अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में यूरोपीय मुद्रा यूरो पर दबाव लगातार गहराता जा रहा है, जिससे यूरो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर दो हफ्ते के निचले स्तर 1.1575 पर आ गया है। मंगलवार को 1.1620 के स्तर पर बढ़त बनाने की कोशिश के विफल होने के बाद यूरो की बिकवाली तेज़ हो गई, और बुधवार को भी यह मुद्रा 1.1600 के महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे कारोबार कर रही है। यूरो में इस भारी गिरावट के पीछे दो मुख्य कारण हैं: पहला, मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य हमलों से वैश्विक अनिश्चितता बढ़ी है जिससे निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में अमेरिकी डॉलर की ओर रुख कर रहे हैं; और दूसरा, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फ़ेडरल रिजर्व द्वारा आगामी बैठकों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की सख्त नीति जारी रखने की मजबूत उम्मीदें हैं।
यूरोपीय अर्थव्यवस्था पर दबाव और यूरोपीय सेंट्रल बैंक के संकेत
यूरोपीय सेंट्रल बैंक के नीति निर्माताओं की ओर से सख्त मौद्रिक नीति के स्पष्ट संकेत मिलने के बावजूद यूरो की विनिमय दर में सुधार नहीं हो पा रहा है। यूरोपीय सेंट्रल बैंक के गवर्निंग काउंसिल के सदस्य जोआचिम नागेल ने हाल ही में कहा कि वित्तीय बाज़ार सितंबर में होने वाली बैंक की आगामी बैठक में ब्याज दर में बढ़ोतरी की 95 प्रतिशत संभावना मानकर चल रहे हैं। आम तौर पर ब्याज दर बढ़ने की उम्मीद से मुद्रा मजबूत होती है, लेकिन इस बार यूरो क्षेत्र के आर्थिक हालात को लेकर बाज़ार में गहरी चिंता बनी हुई है।
बाज़ार विश्लेषकों का मानना है कि मध्य पूर्व में भड़के सैन्य संघर्ष के कारण कच्चे तेल और ईंधन की कीमतों में उछाल का सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव यूरो क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पहले से ही धीमी आर्थिक वृद्धि से जूझ रहे यूरोपीय देशों के लिए ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी एक नया संकट खड़ी कर रही है। इससे विनिर्माण और औद्योगिक उत्पादन लागत में वृद्धि होगी और उपभोक्ता खर्च घटेगा, जिससे यूरोप में मंदी और मुद्रास्फीति का खतरा एक साथ बढ़ गया है। यही वजह है कि अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के बीच का अंतर यूरो पर लगातार बिकवाली का दबाव बनाए हुए है।
ऊर्जा बाज़ार में उथल-पुथल और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल
मध्य पूर्व के रणनीतिक इलाके में अमेरिकी ठिकानों और ईरानी सैन्य बलों के बीच एक-दूसरे पर किए गए हमलों ने वैश्विक वित्तीय बाज़ारों में जोखिम लेने की क्षमता को तगड़ा झटका दिया है। राजनयिक समाधान की उम्मीदें धूमिल होने से कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जबरदस्त तेजी आई है। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतें हफ्ते भर में लगभग 7 प्रतिशत बढ़कर 94.00 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं। यह 24 जुलाई के बाद का सर्वोच्च स्तर है। कच्चे तेल के इतने ऊंचे दामों ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
अमेरिकी घरेलू ऊर्जा बाज़ार में भी वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड ऑयल में लगातार तेजी का सिलसिला बना हुआ है। एशियाई व्यापारिक सत्र के दौरान WTI क्रूड लगातार तीसरे दिन चढ़कर 24 जुलाई के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। पिछले छह कारोबारी सत्रों में यह पांचवीं बार है जब WTI क्रूड में बढ़त दर्ज की गई है। इसके अलावा रिफाइंड ईंधन बाज़ार में भी अभूतपूर्व तेजी देखी जा रही है। अमेरिका में डीजल क्रैक स्प्रेड यानी WTI क्रूड की तुलना में अल्ट्रा-लो सल्फर डीजल फ्यूचर्स का प्रीमियम इतिहास में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गया। बुधवार को यह 102.00 डॉलर प्रति बैरल के सर्वकालिक उच्च स्तर को छू गया, जो बाजार में डीजल की भारी किल्लत और रिफाइनिंग लागत में उछाल को दर्शाता है।
फ़ेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति और अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व
वैश्विक मुद्रा बाज़ार में अमेरिकी डॉलर की मजबूती को समझने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फ़ेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति को समझना बेहद जरूरी है। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा फ़ेडरल रिजर्व को दो प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, जिन्हें दोहरा जनादेश कहा जाता है: पहला, देश में कीमतों में स्थिरता बनाए रखना यानी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना; और दूसरा, अर्थव्यवस्था में अधिकतम रोज़गार के अवसर सुनिश्चित करना। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए फ़ेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति समिति, जिसे FOMC कहा जाता है, मुख्य रूप से ब्याज दरों में बदलाव का सहारा लेती है।
जब अमेरिका में मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक के निर्धारित 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर चली जाती है, तो फ़ेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है। ब्याज दरें बढ़ने से वाणिज्यिक बैंकों, व्यवसायों और आम नागरिकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है, जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आवाजाही नियंत्रित होती है और बढ़ती कीमतों पर लगाम लगती है। विदेशी मुद्रा बाज़ार के दृष्टिकोण से, ऊंची ब्याज दरें अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड और वित्तीय संपत्तियों पर अधिक रिटर्न प्रदान करती हैं। इससे दुनिया भर के संस्थागत निवेशक अपना पैसा अमेरिकी बाज़ार में लगाने के लिए डॉलर खरीदते हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर की मांग और कीमत दोनों में जोरदार उछाल आता है। इसके विपरीत, जब मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत से नीचे आ जाती है या बेरोजगारी की दर चिंताजनक स्तर पर पहुंच जाती है, तो फ़ेडरल रिजर्व ब्याज दरें घटाकर कर्ज लेना आसान बनाता है, जिससे डॉलर की विनिमय दर में नरमी आती है।
फ़ेडरल ओपन मार्केट कमेटी की संरचना और कार्यप्रणाली
फ़ेडरल रिजर्व मौद्रिक नीति की समीक्षा और आर्थिक परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के लिए एक वर्ष में आठ नियमित नीतिगत बैठकें आयोजित करता है। इन बैठकों में फ़ेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) के सदस्य देश की आर्थिक वृद्धि, श्रम बाज़ार के आंकड़ों और मुद्रास्फीति के रुझानों का गहन विश्लेषण करते हैं और फिर ब्याज दरों में बदलाव का फैसला लेते हैं।
FOMC में कुल 12 सदस्य मतदान का अधिकार रखते हैं। इनमें फ़ेडरल रिजर्व बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के 7 सदस्य शामिल होते हैं, जिनकी नियुक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इनके अलावा फ़ेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अध्यक्ष को स्थायी वीटो और वोटिंग अधिकार प्राप्त होता है। बाकी 11 क्षेत्रीय फ़ेडरल रिजर्व बैंकों के अध्यक्षों में से 4 अध्यक्षों को एक-एक साल के लिए बारी-बारी से रोटेशन के आधार पर समिति में मतदान का अधिकार दिया जाता है।
असाधारण मौद्रिक उपाय: क्वांटिटेटिव ईज़िंग और क्वांटिटेटिव टाइटनिंग
अत्यंत विपरीत आर्थिक परिस्थितियों या आर्थिक संकट के समय, जब पारंपरिक ब्याज दर तंत्र प्रभावहीन हो जाता है, फ़ेडरल रिजर्व गैर-पारंपरिक मौद्रिक नीतियों का प्रयोग करता है। ऐसा ही एक प्रमुख उपाय क्वांटिटेटिव ईज़िंग (QE) है, जिसे 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान बड़े पैमाने पर लागू किया गया था। QE के तहत फ़ेडरल रिजर्व वित्तीय प्रणाली में नकदी का प्रवाह बढ़ाने के लिए डॉलर की नई आपूर्ति पैदा करता है और वाणिज्यिक बैंकों से बड़े पैमाने पर सरकारी और उच्च श्रेणी के बॉन्ड खरीदता है। इस प्रक्रिया से बाज़ार में तरलता तो बढ़ती है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप अमेरिकी डॉलर का मूल्य कमज़ोर होता है।
इसके ठीक उलट प्रक्रिया को क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (QT) कहा जाता है। QT के तहत फ़ेडरल रिजर्व बाज़ार से बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है और अपने पास मौजूद मैच्योर होने वाले बॉन्ड की परिपक्वता राशि को नए बॉन्ड खरीदने में दोबारा निवेश नहीं करता। इस प्रकार केंद्रीय बैंक अपनी बैलेंस शीट के आकार को धीरे-धीरे घटाता है और बाज़ार में अत्यधिक तरलता को वापस खींच लेता है। क्वांटिटेटिव टाइटनिंग से बाज़ार में क्रेडिट की उपलब्धता सीमित होती है, जिससे अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर को सीधा समर्थन मिलता है और डॉलर मजबूत होता है।
अमेरिकी आर्थिक आंकड़े और रोज़गार बाज़ार का परिदृश्य
अमेरिका से आए हालिया व्यापक आर्थिक आंकड़े मिश्रित संकेत दे रहे हैं। अगस्त महीने के लिए जारी इंस्टीट्यूट फॉर सप्लाई मैनेजमेंट (ISM) मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) में अनुमान से अधिक गिरावट दर्ज की गई। ISM मैन्युफैक्चरिंग रिपोर्ट के अनुसार, कीमतों से जुड़ा सूचकांक स्थिर रहा, जबकि रोज़गार से जुड़ा सब-इंडेक्स जुलाई के उच्च स्तर से नीचे खिसक गया है।
अब वित्तीय बाज़ार के प्रतिभागियों की नजरें आगामी रोज़गार आंकड़ों पर टिकी हैं। ऑटोमैटिक डेटा प्रोसेसिंग (ADP) रिसर्च इंस्टीट्यूट जल्द ही अगस्त महीने के लिए निजी क्षेत्र में रोज़गार सृजन की अपनी रिपोर्ट जारी करने वाला है। बाज़ार अनुमानों के मुताबिक, अगस्त में अमेरिकी निजी क्षेत्र में 47,000 नए रोज़गार जुड़ने की उम्मीद है, जो जुलाई में दर्ज 44,000 नए रोज़गारों से थोड़ा अधिक है। इसके अलावा शुक्रवार को अमेरिका के आधिकारिक गैर-कृषि रोज़गार आंकड़े भी सामने आने वाले हैं, जो फ़ेडरल रिजर्व की सितंबर नीतिगत बैठक के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय करेंगे।
वैश्विक मुद्रा और कमोडिटी बाज़ार पर व्यापक असर
अमेरिकी डॉलर में आई मजबूती ने दुनिया भर के विभिन्न परिसंपत्ति वर्गों में हलचल मचा दी है। विदेशी मुद्रा बाज़ार में ब्रिटिश पाउंड भी डॉलर के दबाव से बच नहीं सका और बुधवार को शुरुआती यूरोपीय कारोबारी घंटों के दौरान गिरकर 1.3500 के स्तर के करीब पहुंच गया। मध्य पूर्व के तनाव ने ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले अमेरिकी डॉलर को एक सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में मजबूती प्रदान की है।
दूसरी ओर, कीमती धातुओं के बाज़ार में सोने की कीमतों में कुछ सुधार देखा गया। शुरुआती सत्र में चार हफ्ते के निचले स्तर तक गिरने के बाद सोना संभलकर 4,320 डॉलर प्रति औंस के पार निकल गया। डॉलर में आई हल्की सुस्ती ने सोने को अस्थायी सहारा दिया, हालांकि फ़ेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने की मजबूत संभावनाओं के कारण सोने की बड़ी तेजी पर लगाम लगी हुई है। कच्चे तेल के चढ़ते दामों से उपजी मुद्रास्फीति की चिंताओं ने बाज़ार की इन उम्मीदों को और पुख्ता कर दिया है कि फ़ेडरल रिजर्व सितंबर में ब्याज दर में बढ़ोतरी का कदम उठा सकता है।



















