितंबर नॉन-फ़ार्म पेरोल (NFP) रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे हैं। इस बहुप्रतीक्षित रोज़गार रिपोर्ट से पहले बाज़ार में सावधानी का माहौल है। निवेशकों का अनुमान है कि अगस्त के 162K की मज़बूत वृद्धि के मुक़ाबले सितंबर में अमेरिकी अर्थव्यवस्था केवल 90K नई नौकरियाँ ही जोड़ पाई होगी। वहीं बेरोज़गारी दर 4.1% पर स्थिर रहने की संभावना है, जबकि औसत प्रति घंटा कमाई द्वारा मापी जाने वाली मासिक वेतन महँगाई 0.3% पर स्थिर रहने का अनुमान लगाया गया है।
इस रिपोर्ट के सामने आने से ठीक पहले अमेरिकी डॉलर अपने 17 महीने के उच्चतम स्तर से थोड़ा पीछे हटा है, क्योंकि कई ट्रेडर्स ने मुनाफ़ा वसूली शुरू कर दी है। इसी बीच एशियाई कारोबारी सत्र में AUD/USD संभलकर 0.6950 की ओर बढ़ा है, जिसे वैश्विक यील्ड और महँगाई के जोखिमों के बीच ऑस्ट्रेलियाई रिज़र्व बैंक द्वारा नवंबर में ब्याज दरें बढ़ाए जाने की उम्मीदों से सहारा मिला। दूसरी ओर, टोक्यो में अपेक्षा से अधिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आँकड़े आने और डॉलर के पीछे हटने के बाद भी USD/JPY जोड़ी 158.00 के आसपास संघर्ष करती दिखी।
सोने और क्रिप्टोकरेंसी बाज़ार का रुख़
अमेरिकी रोज़गार रिपोर्ट के आने से पहले कमोडिटी और डिजिटल एसेट बाज़ार में भी मिला-जुला रुझान देखने को मिला है। शुक्रवार को यूरोपीय सत्र की शुरुआत से पहले सोना 4,200 डॉलर प्रति औंस के नीचे एक सीमित दायरे में कारोबार करता रहा। ट्रेडर लेबर डेटा आने तक किसी बड़े दांव से बच रहे हैं।
इसके विपरीत डिजिटल मुद्रा बाज़ार में शुक्रवार को व्यापक सुधार देखने को मिला। क्रिप्टोकरेंसी बाज़ार में तेज़ी की अगुवाई बिटकॉइन ने की, जो 86,000 डॉलर के पार निकल गया। इसी तरह इथेरियम भी 2,700 डॉलर के ऊपर जाकर अपनी मज़बूत स्थिति दिखा रहा है, हालांकि 2,800 डॉलर का स्तर उसके लिए तात्कालिक बाधा बना हुआ है। वहीं रिपल की क़ीमत 1.54 डॉलर के आसपास बनी हुई है। पूरे वित्तीय बाज़ार की नज़रें अब आने वाले नीतिगत फ़ैसलों और महँगाई के दबावों पर टिकी हैं।



















