एशियाई वित्तीय बाजारों ने हाल के दिनों में उल्लेखनीय मजबूती दिखाई है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में भारी बढ़ोतरी के बावजूद एशियाई मुद्राएं और ब्याज दरें काफी स्थिर बनी हुई हैं। हालांकि, यह स्थिरता लंबे समय तक टिकने वाली नहीं लगती। एमयूएफजी के विश्लेषक माइकल वान ने एक चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि एशियाई मुद्राओं और दरों में दिख रही यह मजबूती अल्पावधि में समाप्त हो सकती है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और एशियाई मुद्राओं के प्रदर्शन के बीच बढ़ता अंतर यह संकेत देता है कि वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच जल्द ही बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
एशियाई मुद्रा बाजारों में मंडराता संकट
माइकल वान के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आई भारी तेजी के बावजूद एशियाई फॉरेक्स और दर बाजारों का शांत रहना काफी असामान्य है। सामान्य तौर पर जब अमेरिका में सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़ती है, तो निवेशक उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालकर अमेरिकी संपत्तियों में लगाने लगते हैं। इससे एशियाई मुद्राओं पर दबाव बनता है। हालांकि अब तक एशियाई बाजारों ने इस दबाव को झेल लिया है, लेकिन वान का मानना है कि मौजूदा बाजार परिस्थितियों को देखते हुए इस मजबूती के आगे बने रहने की संभावना बहुत कम है। वैश्विक स्तर पर बढ़ रहे यील्ड के दबाव और क्षेत्रीय प्रदर्शन के बीच का यह अंतर निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
इस नकली शांति का एक बड़ा उदाहरण USD/CNH करेंसी पेअर की इंप्लाइड वोलैटिलिटी (अनुमानित अस्थिरता) में देखने को मिलता है, जो कई दशकों के निचले स्तर पर पहुंच गई है। हालांकि इसके पीछे कुछ खास नीतियां या कारण हो सकते हैं, लेकिन माइकल वान का कहना है कि यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बाजार वर्तमान में किस तरह से पोजीशन ले चुका है। ऐसी स्थिति में यदि सेंटिमेंट या मौद्रिक नीति में कोई भी अचानक बदलाव होता है, तो पूरे एशियाई बाजार में एक बड़ा और अनियंत्रित उतार-चढ़ाव आ सकता है।
अमेरिकी यील्ड बढ़ने के पीछे के कारण और एशिया पर असर
एशियाई बाजारों के लिए केवल यह मायने नहीं रखता कि अमेरिकी यील्ड बढ़ रही है, बल्कि यह समझना अधिक महत्वपूर्ण है कि इसके बढ़ने के पीछे असली वजह क्या है। अगर यील्ड में बढ़ोतरी मजबूत आर्थिक विकास के कारण होती है, तो यह एशियाई निर्यातकों के लिए अच्छा संकेत होता है। लेकिन वर्तमान में यह बढ़ोतरी सख्त मौद्रिक नीति और बढ़ते रिस्क प्रीमियम (जोखिम प्रीमियम) के कारण हो रही है। इसके साथ ही वैश्विक बाजारों में 'रिस्क-ऑफ' (सुरक्षित संपत्तियों की ओर झुकाव) सेंटिमेंट के शुरुआती संकेत भी दिखाई दे रहे हैं, जो एशियाई नीति निर्माताओं और निवेशकों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
जब सख्त मौद्रिक नीति और ऊंचे रिस्क प्रीमियम के कारण यील्ड बढ़ती है, तो इसका मतलब है कि वैश्विक स्तर पर कर्ज की लागत बढ़ रही है और निवेशक जोखिम भरी संपत्तियों के लिए अधिक मुनाफे की मांग कर रहे हैं। यह स्थिति एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए नुकसानदेह साबित होती है क्योंकि इससे डॉलर में लिए गए कर्ज को चुकाने की लागत बढ़ जाती है और बाजारों से लिक्विडिटी (नकदी) कम होने लगती है।
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में स्थिरता के प्रयास
विदेशी मुद्रा बाजार में विभिन्न करेंसी पेअर पर भी इस वैश्विक हलचल का असर साफ दिख रहा है। शुक्रवार को एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान AUD/USD पेअर 0.7100 के मध्य स्तर के पास स्थिर होने की कोशिश करता दिखा। इससे पहले गुरुवार को ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में बड़ी गिरावट आई थी और यह एक सप्ताह से अधिक के निचले स्तर पर फिसल गया था। अगस्त महीने के अमेरिकी प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) के आंकड़ों के उम्मीद से अधिक रहने के कारण फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं को बल मिला था, जिससे अमेरिकी डॉलर को मजबूती मिली और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव बढ़ा।
हालांकि, आरबीए (RBA) द्वारा ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख बनाए रखने की उम्मीदों के कारण ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को सहारा मिला और इसकी गिरावट सीमित रही। बाजार के खिलाड़ी अब नए दांव लगाने से पहले अमेरिका के कंज्यूमर इन्फ्लेशन (उपभोक्ता मुद्रास्फीति) यानी CPI के आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं, जिससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अगले कदमों की दिशा साफ होगी।
जापानी येन और बैंक ऑफ जापान की नीतियां
जापान के मुद्रा बाजार में भी इस समय काफी हलचल देखी जा रही है। शुक्रवार को जापानी येन में जोरदार तेजी देखने को मिली, जिसके चलते USD/JPY करेंसी पेअर टूटकर 154.00 के करीब आ गया। इस तेजी का मुख्य कारण जापान से जारी हुए गर्म उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) के आंकड़े हैं। उम्मीद से अधिक महंगाई के आंकड़ों ने निवेशकों को यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि बैंक ऑफ जापान (BoJ) अब अपनी दशकों पुरानी ढीली मौद्रिक नीति को समाप्त कर ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला तेज कर सकता है। हालांकि, अमेरिकी डॉलर की अपनी व्यापक मजबूती के कारण येन की यह बढ़त एक सीमित दायरे में ही रही। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि जब तक अमेरिका के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आंकड़े सामने नहीं आ जाते, तब तक वैश्विक मुद्रा बाजार में कोई भी बड़ा एकतरफा रुख देखने को नहीं मिलेगा।
कमोडिटी बाजार में सोने की वापसी और डॉलर का प्रभाव
सुरक्षित निवेश के तौर पर माने जाने वाले सोने ने भी वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच अपनी चमक वापस पा ली है। शुक्रवार को हाजिर बाजार में सोने की कीमतें तेजी के साथ कारोबार करती दिखीं, जिससे निवेशकों का ध्यान एक बार फिर $4,440 प्रति ट्रॉय औंस के मनोवैज्ञानिक स्तर पर केंद्रित हो गया है। गुरुवार को अमेरिकी डॉलर में आई मजबूती और ट्रेजरी यील्ड में वृद्धि के कारण सोने में तेज गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन शुक्रवार को डॉलर के इंडेक्स में आई कमजोरी और उतार-चढ़ाव ने सोने को फिर से ऊपर जाने का मौका दिया। वैश्विक स्तर पर जब भी जोखिम की भावनाएं बढ़ती हैं और शेयर बाजारों में बिकवाली का माहौल बनता है, तब सोने जैसी संपत्तियों में निवेश बढ़ जाता है। वर्तमान में अमेरिकी मुद्रास्फीति के आंकड़ों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, जिससे डॉलर की दिशा तय नहीं हो पा रही है और इसका सीधा फायदा सोने को मिल रहा है।



















