उम्र के साथ त्वचा की रंगत, नमी और बनावट में बदलाव आना एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है। समय बीतने पर चेहरे पर महीन रेखाएं, झुर्रियां, रूखापन और त्वचा का लचीलापन कम होने की शिकायत अक्सर सामने आती है। हालांकि प्राकृतिक उम्र बढ़ने की इस रफ्तार को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है, लेकिन सही स्किनकेयर आदतों और सही तत्वों के चुनाव से इन लक्षणों को काफी धीमा किया जा सकता है। एंटी एजिंग रूटीन में कोलेजन और रेटिनॉल दो ऐसे घटक हैं जिनकी सबसे ज्यादा चर्चा होती है। दोनों का मकसद त्वचा को स्वस्थ और युवा बनाए रखना है, लेकिन इनके काम करने का तरीका और प्रभाव पूरी तरह भिन्न हैं। इसलिए अपनी त्वचा की प्राथमिकता के अनुसार इनके बीच के अंतर को समझना बेहद आवश्यक है।
कोलेजन क्या है और यह त्वचा को कैसे सहारा देता है
कोलेजन मानव त्वचा का एक अहम संरचनात्मक प्रोटीन है, जो त्वचा को सहारा, मजबूती और लचीलापन प्रदान करता है। इसी प्रोटीन की बदौलत चेहरा भरा हुआ और चमकदार दिखता है। जब लोग ओरल कोलेजन पेप्टाइड्स का सप्लीमेंट के रूप में सेवन करते हैं, तो पाचन तंत्र इन्हें छोटे अणुओं में तोड़ देता है। इसके बाद शरीर इनका उपयोग अपनी आंतरिक कोलेजन उत्पादन क्षमता को सक्रिय और बेहतर करने में करता है। हालांकि बाजार में मिलने वाली कोलेजन आधारित क्रीमों का प्रभाव सप्लीमेंट्स जितना गहरा नहीं होता है। कोलेजन के मॉलिक्यूल्स का आकार काफी बड़ा होने के कारण वे त्वचा की भीतरी परतों तक सीधे प्रवेश नहीं कर पाते। ऐसे में इस तरह के लोशन या क्रीम त्वचा पर मुख्य रूप से केवल सतह को नमी देने वाले एक साधारण मॉइस्चराइजर की तरह ही असर दिखाते हैं।
त्वचा की कोशिकाओं पर रेटिनॉल का प्रभाव
रेटिनॉल दरअसल विटामिन A का ही एक रूप है और यह बिना किसी डॉक्टर के पर्चे के मिलने वाले ओवर द काउंटर रेटिनॉइड्स वर्ग में आता है। जब इसे त्वचा पर लगाया जाता है, तो यह कोशिकाओं के स्तर पर जाकर रेटिनोइक एसिड में परिवर्तित हो जाता है। यह परिवर्तन त्वचा के सेल्यूलर टर्नओवर को तेज करता है, जिससे पुरानी और मृत कोशिकाएं तेजी से हटती हैं और नई ताजी कोशिकाओं का निर्माण शुरू होता है। इसके साथ ही यह आंतरिक रूप से कोलेजन के निर्माण को भी गति देता है। यही कारण है कि झुर्रियों, महीन लकीरों, असमान स्किन टोन, डार्क स्पॉट्स और मुंहासों जैसी समस्याओं को ठीक करने के लिए रेटिनॉल को एक मजबूत विकल्प माना जाता है।
कोलेजन और रेटिनॉल के इस्तेमाल में मुख्य अंतर
इन दोनों तत्वों का इस्तेमाल करने का माध्यम ही इनकी सबसे बड़ी भिन्नता है। कोलेजन का सेवन ज्यादातर पाउडर, कैप्सूल या ड्रिंक जैसे ओरल सप्लीमेंट्स के जरिए किया जाता है, जबकि रेटिनॉल को सीरम या क्रीम के रूप में सीधे चेहरे पर लगाया जाता है। कार्यप्रणाली के लिहाज से कोलेजन त्वचा के भीतर पानी की मात्रा को बांधकर रखने और उसकी इलास्टिसिटी को सहारा देने का काम करता है, वहीं रेटिनॉल त्वचा की भीतरी सतह पर सेल्यूलर एक्टिविटी को नियंत्रित करता है। हालांकि शुरुआती दिनों में रेटिनॉल लगाने से चेहरे पर हल्की जलन, लालिमा या सूखापन देखने को मिल सकता है। ऐसे समय में ओरल कोलेजन सप्लीमेंट त्वचा की आंतरिक नमी बनाए रखकर इस रूखेपन को संतुलित करने में उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
झुर्रियों और मुंहासों में किसे चुनना ज्यादा फायदेमंद
अगर प्राथमिकता चेहरे की गहरी झुर्रियों और फाइन लाइंस को कम करने की है, तो रेटिनॉल का प्रभाव कोलेजन की तुलना में ज्यादा प्रत्यक्ष और तेज साबित होता है। दूसरी ओर चेहरे की पफीनेस यानी सूजन जैसी स्थिति में ओरल कोलेजन और रेटिनॉल दोनों अपने अलग-अलग गुणों से फायदा पहुंचाते हैं। एक्ने या कील-मुंहासों की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए रेटिनॉल ज्यादा प्रभावी विकल्प बनता है क्योंकि यह पोर्स को साफ रखकर डेड सेल्स को जमने नहीं देता। हालांकि महिलाओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि गर्भावस्था के दौरान या गर्भधारण की योजना बनाते समय रेटिनॉल के उपयोग से पूरी तरह परहेज करने की सलाह दी जाती है। अगर किसी को सिर्फ एक ही उत्पाद चुनना पड़े तो विशेषज्ञ रेटिनॉल को तरजीह देते हैं, लेकिन संवेदनशील त्वचा वालों को इसे अपने रूटीन में शामिल करने से पहले डर्मेटोलॉजिस्ट से राय जरूर लेनी चाहिए।


















