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फ्रांस के सरकारी बॉन्ड बाजार में उथल-पुथल से यूरो पर बढ़ा भारी दबाव, यूरोजोन में वित्तीय संकट का नया खतराबाज़ार
9 अक्तू॰ 2026, 7:48 pm (54 मिनट पहले)· 0

फ्रांस के सरकारी बॉन्ड बाजार में उथल-पुथल से यूरो पर बढ़ा भारी दबाव, यूरोजोन में वित्तीय संकट का नया खतरा

फ्रांसीसी सरकारी ऋण पर ब्याज दरें 5 प्रतिशत के करीब पहुंचने और जर्मनी के साथ यील्ड का अंतर 150 बेसिस पॉइंट्स से ऊपर निकलने के बाद यूरो 17 महीने के निचले स्तर पर आ गया है, जिससे यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में साझा यूरोपीय मुद्रा यूरो गंभीर दबाव का सामना कर रही है, जहां यूरो-डॉलर विनिमय दर 1.1161 के 17 महीने के निचले स्तर के बेहद करीब पहुंच गई है। अपने वार्षिक शिखर स्तर से यह मुद्रा 7 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज कर चुकी है। आमतौर पर मुद्रा में इस प्रकार की कमजोरी को समूचे यूरोजोन की व्यापक आर्थिक मंदी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस समय यूरो पर मंडराते संकट की जड़ें पूरे महाद्वीप में न होकर एक विशेष देश के ऋण बाजार में केंद्रित हैं। यूरोप की वित्तीय स्थिरता का प्रमुख आधार माना जाने वाला फ्रांस का सॉवरेन बॉन्ड बाजार इस समय निवेशकों के गंभीर अविश्वास के दौर से गुजर रहा है।

फ्रांस के सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दरों में ऐतिहासिक उछाल

फ्रांसीसी सरकार के 10-वर्षीय बॉन्ड की यील्ड 2 अक्टूबर को मनोवैज्ञानिक रूप से संवेदनशील 5.00 प्रतिशत के स्तर के बेहद करीब पहुंच गई। ब्याज दरों का यह स्तर फ्रांस में वर्ष 2002 के बाद से नहीं देखा गया था। इससे भी अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि सुरक्षित माने जाने वाले जर्मन सरकारी बॉन्ड की तुलना में फ्रांसीसी बॉन्ड का यील्ड स्प्रेड हाल ही में 150 बेसिस पॉइंट्स के पार निकल गया। इस तरह का बड़ा अंतर अंतिम बार 2011-2012 के यूरोपीय संप्रभु ऋण संकट के चरम दौर में देखा गया था।

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यह स्थिति यूरोजोन के भीतर वित्तीय जोखिम के पारंपरिक ढांचे में आए एक बड़े बदलाव को रेखांकित करती है। ऐतिहासिक रूप से, यूरोपीय ऋण बाजार में तनाव हमेशा ग्रीस, इटली, स्पेन और पुर्तगाल जैसी परिधीय अर्थव्यवस्थाओं तक सीमित रहता था। इसके विपरीत, आज यूरोजोन की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था स्वयं बाजार की बेचैनी का मुख्य केंद्र बन चुकी है। विदेशी मुद्रा बाजार के विश्लेषक अब केवल यह नहीं देख रहे हैं कि फ्रांस अपनी सार्वजनिक वित्तीय स्थिति को कैसे संभालेगा, बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह बन गया है कि क्या फ्रांसीसी बॉन्ड बाजार का यह संकट पूरे यूरोजोन में फैलकर यूरोपीय सेंट्रल बैंक यानी ECB को अपनी मौद्रिक नीतियों में बड़ा बदलाव करने पर विवश कर देगा।

जोखिम प्रीमियम और ओएटी-बुंड स्प्रेड में ऐतिहासिक बदलाव

फ्रांसीसी बॉन्ड यील्ड में यह तेजी आंशिक रूप से वैश्विक ऋण बाजारों में आई व्यापक बिकवाली से भी जुड़ी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की बढ़ती कीमतें, लंबे समय से बनी हुई मुद्रास्फीति और प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों को लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनाए रखने की संभावनाओं ने दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए उधारी की लागत बढ़ा दी है। इसके बावजूद फ्रांस की स्थिति बाकी देशों से काफी अलग और गंभीर है, क्योंकि निवेशक उसके सरकारी ऋण पत्रों को रखने के लिए भारी जोखिम प्रीमियम की मांग कर रहे हैं।

फ्रांसीसी 10-वर्षीय बॉन्ड (OAT) और जर्मन 10-वर्षीय बॉन्ड (Bund) के बीच यील्ड का अंतर, जिसे बाजार में ओएटी-बुंड स्प्रेड कहा जाता है, निवेशकों के रुख को मापने का सबसे सटीक पैमाना बन गया है। केवल फ्रांसीसी यील्ड को देखने के बजाय यह स्प्रेड स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि बाजार फ्रांस के राजकोषीय भविष्य को लेकर कितना चिंतित है। अक्टूबर की शुरुआत में यह स्प्रेड कुछ ही समय में 150 बेसिस पॉइंट्स से ऊपर चला गया, जबकि कुछ महीने पहले यह अंतर काफी कम था। इसी दौरान सुरक्षित निवेश की तलाश में वैश्विक पूंजी जर्मन बॉन्ड की ओर मुड़ी है, जिससे दोनों देशों के बाजारों का फासला और बढ़ गया है।

वर्तमान परिदृश्य का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि फ्रांस को अब इटली और ग्रीस की तुलना में भी अधिक ब्याज दर पर कर्ज उठाना पड़ रहा है। ऐतिहासिक रूप से ये दोनों देश यूरोपीय कर्ज संकट के मुख्य चेहरे रहे हैं। संप्रभु जोखिम के इस नए समीकरण पर टिप्पणी करते हुए डॉयचे बैंक के विश्लेषक जिम रीड का कहना है कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह एक नए यूरो संप्रभु संकट की शुरुआत है या फिर वित्तीय बाजारों ने जरूरत से ज्यादा घबराहट में प्रतिक्रिया दी है।

फिलहाल फ्रांस के लिए वित्तीय बाजारों से पूंजी जुटाने का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। हाल ही में आयोजित 12 अरब यूरो की फ्रांसीसी सरकारी बॉन्ड नीलामी में पेश की गई राशि से दोगुने से अधिक की मांग दर्ज की गई। इसका अर्थ यह है कि संकट पूंजी की उपलब्धता का नहीं, बल्कि उसकी अत्यधिक लागत का है। निवेशक फ्रांस को कर्ज देने से मना नहीं कर रहे हैं, लेकिन वे बढ़े हुए जोखिम की भरपाई के लिए भारी ब्याज की शर्त रख रहे हैं।

राजकोषीय घाटा और सरकार की साख पर गहराता सवाल

फ्रांसीसी बॉन्ड बाजार में आ रही यह गिरावट दरअसल सरकार द्वारा सार्वजनिक वित्त को टिकाऊ रास्ते पर लाने की क्षमता को लेकर बढ़ते अविश्वास का परिणाम है। फ्रांस का कुल सार्वजनिक ऋण उसके सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP के 120 प्रतिशत के करीब पहुंच रहा है, जबकि वार्षिक बजट घाटा देश के कुल आर्थिक उत्पादन के 5 प्रतिशत से ऊपर बना हुआ है। इसके साथ ही सरकार को वर्ष 2027 में लगभग 340 अरब यूरो के नए कर्ज की व्यवस्था करनी है, और यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब नए ऋण जारी करने की लागत ऐतिहासिक रूप से बढ़ चुकी है।

सरकार के प्रस्तावित 2027 बजट का लक्ष्य राजकोषीय घाटे को चालू वर्ष के लगभग 5.4 प्रतिशत से घटाकर करीब 5 प्रतिशत पर लाना है। हालांकि, घाटे में कमी की यह बेहद धीमी गति अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को यह भरोसा दिलाने में नाकाम रही है कि देश अपने कर्ज के बोझ को जल्द नियंत्रित कर पाएगा।

आर्थिक आंकड़ों के अलावा राजनीतिक अस्थिरता ने मामले को और अधिक जटिल बना दिया है। प्रधानमंत्री सेबस्टियन लेकोर्नू को इस बजट को एक अत्यंत विभाजित संसद से पारित कराना होगा, जबकि वर्ष 2027 के राष्ट्रपति चुनाव की राजनीतिक सरगर्मियां पहले ही तेज हो चुकी हैं। संसद में प्रमुख राजनीतिक हस्तियां, जिनमें मरीन ले पेन और ज्यां-ल्यूक मेलेंशों शामिल हैं, पूरी तरह से विपरीत राजकोषीय और आर्थिक नीतियों की वकालत कर रहे हैं। इन नेताओं के बयानों से वित्तीय बाजारों को कोई ठोस आश्वासन नहीं मिल पाया है। निवेशकों को आशंका है कि चुनावी लाभ हासिल करने की होड़ में राजकोषीय घाटे को कम करने की अनिवार्य आवश्यकता की अनदेखी की जा सकती है।

राजनीतिक खींचतान से परे, उच्च सार्वजनिक ऋण के साथ बॉन्ड यील्ड में लगातार होने वाली बढ़ोतरी सरकार के ब्याज भुगतान बिल को तेजी से बढ़ाती है। जैसे-जैसे पुराने सस्ते बॉन्ड परिपक्व होंगे, फ्रांस को उनका पुनर्वित्तपोषण कहीं अधिक ब्याज दरों पर करना होगा। इससे एक ऐसा दुष्चक्र शुरू होने का खतरा है जहां बढ़ता ब्याज खर्च बजट घाटे को बिगाड़ेगा, जिससे निवेशक और अधिक जोखिम प्रीमियम मांगेंगे और सरकार की उधारी लागत और बढ़ जाएगी। हालांकि फ्रांस किसी संप्रभु दिवालियापन के कगार पर नहीं है, लेकिन वह राजकोषीय विश्वसनीयता के गंभीर संकट से जूझ रहा है जिसके परिणाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिखने लगे हैं।

यूरोजोन में वित्तीय संक्रमण और अन्य देशों पर असर

फ्रांस की आंतरिक मुश्किलें पूरे यूरोजोन और साझा मुद्रा यूरो के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच चुकी हैं। सैद्धांतिक रूप से, यूरोजोन के किसी एक सदस्य देश के बॉन्ड यील्ड में वृद्धि से साझा मुद्रा का बहुत बड़ा अवमूल्यन नहीं होना चाहिए, क्योंकि अन्य मजबूत अर्थव्यवस्थाएं स्थिर वित्तीय स्थितियों के साथ संतुलन बनाए रख सकती हैं। लेकिन यह संतुलन उस समय पूरी तरह बिगड़ जाता है जब बाजार में यह डर फैलने लगे कि एक बड़ी अर्थव्यवस्था का संकट अन्य सदस्य देशों के ऋण बाजारों को भी अपनी चपेट में ले लेगा।

बाजार में संक्रमण के शुरुआती संकेत पहले ही दिखाई देने लगे हैं। इतालवी और जर्मन सरकारी बॉन्ड के बीच का यील्ड स्प्रेड हाल ही में 130 बेसिस पॉइंट्स के करीब पहुंच गया, जो कोरोना महामारी के बाद से इसकी सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त है। इसके साथ ही अन्य यूरोपीय देशों के सॉवरेन स्प्रेड में भी विस्तार देखा गया है और यूरोपीय बैंकिंग शेयरों पर भारी बिकवाली का दबाव बना हुआ है।

यह घटनाक्रम यूरो मुद्रा के लिए विशेष रूप से खतरनाक है क्योंकि यह एक राष्ट्रीय बजटीय समस्या को साझा यूरोपीय वित्तीय जोखिम में बदल देता है। इस बदलते संबंध पर गोल्डमैन सैक्स के रणनीतिकारों का आकलन है कि सरकारी बॉन्ड स्प्रेड मुद्रा के लिए तब तक मायने नहीं रखते जब तक कि वे मुद्रा के लिए सबसे महत्वपूर्ण और एकमात्र कारक न बन जाएं। जब तक फ्रांस का संकट अकेला था, तब तक यूरो-डॉलर विनिमय दर पर इसका सीमित असर था, लेकिन जैसे ही इसका असर अन्य यूरोपीय बॉन्ड बाजारों में दिखने लगा, निवेशकों ने पूरी साझा मुद्रा के जोखिम का नए सिरे से मूल्यांकन शुरू कर दिया।

बैंक ऑफ अमेरिका के विदेशी मुद्रा रणनीतिकारों के अनुसार, फ्रांस और जर्मनी के बॉन्ड स्प्रेड में प्रत्येक 10 बेसिस पॉइंट्स की अतिरिक्त बढ़ोतरी यूरो-डॉलर विनिमय दर में लगभग 0.4 प्रतिशत की गिरावट से जुड़ी हो सकती है। यह संबंध भले ही पूरी तरह यांत्रिक न हो, लेकिन यह दर्शाता है कि संप्रभु ऋण के तनाव के प्रति यूरो कितना संवेदनशील हो चुका है। एबीएन एमरो ने भी इस बात पर जोर दिया है कि जब किसी प्रमुख यूरोजोन देश या कई देशों में राजनीतिक या राजकोषीय चिंताओं के कारण बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ती है, तो यूरो कमजोर होने लगता है। यूरोजोन के विभिन्न ऋण बाजारों में संकट फैलने की आशंका ही यूरो पर निरंतर बिकवाली का दबाव बना रही है।

बढ़ती बॉन्ड यील्ड और यूरोपीय सेंट्रल बैंक का मौद्रिक विरोधाभास

साझा मुद्रा यूरो की वर्तमान कमजोरी एक अत्यंत जटिल मौद्रिक विरोधाभास पैदा करती है। पारंपरिक वित्तीय नियमों के अनुसार, जब किसी अर्थव्यवस्था में बॉन्ड यील्ड बढ़ती है और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदें मजबूत होती हैं, तो उस देश की मुद्रा को समर्थन मिलता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए उस मुद्रा की संपत्तियां अधिक आकर्षक हो जाती हैं। परंतु यह नियम केवल तभी काम करता है जब यील्ड में तेजी मजबूत आर्थिक विकास या केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का परिणाम हो। जब ब्याज दरें सरकारी कर्ज की स्थिरता पर मंडराते अविश्वास के कारण बढ़ती हैं, तो मुद्रा पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

यूरोजोन में ठीक यही स्थिति पैदा हो गई है। यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) ने मुद्रास्फीति के दबाव को नियंत्रित करने के उद्देश्य से इस वर्ष दो बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है, जिससे उसकी डिपॉजिट फैसिलिटी दर बढ़कर 2.50 प्रतिशत पर पहुंच गई है। अगस्त में यूरोजोन की वार्षिक मुद्रास्फीति 3.2 प्रतिशत थी, जो सितंबर में बढ़कर 3.8 प्रतिशत के स्तर पर आ गई। यह तीन वर्षों में मुद्रास्फीति का उच्चतम स्तर है, जिसमें मुख्य योगदान ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का रहा है। सामान्य परिस्थितियों में महंगाई का यह स्तर नीतिगत ब्याज दरों में और अधिक बढ़ोतरी की मांग करता।

लेकिन वास्तविक अर्थव्यवस्था में बॉन्ड बाजार केंद्रीय बैंक से पहले ही वित्तीय स्थितियों को बेहद कड़ा कर चुके हैं। जब संप्रभु बॉन्ड की यील्ड बढ़ती है, तो केंद्रीय बैंक के किसी नए नीतिगत फैसले के बिना भी आम कारोबारियों, घरेलू उपभोक्ताओं और सरकारों के लिए उधारी की लागत बढ़ जाती है। इसका सीधा असर नए निवेश में कमी और आर्थिक विकास की सुस्ती के रूप में सामने आता है, जो अंततः मुद्रास्फीति के दबाव को कम कर सकता है।

इसके कारण मुद्रा बाजार के निवेशक यह मानने लगे हैं कि उच्च मुद्रास्फीति के बावजूद ईसीबी अपनी ब्याज दरों में उतनी आक्रामक बढ़ोतरी नहीं कर पाएगा जितनी पहले उम्मीद की जा रही थी। वित्तीय संस्थान आईएनजी के अनुसार, फ्रांस के बॉन्ड तनाव का यूरो पर दोहरे माध्यम से असर पड़ रहा है। पहला प्रत्यक्ष माध्यम राजकोषीय जोखिम प्रीमियम का जुड़ना है, और दूसरा अप्रत्यक्ष माध्यम ईसीबी द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदों का घटना है। आईएनजी के आंकड़ों के अनुसार, ईसीबी द्वारा आगामी मार्च बैठक तक नीतिगत दरों में बढ़ोतरी का बाजार अनुमान 24 सितंबर को 80 बेसिस पॉइंट्स था, जो 6 अक्टूबर तक घटकर लगभग 45 बेसिस पॉइंट्स पर आ गया।

वित्तीय विखंडन की दोहरी चुनौती और ईसीबी का असमंजस

यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बॉन्ड यील्ड का बढ़ना नहीं है, बल्कि सदस्य देशों के बीच उधारी की लागत में बढ़ता भारी अंतर है जिसे वित्तीय विखंडन कहा जाता है। यूरोपीय मौद्रिक संघ का मूलभूत आधार यह है कि फ्रैंकफर्ट में ईसीबी द्वारा लिए गए नीतिगत फैसले पूरे यूरोजोन में समान रूप से प्रभावी होने चाहिए। लेकिन जब फ्रांस और इटली जैसे देशों में ब्याज दरें जर्मनी की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ती हैं, तो सदस्य देशों की वित्तीय स्थितियां एक-दूसरे से पूरी तरह अलग दिशा में जाने लगती हैं।

स्वतंत्र राजकोषीय नीतियों वाले देशों के इस मौद्रिक संघ के लिए वित्तीय विखंडन एक गंभीर खतरा प्रस्तुत करता है। यदि ईसीबी महंगाई को रोकने के लिए अपनी नीतिगत दरों में और बढ़ोतरी करता है, तो भारी कर्ज के बोझ तले दबी सरकारों पर उधारी का दबाव असहनीय स्तर तक पहुंच सकता है। ओवरसी-चाइनीज बैंकिंग कॉरपोरेशन यानी ओसीबीसी के अनुसार, वित्तीय विखंडन का बढ़ता भय sovereign उधारी लागत और रिस्क प्रीमियम को बढ़ाकर वित्तीय स्थितियों को कठोर बना रहा है। इससे यह जोखिम उत्पन्न हो रहा है कि वित्तीय स्थिरता की चिंताओं के कारण ईसीबी मुद्रास्फीति के खिलाफ अपनी सख्ती को कम करने पर मजबूर हो जाएगा।

ईसीबी अब दो परस्पर विरोधी लक्ष्यों के बीच फंस गया है। एक तरफ लगभग 4 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच चुकी महंगाई से निपटने के लिए मौद्रिक नीति को सख्त बनाए रखना आवश्यक है ताकि मूल्य वृद्धि अर्थव्यवस्था में स्थायी रूप न ले ले। दूसरी तरफ, संप्रभु बॉन्ड पर ब्याज दरों में अनियंत्रित वृद्धि आर्थिक मंदी ला सकती है और यूरोपीय ऋण बाजार के एक बड़े हिस्से को अस्थिर कर सकती है।

यूरो की कमजोरी ने इस दुविधा को और गंभीर बना दिया है। जब मुद्रा कमजोर होती है, तो डॉलर में आयात होने वाली वस्तुओं, विशेष रूप से कच्चे तेल और अन्य आवश्यक कमोडिटीज की लागत बढ़ जाती है। आयातित महंगाई का यह दबाव ऐसे समय में बढ़ रहा है जब बॉन्ड बाजार का संकट ईसीबी के हाथ बांध रहा है। इस प्रकार केंद्रीय बैंक को एक तरफ कमजोर यूरो के कारण बढ़ती महंगाई से लड़ना है, और दूसरी तरफ बॉन्ड बाजार को बिखरने से भी बचाना है।

मुद्रा बाजार का भविष्य और आगे का रास्ता

यूरो की वर्तमान कमजोरी के लिए केवल फ्रांस को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में ऊंची बॉन्ड यील्ड, अमेरिकी डॉलर (USD) की मजबूत अंतरराष्ट्रीय मांग और अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Fed) तथा ईसीबी की मौद्रिक नीतियों का अंतर लंबे समय से EUR/USD जोड़ी को प्रभावित कर रहा है। इसके बावजूद, फ्रांस के बॉन्ड संकट ने एक ऐसा नया ढांचागत जोखिम खड़ा कर दिया है जो यूरोपीय मुद्रा की दिशा को मौलिक रूप से बदल रहा है।

आईएनजी का आकलन है कि वर्तमान में यूरो के मूल्य में शामिल राजकोषीय जोखिम प्रीमियम अभी मध्यम स्तर पर है। यदि विभिन्न सदस्य देशों के सरकारी ऋण को लेकर तनाव और गहराता है, तो यूरो में और तेज गिरावट आ सकती है। गंभीर संकट की स्थिति में यूरो-डॉलर विनिमय दर के 1.1100 या 1.1000 के स्तर तक फिसलने की संभावना जताई गई है। इसी प्रकार एमयूएफजी ने भी सतर्क रुख अपनाते हुए कहा है कि जब तक फ्रांस की वित्तीय अनिश्चितता और संक्रमण का खतरा बना रहेगा, तब तक यूरो में गिरावट का जोखिम बरकरार रहेगा।

आने वाले समय में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से तीन प्रमुख घटनाक्रमों पर टिकी रहेगी: फ्रांस और जर्मनी के बॉन्ड स्प्रेड की दिशा, क्या यह तनाव अन्य यूरोपीय देशों के ऋण बाजार में फैलता है, और वित्तीय विखंडन को रोकने के लिए ईसीबी क्या कदम उठाता है। यद्यपि फ्रांस तुरंत किसी दिवालियापन के संकट में नहीं है और न ही यूरोजोन 2012 जैसे पूर्ण संप्रभु ऋण संकट के मुहाने पर खड़ा है, फिर भी बॉन्ड बाजार से मिलने वाली चेतावनियों को अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। यूरो के लिए सबसे बड़ा खतरा केवल फ्रांस द्वारा 5 प्रतिशत पर कर्ज उठाना नहीं है, बल्कि यह अनिश्चितता है कि क्या अन्य यूरोपीय देश भी इस दबाव का शिकार बनेंगे।

सवाल-जवाब

फ्रांस के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड किस स्तर पर पहुंच गई है?
फ्रांस के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड 2 अक्टूबर को 5.00 प्रतिशत के मनोवैज्ञानिक स्तर के करीब पहुंच गई, जो 2002 के बाद का उच्चतम स्तर है।
ओएटी-बुंड स्प्रेड क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
ओएटी-बुंड स्प्रेड फ्रांसीसी और जर्मन 10-वर्षीय बॉन्ड की ब्याज दरों का अंतर है। हाल ही में इसके 150 बेसिस पॉइंट्स से ऊपर जाने से यह स्पष्ट हुआ है कि बाजार फ्रांस के राजकोषीय जोखिम को लेकर बेहद चिंतित है।
यूरो-डॉलर विनिमय दर में कितनी गिरावट दर्ज की गई है?
यूरो-डॉलर विनिमय दर अपने वार्षिक उच्च स्तर से 7 प्रतिशत से अधिक गिरकर 1.1161 के 17 महीने के निचले स्तर के करीब कारोबार कर रही है।
फ्रांस का वर्तमान सार्वजनिक ऋण और बजट घाटा कितना है?
फ्रांस का सार्वजनिक ऋण उसके जीडीपी के लगभग 120 प्रतिशत के करीब पहुंच रहा है और वार्षिक बजट घाटा 5.4 प्रतिशत से घटकर करीब 5 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
क्या फ्रांस को वित्तीय बाजार से पूंजी जुटाने में दिक्कत हो रही है?
नहीं, फ्रांस को कर्ज मिलने में कोई रुकावट नहीं है जैसा कि 12 अरब यूरो की बॉन्ड नीलामी में दोगुनी मांग से दिखा, लेकिन सरकार को इसके लिए अत्यधिक ब्याज चुकाना पड़ रहा है।
यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सामने क्या मुख्य मौद्रिक दुविधा है?
ईसीबी को 3.8 प्रतिशत की महंगाई से निपटने के लिए ब्याज दरें ऊंची रखनी हैं, लेकिन ऐसा करने से कर्ज में डूबे यूरोपीय देशों की बॉन्ड यील्ड और बढ़ सकती है तथा आर्थिक सुस्ती आ सकती है।
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