वैश्विक और घरेलू सर्राफा बाजारों में इस समय स्थिरता का माहौल देखा जा रहा है, क्योंकि दुनिया भर के निवेशक प्रमुख केंद्रीय बैंकों के आगामी नीतिगत फैसलों पर अपनी नजरें टिकाए हुए हैं। सोने और चांदी की कीमतों में पिछले कारोबारी सत्रों के दौरान भारी बिकवाली का दबाव देखा गया था, लेकिन अब ये कीमतें एक सीमित दायरे में कारोबार कर रही हैं। इसके साथ ही, मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव भी बाजार की धारणाओं को लगातार प्रभावित कर रहा है। निवेशक इस बात का बारीकी से आकलन कर रहे हैं कि इन संघर्षों का वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं पर क्या असर पड़ सकता है।
घरेलू कमोडिटी बाजार का हाल
भारतीय घरेलू बाजार की बात करें, तो मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर पिछले सप्ताह के दौरान सोने और चांदी का कारोबार भारी उतार-चढ़ाव के साथ बंद हुआ। MCX पर सोने की क्लोजिंग कीमत 1,43,066 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई। वहीं, चांदी की क्लोजिंग कीमत 2,22,301 रुपये प्रति किलोग्राम रही। हालांकि दोनों कीमती धातुएं सप्ताह के अंत में हरे निशान में बंद होने में कामयाब रहीं, लेकिन पूरे सप्ताह के दौरान बाजार में भारी अस्थिरता देखी गई। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक संकेतों के कारण कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव के साथ मंदी का रुख बना रहा, जिससे स्थानीय खरीदार भी काफी सतर्क नजर आए और बाजार की दिशा को समझने की कोशिश करते रहे।
अंतरराष्ट्रीय स्पॉट मार्केट और कच्चे तेल का दबाव
वैश्विक बाजार में, स्पॉट गोल्ड की कीमत लगभग 4,050 डॉलर प्रति औंस के आसपास बनी रही। पिछले सप्ताह आई आक्रामक बिकवाली के बाद यह कीमती धातु अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास कर रही है। इसके साथ ही, 24 जुलाई को कारोबारी सत्र की समाप्ति पर स्पॉट सिल्वर की कीमत लगभग 58 डॉलर प्रति औंस दर्ज की गई। कीमती धातुओं पर इस दबाव का मुख्य कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति में बाधा आने की आशंकाओं के कारण कच्चे तेल की कीमतें मजबूत हुई हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई का डर दोबारा सताने लगा है।
जब तेल की बढ़ती कीमतों के कारण महंगाई का दबाव बढ़ता है, तो केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो जाता है। चूंकि सोना एक ऐसी संपत्ति है जिस पर कोई ब्याज या नियमित रिटर्न नहीं मिलता, इसलिए ऊंची ब्याज दरों के माहौल में इसकी मांग कमजोर हो जाती है। निवेशक सरकारी बॉन्ड जैसे सुरक्षित और ब्याज देने वाले वित्तीय विकल्पों की तरफ रुख करने लगते हैं, जिससे सोने का आकर्षण कम हो जाता है।
केंद्रीय बैंकों के फैसले और एशियाई मांग का रुझान
अब सभी की निगाहें अगले सप्ताह होने वाली फेडरल रिजर्व की बैठक पर टिकी हैं। हालांकि इस बैठक में अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों को स्थिर रखने की व्यापक उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन बाजार के जानकार सितंबर में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की लगभग 80% संभावना जता रहे हैं। दूसरी ओर, यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) ने भी गुरुवार को अपनी बैठक में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया, लेकिन उसने सितंबर में दरों में बढ़ोतरी के रास्ते खुले रखे हैं।
एशिया में भौतिक सोने की मांग की स्थिति काफी अलग रही। भारत में कीमतें बहुत अधिक होने के कारण स्थानीय ग्राहकों ने खरीदारी से दूरी बना ली, जिसके कारण सोने पर मिलने वाला डिस्काउंट सात सप्ताह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के अनुसार, इसके विपरीत चीन में सोने की खरीदारी में सुधार के संकेत मिले हैं, जिसने वैश्विक स्तर पर कीमतों को कुछ सहारा देने का काम किया है।



















