अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में गुरुवार के कारोबारी सत्र के दौरान एशियाई व्यापारिक घंटों में इंडोनेशियाई मुद्रा पर दबाव साफ तौर पर देखा गया। कच्चे तेल की ऊंची होती कीमतों और इंडोनेशिया के घरेलू राजकोषीय परिदृश्य को लेकर बढ़ती चिंताओं ने इंडोनेशियाई रुपिया (IDR) की चाल को सुस्त कर दिया है। इसके चलते अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इंडोनेशियाई रुपिया कमजोर होकर 17,920 के स्तर के आसपास कारोबार करता दिखा, जहां डॉलर लगातार दूसरे कारोबारी दिन बढ़त हासिल करने में कामयाब रहा।
बैंक इंडोनेशिया की मौद्रिक नीति और नीतिगत दरें
इंडोनेशिया के केंद्रीय बैंक, बैंक इंडोनेशिया ने अपनी ताजा मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में मानक ब्याज दर को 5.75 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है। यह नीतिगत बैठक गवर्नर देस्त्री दमयंती की अध्यक्षता में आयोजित पहली बैठक थी। केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों को स्थिर रखने का यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब देश के घरेलू वित्तीय मोर्चे पर चिंताएं गहरा रही हैं और वैश्विक स्तर पर कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।
दूसरी तरफ, संयुक्त राज्य अमेरिका से आए मजबूत पीएमआई आंकड़ों ने वैश्विक मुद्रा बाजारों का गणित बदल दिया है। मजबूत आर्थिक आंकड़ों के कारण अक्टूबर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी किए जाने की संभावना बढ़कर 69.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। ब्याज दरों में संभावित वृद्धि की इन अटकलों ने अमेरिकी डॉलर को व्यापक मजबूती प्रदान की है, जिससे अन्य उभरती और प्रमुख मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया है।
वैश्विक स्तर पर डॉलर का दबदबा और हाई बीटा मुद्राओं का प्रदर्शन
स्कॉटियाबैंक के रणनीतिकारों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर में तेजी का रुख लगातार बना हुआ है। सुबह के कारोबारी सत्र में प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की व्यापक बढ़त ने डॉलर इंडेक्स को जुलाई के अंत के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि इस दौरान हाई बीटा विदेशी मुद्राएं अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन कर रही हैं।
मुद्रा बाजार के ताजा आंकड़ों में न्यूजीलैंड डॉलर (NZD), मैक्सिकन पेसो (MXN) और दक्षिण अफ्रीकी रैंड (ZAR) दक्षिण कोरियाई वोन (KRW) के साथ रातोंरात प्रदर्शन तालिका में सबसे निचले पायदान पर नजर आए। मुद्राओं के इस व्यापक फैलाव से साफ संकेत मिलता है कि वैश्विक स्तर पर डॉलर की हालिया तेजी काफी मजबूत और व्यापक है, जिसने उभरते बाजारों की मुद्राओं को सीधे तौर पर प्रभावित किया है।
वित्तीय बाजारों में रिस्क-ऑन और रिस्क-ऑफ का गणित
वित्तीय बाजार के तकनीकी संदर्भों में अक्सर उपयोग होने वाले दो शब्द, रिस्क-ऑन और रिस्क-ऑफ, सीधे तौर पर यह दर्शाते हैं कि किसी विशेष समयावधि में निवेशक कितना जोखिम उठाने को तैयार हैं। रिस्क-ऑन बाजार वह स्थिति होती है जहां निवेशक आर्थिक भविष्य को लेकर आशावादी होते हैं और अधिक प्रतिफल पाने के लिए जोखिम भरी संपत्तियों की खरीद में सक्रिय रुचि दिखाते हैं। इसके विपरीत, रिस्क-ऑफ बाजार में निवेशक भविष्य की अनिश्चितताओं से आशंकित होकर सुरक्षित निवेश की ओर रुख करते हैं। ऐसे समय में कम प्रतिफल देने वाली लेकिन पूंजी सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली संपत्तियों को प्राथमिकता दी जाती है।
रिस्क-ऑन माहौल के दौरान शेयर बाजारों में आमतौर पर उछाल देखने को मिलता है। सोने को छोड़कर अधिकांश कमोडिटी संपत्तियों के मूल्य में वृद्धि दर्ज की जाती है क्योंकि उन्हें सकारात्मक आर्थिक विकास के परिदृश्य का सीधा लाभ मिलता है। कच्चे माल और कमोडिटी के प्रमुख निर्यातक देशों की मुद्राएं बढ़ती मांग के कारण मजबूत होती हैं, जबकि क्रिप्टोकरेंसी जैसी जोखिम भरी संपत्तियों में भी तेजी आती है।
इसके विपरीत, जब बाजार रिस्क-ऑफ मोड में प्रवेश करता है, तब बॉन्ड बाजार, विशेष रूप से प्रमुख सरकारों के बॉन्ड, में तेजी आती है। ऐसे समय में सोना चमकने लगता है और सुरक्षित ठिकाना मानी जाने वाली मुद्राएं जैसे कि जापानी येन (JPY), स्विस फ्रैंक (CHF) और अमेरिकी डॉलर (USD) निवेशकों की पहली पसंद बन जाती हैं।
कमोडिटी से जुड़ी मुद्राओं और सुरक्षित मुद्राओं का व्यवहार
रिस्क-ऑन परिस्थितियों में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (AUD), कैनेडियन डॉलर (CAD), न्यूजीलैंड डॉलर (NZD) के साथ-साथ रूसी रूबल (RUB) और दक्षिण अफ्रीकी रैंड (ZAR) जैसी गैर-प्रमुख मुद्राओं में उछाल देखने को मिलता है। इन मुद्राओं की मजबूती का मुख्य कारण यह है कि इनकी अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक विकास के लिए भारी पैमाने पर कमोडिटी निर्यात पर निर्भर हैं। जब वैश्विक आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है, तो निवेशक कच्चे माल की भविष्य की मांग को लेकर आश्वस्त होते हैं, जिससे कमोडिटी की कीमतें बढ़ती हैं और संबंधित देशों की मुद्राएं मजबूत होती हैं।
वहीं दूसरी ओर, रिस्क-ऑफ परिस्थितियों में मुख्य रूप से तीन मुद्राएं बढ़त हासिल करती हैं, जिनमें अमेरिकी डॉलर, जापानी येन और स्विस फ्रैंक शामिल हैं। अमेरिकी डॉलर दुनिया की प्राथमिक आरक्षित मुद्रा है, और संकट के समय निवेशक अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में पैसा लगाते हैं क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था द्वारा कर्ज अदायगी में चूक की संभावना न के बराबर मानी जाती है। जापानी येन में तेजी इसलिए आती है क्योंकि जापानी सरकारी बॉन्ड का एक बड़ा हिस्सा घरेलू निवेशकों के पास होता है, जो संकट के समय भी उन्हें बेचने से बचते हैं। वहीं, स्विट्जरलैंड के सख्त बैंकिंग कानून निवेशकों को बेहतर पूंजी सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिससे स्विस फ्रैंक सुरक्षित ठिकाने के रूप में उभरता है।
एशियाई बाजारों में अन्य प्रमुख मुद्राओं की चाल
गुरुवार को एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 0.7000 के स्तर की ओर फिसलता दिखा। यह गिरावट ऑस्ट्रेलिया के अगस्त रोजगार आंकड़ों के जारी होने के बाद आई, जिसमें बेरोजगारी दर अनुमानित 4.5 प्रतिशत के मुकाबले बढ़कर 4.6 प्रतिशत दर्ज की गई, हालांकि रोजगार में बदलाव के आंकड़ों ने 39.5 हजार के स्तर के साथ विश्लेषकों के अनुमानों को पीछे छोड़ दिया। मुद्रा व्यापारी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली अहम बैठक को लेकर भी सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।
उधर, डॉलर के मुकाबले जापानी येन (USD/JPY) तीन सप्ताह के उच्चतम स्तर से फिसलकर एशियाई सत्र में 158.00 के करीब आ गया। जापानी बॉन्ड पर बढ़ती यील्ड ने संभावित सरकारी हस्तक्षेप के जोखिम के बीच येन को सहारा दिया, जबकि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और आक्रामक फेड नीतियों के सहारे डॉलर दो महीने के उच्च स्तर के आसपास मजबूत बना रहा। बैंक ऑफ जापान ने मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में एक और कदम उठाते हुए 7-2 के बहुमत से अपने अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया, जो कि बाजार की पूर्व अपेक्षाओं के अनुरूप था।
सोना, व्यापार युद्ध और भू-राजनीतिक गतिविधियां
सोना एशियाई सत्र के दौरान एक सप्ताह के निचले स्तर के करीब सीमित दायरे में कारोबार करता दिखा। निवेशक ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच होने वाली बैठक के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि इस बैठक से किसी बहुत बड़ी घोषणा की उम्मीदें कम हैं, लेकिन बाजार प्रतिभागी दुर्लभ मृदा तत्वों (रेयर अर्थ्स), तकनीकी प्रतिबंधों और अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध विराम के विस्तार से जुड़े घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखे हुए हैं।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने जानकारी दी है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन नवंबर में समाप्त होने वाले अपने द्विपक्षीय व्यापार युद्ध विराम को 10 जनवरी तक बढ़ाने पर सहमत हो गए हैं। यह समझौता बेसेंट और चीन के उप-प्रीमियर हे लिफेंग के बीच वॉशिंगटन में हुई एक अनिर्धारित बैठक के बाद सामने आया है।
















