यूरोप की सबसे प्रमुख अर्थव्यवस्था जर्मनी ने हालिया भू-राजनीतिक तनावों और ऊर्जा लागत में आई तेज उछाल के बाद उम्मीद से बेहतर मजबूती प्रदर्शित की है। प्रमुख आर्थिक संकेतकों में दर्ज हुआ सकारात्मक सुधार यह दर्शाता है कि स्थानीय उद्योग गंभीर दबावों को झेलने में सक्षम साबित हो रहे हैं। इसके बावजूद आर्थिक विशेषज्ञों का आकलन है कि व्यापक संरचनात्मक सुधारों के अभाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में जारी बाधाओं के चलते आने वाले समय में तेज आर्थिक उछाल के बजाय केवल एक सीमित अथवा मध्यम सुधार ही देखने को मिलेगा।
कारोबारी धारणा सूचकांक और पीएमआई आंकड़ों में सकारात्मक उछाल
व्यापारिक गतिविधियों का आकलन करने वाले इफो बिजनेस क्लाइमेट इंडेक्स में हाल ही में तेज और अप्रत्याशित बढ़त दर्ज की गई है। यह सूचकांक 88.8 से उछलकर सीधे 89.9 के स्तर पर पहुंच गया है। इसके ठीक एक दिन पहले जारी हुए परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआई के आंकड़ों ने भी बाजार को चौंकाते हुए सकारात्मक संकेत दिए थे। कॉमर्जैंक के मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. जोर्ग क्रेमर ने इस रुझान को रेखांकित करते हुए कहा कि कंपनियों ने ऊर्जा की कीमतों में आए भारी उछाल के असर को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया है।
पिछले कुछ महीनों के दौरान नए ऑर्डरों की आवक, पीएमआई और कारोबारी विश्वास जैसे महत्वपूर्ण संकेतकों ने लगातार अनुमान से बेहतर प्रदर्शन किया है। इसी सकारात्मक रुझान के मद्देनजर दो सप्ताह पहले जर्मनी के विकास अनुमान में संशोधन किया गया था। इस संशोधन के तहत वर्ष 2026 के लिए देश की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को 1.0 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.2 प्रतिशत निर्धारित किया गया था।
कॉर्पोरेट निवेश में सुस्ती और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक चुनौतियां
आर्थिक संकेतकों में सुधार के बावजूद डॉ. जोर्ग क्रेमर ने आगाह किया है कि वर्ष 2026 में केवल 1.2 प्रतिशत की मध्यम रिकवरी की ही संभावना है। जर्मनी की प्रतिस्पर्धी क्षमता पिछले कुछ समय में काफी कमजोर हुई है और बुनियादी आर्थिक सुधारों के अभाव में इसमें कोई निर्णायक बदलाव नहीं आ रहा है। इसी अनिश्चितता के चलते स्थानीय औद्योगिक इकाइयां और कॉरपोरेट कंपनियां घरेलू स्तर पर नया पूंजीगत निवेश करने से लगातार हिचकिचा रही हैं।
घरेलू निवेश में सुस्ती के अलावा जर्मनी का निर्यात क्षेत्र भी दोहरे अंतरराष्ट्रीय संकट से जूझ रहा है। एक तरफ चीन की तरफ से होने वाली मांग में नरमी आई है, जिससे जर्मन विनिर्माण निर्यात प्रभावित हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ नियमों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और यूरोपीय व्यापारिक हितों पर कड़ा दबाव बना रखा है। इन दोनों कारकों के संयुक्त प्रभाव के कारण जर्मन कारखानों के विदेशी व्यापार में आवश्यक गतिशीलता नहीं आ पा रही है।
सरकारी व्यय पर निर्भरता और आत्मनिर्भर सुधार की दूरी
निजी पूंजी निवेश और विदेशी निर्यात के कमजोर रहने से जर्मनी की समग्र रिकवरी अब पूरी तरह से राजकोषीय कदमों पर टिकी नजर आ रही है। मौजूदा परिस्थितियों में आर्थिक पुनरुद्धार सामान्य से कहीं अधिक सार्वजनिक खर्च पर निर्भर हो गया है। इसमें सरकारी उपभोग, जैसे सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का विस्तार और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ाना शामिल है।
इसके साथ ही रक्षा क्षेत्र सहित बुनियादी ढांचे में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रत्यक्ष पूंजीगत निवेश को भी विस्तार दिया जा रहा है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केवल सरकारी खर्च के सहारे आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था को एक स्थायी और आत्मनिर्भर विकास चक्र नहीं कहा जा सकता। जर्मन अर्थव्यवस्था अभी भी उस स्थिति से काफी दूर है जहां वह बिना सरकारी मदद के अपने दम पर निरंतर विकास गति बनाए रख सके।
एशियाई कारोबारी सत्र में मुद्राओं और बॉन्ड प्रतिफल की स्थिति
वैश्विक वित्तीय बाजारों में गुरुवार के एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान कई महत्वपूर्ण हलचलें देखी गईं। ऑस्ट्रेलियाई श्रम बाजार से जुड़े अगस्त के आंकड़े जारी होने के बाद AUD/USD मुद्रा जोड़ी गिरकर 0.7000 के स्तर की ओर फिसलती नजर आई। ऑस्ट्रेलिया की बेरोजगारी दर अनुमानित 4.5 प्रतिशत के मुकाबले बढ़कर 4.6 प्रतिशत दर्ज की गई, हालांकि रोजगार में 39.5 हजार की वृद्धि हुई जिसने पूर्व अनुमानों को पछाड़ दिया। इस बीच निवेशक डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली उच्चस्तरीय बैठक को लेकर सतर्क बने रहे।
मुद्रा बाजार में एक अन्य हलचल के तहत USD/JPY जोड़ी तीन सप्ताह के उच्च स्तर से पीछे हटकर 158.00 के आसपास फिसल गई। जापानी सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में आई तेज तेजी ने येन को मजबूत सहारा दिया, जबकि मुद्रा बाजार में आधिकारिक हस्तक्षेप की आशंकाएं भी बनी रहीं। वहीं दूसरी ओर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख की उम्मीदों और ऊंचे अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल के सहारे अमेरिकी डॉलर दो महीने के उच्चतम स्तर के करीब अपनी मजबूती बनाए रखने में सफल रहा।
केंद्रीय बैंक का नीतिगत कदम और सोने के भाव पर दबाव
मौद्रिक नीति के मोर्चे पर बैंक ऑफ जापान ने एक अहम कदम उठाते हुए अपनी अल्पकालिक ब्याज दर के लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया। नीति समिति के भीतर 7 के मुकाबले 2 मतों से यह निर्णय लिया गया। यह कदम बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में उठाया गया एक और चरण है, जिसकी बाजार में बीते कई हफ्तों से पहले से ही व्यापक अपेक्षा की जा रही थी।
कमोडिटी बाजार में सोने के भाव लगातार दूसरे दिन दबाव में रहे। यूरोपीय कारोबारी सत्र के शुरुआती पहर में सोना कमजोर रुख के साथ 4,300 डॉलर के नीचे एक सप्ताह के निचले स्तर पर कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार प्रतिभागी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बातचीत के नतीजों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हालांकि इस बैठक से किसी बहुत बड़े ऐलान की उम्मीदें काफी कम हैं, फिर भी कारोबारी दुर्लभ पृथ्वी खनिजों, प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों और मौजूदा व्यापार समझौते के विस्तार से जुड़ी प्रगति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

















