अमेरिका की इकॉनमी से जुड़े आंकड़े लगातार अनुमानों से बेहतर आ रहे हैं, फिर भी डॉलर इस तिमाही दुनिया की लगभग हर बड़ी करेंसी के मुकाबले कमजोर पड़ता जा रहा है। यानी इस कमजोरी की वजह सुस्त ग्रोथ नहीं, बल्कि कुछ और है।
फेड इस साल दरें क्यों नहीं बढ़ाएगा
बाजार अब भी थोड़ी संभावना जता रहे हैं कि फेडरल रिजर्व आगे दरें बढ़ा सकता है, लेकिन ज्यादातर फिक्स्ड इनकम एनालिस्ट मानते हैं कि केंद्रीय बैंक इस साल दरें बढ़ाए बिना ही रुका रहेगा। इसकी एक वजह सीधी है, लंबी अवधि की बॉन्ड यील्ड पहले ही इतनी बढ़ चुकी है कि इससे वित्तीय हालात अपने आप सख्त हो गए हैं, यानी फेड का आधा काम बाजार ने खुद ही कर दिया है। ज्यादा अहम बात यह है कि यील्ड में यह उछाल कहां से आ रहा है। एनालिस्ट्स का कहना है कि यह महंगाई को लेकर किसी नई आशंका का नतीजा नहीं है, बल्कि अमेरिका के बिगड़ते राजकोषीय हालात के चलते निवेशक अब सरकार को कर्ज देने के बदले ज्यादा प्रीमियम मांग रहे हैं।
शानदार जॉब्स रिपोर्ट ने कमजोर डॉलर की थ्योरी उलझा दी
डॉलर की गिरावट को समझना इसलिए मुश्किल हो जाता है क्योंकि इसके पीछे कमजोर इकॉनमिक आंकड़े नहीं हैं। अगस्त की जॉब्स रिपोर्ट अनुमान से कहीं बेहतर रही, पेरोल में 162,000 की बढ़ोतरी हुई, जो 55,000 के अनुमान से करीब तीन गुना ज्यादा है, जबकि बेरोजगारी दर 4.1% पर टिकी रही। यह आंकड़ा कांग्रेशनल बजट ऑफिस के उस स्तर से भी नीचे है, जिसे नॉन एक्सेलरेटिंग इनफ्लेशन रेट ऑफ अनइंप्लॉयमेंट यानी NAIRU कहा जाता है, वह स्तर जहां से आगे माना जाता है कि टाइट लेबर मार्केट महंगाई को हवा देना शुरू कर देता है। इससे नीचे बने रहना आमतौर पर इस बात का संकेत होता है कि अमेरिकी लेबर मार्केट फुल एम्प्लॉयमेंट पर है, या उससे भी आगे निकल चुका है, और ऐसा माहौल किसी करेंसी को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत करता है।
कमजोरी सिर्फ एक करेंसी तक सीमित नहीं
डॉलर की यह गिरावट किसी एक करेंसी जोड़ी तक सीमित भी नहीं है। स्विस फ्रैंक को छोड़कर बाकी सभी बड़ी करेंसी ने इस तिमाही अब तक डॉलर के मुकाबले बढ़त बनाई है। यह फैलाव अहम है, अगर डॉलर सिर्फ एक या दो करेंसी के सामने फिसलता तो उसकी वजह उन देशों की अपनी अलग कहानी हो सकती थी, लेकिन जब डॉलर लगभग सबके सामने फिसल रहा हो तो इसका मतलब है कि निवेशक खुद डॉलर को लेकर अपना नजरिया बदल रहे हैं, और इसके पीछे वही यील्ड और राजकोषीय हालात वाली वजह है।
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर महीनों के ऊंचे स्तर के करीब
मंगलवार के एशियाई कारोबारी सत्र में AUD/USD 0.7200 के ऊपर निकल गया और 14 मई के बाद के अपने सबसे ऊंचे स्तर के करीब पहुंच गया। जापानी येन में आई तेजी ने डॉलर को व्यापक तौर पर दबाव में रखा है, जिसके चलते फेड को लेकर बने हॉकिश अनुमानों और भू राजनीतिक तनावों से डॉलर को जो सहारा मिल सकता था, वह भी फीका पड़ गया। इसके अलावा इस महीने के आखिर में रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की एक और दर बढ़ोतरी की उम्मीदें भी ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को अलग से सहारा दे रही हैं। हालांकि चीन के मिले जुले ट्रेड बैलेंस आंकड़ों ने इस जोड़ी को ज्यादा ऊपर जाने से रोक दिया।
येन की तेजी थोड़ी थमी, लेकिन बड़ा रुझान अब भी उसके पक्ष में
USD/JPY में मंगलवार को कुछ अलग तस्वीर दिखी। यह जोड़ी दिन में पहले 153.00 से नीचे छह महीने के निचले स्तर को छूने के बाद अमेरिकी कारोबारी सत्र में 154.00 के आसपास वापस आ गई। फिलहाल इस उछाल को दिशा में बदलाव से ज्यादा एक तकनीकी सुधार माना जा रहा है। इसकी बड़ी वजह अब भी येन के पक्ष में झुकी है, जापान के मजबूत वेज ग्रोथ आंकड़ों और दूसरी तिमाही के जीडीपी आंकड़ों में हुए ऊपर की तरफ संशोधन ने अगले हफ्ते बैंक ऑफ जापान की दर बढ़ोतरी को लेकर उम्मीदें और मजबूत कर दी हैं, और यही उम्मीद छोटी गिरावट के बावजूद येन को सहारा दे रही है।
डीजल बाजार दे रहा है वह चेतावनी जो कच्चे तेल में नहीं दिख रही
करेंसी बाजार से हटकर एनर्जी मार्केट भी एक अलग ही संकेत दे रहा है। कच्चे तेल के दाम कुछ महीने पहले के मुकाबले अभी काफी शांत नजर आ रहे हैं, लेकिन डीजल की कहानी बिल्कुल अलग है। अमेरिका का डीजल क्रैक स्प्रेड, यानी अल्ट्रा लो सल्फर डीजल फ्यूचर्स की कीमत WTI क्रूड की तुलना में जितनी ज्यादा है, वह हाल ही में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर निकल गया और इंट्राडे में करीब 102 डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक जा पहुंचा। इतना चौड़ा क्रैक स्प्रेड बताता है कि कच्चे तेल के मुकाबले डीजल की सप्लाई असामान्य रूप से टाइट है, और ऐसी तंगी आगे चलकर ट्रकों, खेती के उपकरणों और हीटिंग ऑयल की कीमतों पर भी असर डाल सकती है।



















