ग्लोबल पोर्टफोलियो मैनेजर्स एशियाई शेयर बाजारों में अपने निवेश की रणनीति बदल रहे हैं, जिसके तहत भारतीय शेयरों से पूंजी निकालकर अन्य बाजारों में लगाई जा रही है। हालिया फंड मैनेजर सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय बाजार के ऊंचे वैल्युएशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के हार्डवेयर क्षेत्र में सीमित मौजूदगी और आर्थिक वृद्धि की रफ्तार सुस्त रहने की आशंकाओं के कारण भारत एशियाई क्षेत्र का सबसे कम पसंदीदा शेयर बाजार बन गया है। इसके विपरीत वैश्विक निवेशक इस समय AI तकनीक से जुड़े पूर्वी एशियाई देशों के बाजारों को अधिक तवज्जो दे रहे हैं।
बैंक ऑफ अमेरिका के सर्वे में भारतीय शेयरों पर बढ़ा अंडरवेट रुझान
संस्थागत निवेशकों के इस बदलते नजरिए की झलक बैंक ऑफ अमेरिका द्वारा 7 अगस्त से 13 अगस्त के बीच आयोजित फंड मैनेजर सर्वे में देखने को मिली है। इस सर्वेक्षण में कुल 98 वैश्विक पोर्टफोलियो प्रबंधकों ने हिस्सा लिया, जो संयुक्त रूप से 272 अरब डॉलर की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करते हैं। सर्वे में शामिल 32 प्रतिशत फंड प्रबंधकों ने भारतीय इक्विटी पर नेट अंडरवेट रुख अपनाने की बात स्वीकार की। निवेशकों की चिंता सिर्फ ऊंचे वैल्युएशन तक सीमित नहीं है, बल्कि वे AI इंफ्रास्ट्रक्चर चक्र में भारत की कम भागीदारी, आर्थिक सुधारों की धीमी गति और भविष्य की विकास दर को लेकर भी सतर्क हैं।
AI बूम के दम पर दक्षिण कोरिया, ताइवान और जापान में बढ़ा पूंजी निवेश
एक तरफ जहां भारतीय बाजारों से विदेशी निवेशक दूरी बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पूर्वी एशिया के सेमीकंडक्टर समृद्ध देशों में भारी विदेशी निवेश देखा जा रहा है। वैश्विक टेक खर्च में तेजी के कारण दक्षिण कोरिया का शेयर बाजार लगभग 60 प्रतिशत तक उछल चुका है। दक्षिण कोरिया की प्रमुख सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी कंपनियां वैश्विक AI क्रांति की मुख्य आपूर्तिकर्ता बनी हुई हैं। इसके साथ ही ताइवान और जापान के शेयर बाजार भी एशियाई क्षेत्र में निवेशकों की पहली पसंद बने हुए हैं। फंड मैनेजर उन देशों के शेयर बाजारों में सक्रिय रूप से दांव लगा रहे हैं, जहां मेमोरी चिप्स और AI हार्डवेयर बनाने वाली बड़ी कंपनियां मौजूद हैं।
कंपनियों के मजबूत नतीजों के बाद भी नहीं लौटा विदेशी निवेशकों का भरोसा
भारतीय कॉर्पोरेट जगत के वित्तीय परिणाम बेहतर रहने के बावजूद विदेशी संस्थागत निवेशकों का भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं हो पाया है। हालिया तिमाही रिपोर्टिंग अवधि के दौरान निफ्टी 50 में शामिल कंपनियों ने सालाना आधार पर लगभग 18 प्रतिशत की मजबूत आय वृद्धि दर्ज की। यह प्रदर्शन मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के 10 प्रतिशत आय वृद्धि के शुरुआती अनुमान से काफी बेहतर रहा। इसके बावजूद वैश्विक निवेशक पिछली तिमाही के नतीजों के बजाय भविष्य की ग्रोथ क्षमता, बाजार के वैल्युएशन और वैश्विक टेक ट्रेंड्स में भारत की हिस्सेदारी पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और रुपये की कमजोरी बनी बड़ी चुनौती
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय शेयर बाजार के लिए एक बड़ी मैक्रोइकोनॉमिक चुनौती बनी हुई हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में आयातित खनिज तेल पर निर्भर है। ऐसे में क्रूड ऑयल के दामों में लगातार बढ़ोतरी से देश का आयात बिल बढ़ता है, जिससे चालू खाते के घाटे और घरेलू मुद्रास्फीति पर सीधा दबाव पड़ता है। इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में आने वाली गिरावट भी विदेशी निवेशकों को सतर्क कर रही है। जब विदेशी फंड अपने मुनाफे को डॉलर में बदलते हैं, तो करेंसी के अवमूल्यन के कारण उनका वास्तविक रिटर्न घट जाता है।
अमेरिका और ईरान के तनाव से वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता
वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनावों ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बना दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे लगातार संघर्ष ने कच्चे तेल की आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों को लेकर जोखिम बढ़ा दिया है। इस तरह के वैश्विक तनावों के कारण संस्थागत निवेशक जोखिम भरे संपत्तियों से दूर होकर सुरक्षित निवेश विकल्पों और एडवांस सेमीकंडक्टर जैसे मजबूत ग्रोथ वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं।
चालू तिमाही में 4 अरब डॉलर का विदेशी निवेश, घरेलू निवेशकों ने संभाला बाजार
सर्वे में जताई गई चिंताओं के बावजूद, चालू तिमाही के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 4 अरब डॉलर से अधिक की शुद्ध खरीदारी की है। वर्ष की पहली छमाही में हुई भारी बिकवाली के बाद यह आवक क्षेत्रीय उभरते बाजारों में सबसे मजबूत विदेशी प्रवाह मानी जा रही है। हालांकि, बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस नई खरीदारी से कुल निवेशक धारणा में कोई बड़ा तेजी का बदलाव नहीं आया है। भारतीय बाजार को असली मजबूती घरेलू संस्थागत निवेशकों और रिटेल निवेशकों से मिल रही है, जिनके निरंतर निवेश ने विदेशी बिकवाली के प्रभाव को काफी हद तक संभाल रखा है।
निफ्टी 50 के सामने 10 साल के रिकॉर्ड को बनाए रखने की चुनौती
भारतीय शेयर बाजार का प्रमुख सूचकांक निफ्टी 50 फिलहाल अपने मार्च के निचले स्तर से लगभग 8 प्रतिशत ऊपर कारोबार कर रहा है। हालांकि, वर्ष 2026 में अब तक के प्रदर्शन को देखें तो सूचकांक में करीब 8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि निफ्टी 50 वर्ष 2026 के अंत तक नकारात्मक दायरे में बंद होता है, तो इससे भारतीय बाजार का पिछले एक दशक से चला आ रहा लगातार सकारात्मक वार्षिक रिटर्न देने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड टूट जाएगा।



















