वैश्विक वित्तीय बाजारों में इस समय अनिश्चितता और भारी उतार-चढ़ाव का माहौल देखने को मिल रहा है। पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लगातार चढ़ती कीमतें दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर रही हैं। इस उथल-पुथल ने दुनिया भर के निवेशकों को जोखिम वाले परिसंपत्तियों से हटाकर सुरक्षित निवेश के विकल्पों की ओर रुख करने पर मजबूर कर दिया है, जिसके चलते अमेरिकी डॉलर में जबरदस्त मजबूती दर्ज की गई है। वहीं दूसरी ओर, ऊर्जा लागत में तेजी से वैश्विक स्तर पर महंगाई दोबारा भड़कने की आशंका गहरा गई है। इस वजह से केंद्रीय बैंकों, खासकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगामी मौद्रिक नीतियों को लेकर बाजार में नए सिरे से आकलन शुरू हो चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में आर्थिक आंकड़ों और नीतिगत फैसलों का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर व्यापक रूप से देखने को मिलेगा।
अमेरिकी चुनाव वर्ष और फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति का इतिहास
बाजार के सहभागियों के बीच अक्सर यह धारणा रहती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव वाले वर्षों में केंद्रीय बैंक राजनीतिक विवादों से बचने के लिए अपनी दरों में बदलाव करने से कतराता है। हालांकि, टीडी सिक्योरिटीज के विश्लेषकों के एक विस्तृत ऐतिहासिक अध्ययन से पता चलता है कि चुनाव वाले वर्षों और फेडरल रिजर्व के नीतिगत फैसलों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता है। फेडरल रिजर्व पूरी तरह से आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर रहकर ही अपने निर्णय लेता है। ऐतिहासिक आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करने पर सामने आता है कि चुनावी दिन के सबसे करीब होने वाली फेड की बैठकों में 70 प्रतिशत बार ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया और उन्हें यथावत बनाए रखा गया। केवल 30 प्रतिशत बैठकों में ही दरों में वृद्धि या कटौती जैसा कोई बड़ा कदम उठाया गया।
वर्तमान बाजार स्थितियों को देखें तो निवेशकों ने अक्टूबर की बैठक तक लगभग एक पूर्ण दर वृद्धि की संभावना को आंकना शुरू कर दिया है, भले ही केंद्रीय बैंक के अधिकारियों की ओर से कोई नया दिशा-निर्देश जारी न किया गया हो। विश्लेषकों का कहना है कि यदि बाजारों में अक्टूबर तक ब्याज दर में बढ़ोतरी की उम्मीदें बनी रहती हैं और फेड बिना किसी स्पष्ट मार्गदर्शन के दरों को स्थिर रखता है, तो निवेशकों के मन में यह धारणा बन सकती है कि फेड का यह फैसला राजनीतिक रूप से प्रेरित था। इस संदर्भ में वित्तीय विशेषज्ञ वॉरश को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बाजार को स्पष्ट और पारदर्शी स्पष्टीकरण देना होगा ताकि निवेशकों का विश्वास बना रहे। इसके अलावा, यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और रोजगार बाजार से जुड़े आंकड़ों में सकारात्मक सरप्राइज देखने को मिलते हैं, तो बाजार में यह चिंता बढ़ सकती है कि श्रम बाजार की गति फिर से तेज हो रही है, जिससे महंगाई पर दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।
विदेशी मुद्रा बाजार में हलचल: यूरो और पाउंड पर बना दबाव
वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों का सीधा असर विदेशी मुद्रा बाजार पर देखने को मिला है। बुधवार को शुरुआती यूरोपीय कारोबारी सत्र के दौरान जीबीपी/यूएसडी (ब्रिटिश पाउंड बनाम अमेरिकी डॉलर) की विनिमय दर गिरकर 1.3500 के स्तर के करीब पहुंच गई। मध्य पूर्व में जारी सैन्य संघर्ष के कारण अमेरिकी डॉलर को एक पारंपरिक सुरक्षित परिसंपत्ति (सेफ-हेवन) के रूप में जबरदस्त समर्थन मिल रहा है, जिससे ब्रिटिश पाउंड पर दबाव बढ़ गया है। विदेशी मुद्रा बाजार के कारोबारी अब शुक्रवार को जारी होने वाली अमेरिकी अगस्त नॉन-फार्म पेरोल (रोजगार) रिपोर्ट का उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं, जो अमेरिकी श्रम बाजार की स्थिति और फेड की भावी दरों का रुख तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।
इसी तरह, यूरो बनाम अमेरिकी डॉलर (ईयूआर/यूएसडी) भी मंदी के दबाव में फंसा हुआ है। मंगलवार को नकारात्मक दायरे में बंद होने के बाद बुधवार को यूरो फिसलकर 1.1600 के स्तर से नीचे आ गया, जो पिछले दो हफ्तों का इसका सबसे निचला स्तर है। मध्य पूर्व के संघर्ष में आए उछाल के कारण निवेशकों में जोखिम लेने की क्षमता घटी है और फेड द्वारा सख्त रुख अपनाने की संभावनाओं ने अमेरिकी डॉलर को मजबूती प्रदान की है। इसके अतिरिक्त, कारोबारी दिन में बाद में जारी होने वाले अमेरिकी निजी क्षेत्र के रोजगार आंकड़ों (एडीपी रिपोर्ट) पर भी बाजार सहभागियों की पैनी नजर बनी हुई है।
सोना और कच्चे तेल के बाजारों में विपरीत रुख
कीमती धातुओं के बाजार में सोना अपने चार सप्ताह के निचले स्तर से उबरने में सफल रहा है। यूरोपीय सत्र की शुरुआत से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 4,320 डॉलर प्रति औंस के स्तर से ऊपर कारोबार करता नजर आया। अमेरिकी डॉलर में आई मामूली गिरावट ने सोने को निचले स्तरों से संभलने का मौका दिया। हालांकि, फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने या उन्हें उच्च स्तर पर बनाए रखने की सख्त उम्मीदों के कारण सोने की बड़ी तेजी सीमित बनी हुई है। सोना निवेशक एक तरफ भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण सुरक्षित निवेश की मांग और दूसरी तरफ उच्च ब्याज दरों के दबाव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
दूसरी तरफ, ऊर्जा बाजार में तेजी का सिलसिला लगातार बना हुआ है। अमेरिकी क्रूड का बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) लगातार तीसरे दिन और पिछले छह सत्रों में पांचवीं बार बढ़त दर्ज करने में कामयाब रहा। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान डब्ल्यूटीआई क्रूड 24 जुलाई के बाद के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। 24 जुलाई के बाद से पहली बार कच्चा तेल इस स्तर पर पहुंचा है। मध्य पूर्व के संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट की बढ़ती चिंताओं ने अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति की चिंताएं एक बार फिर बढ़ गई हैं और सितंबर में फेड द्वारा दर बढ़ाने के दांव को मजबूती मिली है।
डीजल क्रैक स्प्रेड का ऐतिहासिक रिकॉर्ड और बैंक ऑफ कनाडा का रुख
यद्यपि कच्चे तेल का बाजार पिछले कुछ महीनों की तुलना में ऊपर से शांत दिख सकता है, लेकिन डीजल बाजार आपूर्ति की वास्तविक स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी जारी कर रहा है। अमेरिकी डीजल क्रैक स्प्रेड, जो अल्ट्रा-लो सल्फर डीजल फ्यूचर्स और डब्ल्यूटीआई कच्चे तेल की कीमतों के बीच के अंतर को मापता है, इतिहास में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गया। कारोबार के दौरान इसका इंट्राडे रिकॉर्ड 102.00 डॉलर प्रति बैरल से कुछ ऊपर पहुंच गया। रिफाइनिंग मार्जिन में यह अभूतपूर्व उछाल शोधन क्षमता पर अत्यधिक दबाव को दर्शाता है, जिससे स्पष्ट है कि मध्यम डिस्टिलेट ईंधनों की आपूर्ति अत्यंत तंग बनी हुई है।
इसके साथ ही, अन्य प्रमुख केंद्रीय बैंकों के मोर्चे पर, बैंक ऑफ कनाडा द्वारा बुधवार को अपनी मुख्य नीतिगत ब्याज दर को 2.25 प्रतिशत पर यथावत रखने की व्यापक संभावना है। यदि कनाडा का केंद्रीय बैंक दरों में कोई बदलाव नहीं करता है, तो यह लगातार सातवीं ऐसी मौद्रिक नीति बैठक होगी जहां केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। इससे पहले जुलाई की बैठक में भी बैंक ऑफ कनाडा ने अपनी ब्याज दर को 2.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा था, जो बाजार की उम्मीदों के बिल्कुल अनुरूप था।



















