वैश्विक वित्तीय बाजारों में उस वक्त भारी हलचल मच गई जब अमेरिकी 10 वर्षीय ट्रेजरी नोट की यील्ड 5.274 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंच गई, जो जून 2007 के बाद का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। हालांकि कारोबार के दौरान बाद में इसमें हल्की नरमी दर्ज की गई और यह 5.247 प्रतिशत पर आ गई, लेकिन इसके बावजूद इसमें आठ आधार अंकों से अधिक की बढ़ोतरी बनी रही। बॉन्ड बाजार में इस तेज उछाल के पीछे कई जटिल आर्थिक और भू-राजनीतिक कारक एक साथ काम कर रहे हैं। ऊर्जा की ऊंची कीमतें, फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक नीति को और सख्त करने की आशंका और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा तेहरान के साथ शांति समझौते को खारिज करने से उपजे तनाव ने निवेशकों को अमेरिकी सरकारी ऋण पर अधिक प्रीमियम मांगने के लिए मजबूर कर दिया है।
फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना
अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व का मुख्य वैधानिक लक्ष्य मुद्रास्फीति को 2 प्रतिशत के दायरे में बनाए रखना है। मौजूदा समय में महंगाई इस तय लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है, जिससे निपटने के लिए नीतिगत दरों को सख्त बनाए रखने की रणनीति पर काम हो रहा है। वित्तीय बाजार अब अक्टूबर और दिसंबर में होने वाली नीतिगत बैठकों में ब्याज दर वृद्धि की भारी संभावना जता रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, ट्रेडर्स अक्टूबर की बैठक में 25 आधार अंकों की संभावित बढ़ोतरी का 65 प्रतिशत अनुमान लगा रहे हैं। वहीं दिसंबर की बैठक में यह संभावना लगभग तय मानी जा रही है, जहां बढ़ोतरी की 94 प्रतिशत उम्मीद जताई गई है। ब्याज दरों में इस संभावित सख्ती ने बॉन्ड प्रतिफल को लगातार ऊपर धकेला है।
फेड फंड्स दर वह रातों-रात तय होने वाली दर है जिस पर अमेरिकी वाणिज्यिक बैंक आपस में अल्पकालिक उधारी का आदान-प्रदान करते हैं। यह वही मुख्य नीतिगत दर है जिसे फेडरल रिजर्व अपनी मौद्रिक नीति बैठकों में एक निश्चित दायरे (जैसे 4.75 प्रतिशत से 5.00 प्रतिशत) के रूप में तय करता है, जिसमें ऊपरी सीमा को मानक माना जाता है। भविष्य की ब्याज दरों के रुख पर नजर रखने के लिए सीएमई फेडवॉच टूल का सहारा लिया जाता है, जिससे पूरी दुनिया के वित्तीय बाजार अपनी रणनीति तय करते हैं। पिछले सप्ताह फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ जापान दोनों ने ही ब्याज दरों में 25 आधार अंकों का इजाफा किया था। दोनों केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति के दबाव से जूझ रहे हैं और दोनों का ही स्पष्ट रुख है कि भविष्य के सभी निर्णय आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेंगे।
यील्ड कर्व का चपटा होना और मंदी की आहट
दीर्घकालिक उधारी के मोर्चे पर भी दबाव लगातार गहराता नजर आ रहा है। अमेरिकी 30 वर्षीय बॉन्ड यील्ड भी लगभग 7 आधार अंक चढ़कर 5.559 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसके साथ ही एक बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह सामने आया है कि 10 वर्षीय और 2 वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के बीच का अंतर सिमटकर महज 17 आधार अंकों पर आ गया है। वित्तीय विश्लेषकों के लिए यील्ड कर्व का इस तरह चपटा होना एक चिंताजनक संकेत है, जो यह दर्शाता है कि बाजार यील्ड कर्व के पूरी तरह औंधे होने (इनवर्जन) के कगार पर पहुंच सकता है। ऐतिहासिक रूप से जब भी अल्पकालिक उधारी की दरें दीर्घकालिक दरों के करीब आती हैं या उनसे ऊपर निकलती हैं, तो इसे आर्थिक मंदी की आहट माना जाता है।
चालू सप्ताह के दौरान बाजार कई प्रमुख आर्थिक उत्प्रेरकों पर करीबी नजर बनाए हुए है। इसमें सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के ताजा आंकड़े, फेडरल रिजर्व का पसंदीदा मुद्रास्फीति पैमाना यानी कोर पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर्स (कोर पीसीई), और गैर-कृषि रोजगार आंकड़े (एनएफपी) शामिल हैं। ये सभी आर्थिक संकेतक तय करेंगे कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था का वास्तविक स्वास्थ्य कैसा है और केंद्रीय बैंक आगे किस गति से दरों को बढ़ाएगा।
विदेशी मुद्रा बाजार में हलचल और मुद्राओं का संतुलन
ब्याज दरों का किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है। जब केंद्रीय बैंक आधार दरों में इजाफा करते हैं, तो वाणिज्यिक संस्थान कर्जदारों पर ऊंची ब्याज दरें लगाते हैं और बचतकर्ताओं को जमा पर अधिक ब्याज देते हैं। उच्च ब्याज दरें आम तौर पर किसी देश की घरेलू मुद्रा को मजबूती प्रदान करती हैं, क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को अपनी पूंजी लगाने के लिए एक आकर्षक मंच देती हैं। डॉलर की मजबूती का सीधा असर अन्य प्रमुख वैश्विक मुद्राओं पर देखने को मिल रहा है।
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर (AUD/USD) सप्ताह की शुरुआत में 0.7000 के महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर की रक्षा करने की जद्दोजहद में जुटा रहा और 4 अगस्त के बाद के अपने सबसे निचले स्तर के आसपास कारोबार करता दिखा। तेल की ऊंची कीमतों से उपजे मुद्रास्फीति जोखिम, अक्टूबर में फेड द्वारा दर वृद्धि के बढ़ते दांव और अमेरिका-ईरान गतिरोध के कारण डॉलर की सेफ-हेवन मांग बढ़ गई है। यह स्थिति ऑस्ट्रेलियाई केंद्रीय बैंक (आरबीए) के नीतिगत फैसलों से ठीक पहले ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर भारी दबाव बनाए हुए है।
दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर बनाम जापानी येन (USD/JPY) जोड़ी में निचले स्तरों पर खरीदार सक्रिय हुए हैं। शुक्रवार को जापानी अधिकारियों द्वारा येन को सहारा देने के लिए बाजार में हस्तक्षेप करने की अटकलों से जो गिरावट आई थी, उसे डॉलर की मांग ने काफी हद तक पलट दिया है। बैंक ऑफ जापान के नरम रुख वाले कार्यवृत्त ने येन की बढ़त को सीमित कर दिया है, जबकि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। इससे महंगाई का डर गहरा गया है और फेड द्वारा दर वृद्धि की संभावना पुख्ता हुई है, जिससे USD/JPY वापस 158.00 के स्तर की ओर अग्रसर हो गया है।
सोने और बिटकॉइन की चाल पर ब्याज दरों का असर
उच्च ब्याज दरों का सबसे प्रत्यक्ष और नकारात्मक प्रभाव सोने की कीमतों पर पड़ता है। ब्याज दरों में वृद्धि सोने को रखने की अवसर लागत (अपॉर्चुनिटी कॉस्ट) को बढ़ा देती है, क्योंकि निवेशक बिना ब्याज देने वाले सोने के बजाय ब्याज कमाने वाली संपत्तियों या बैंक जमाओं की ओर आकर्षित होते हैं। इसके अतिरिक्त, मजबूत डॉलर भी सोने को दबाता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का मूल्यांकन डॉलर में होता है। यही वजह रही कि सोने ने सप्ताह की शुरुआत गिरावट के साथ की और यह बिकवाली के दबाव में प्रति ट्रॉय औंस 4,100 डॉलर के दायरे में आ गया, जो स्तर पिछली बार अगस्त की शुरुआत में देखा गया था। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद मजबूत डॉलर और बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने पीली धातु पर भारी दबाव बनाए रखा है।
क्रिप्टोकरेंसी बाजार में बिटकॉइन सोमवार को 82,800 डॉलर के नीचे कारोबार करता दिखा। पिछले सप्ताह 4 प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज करने के बाद बिटकॉइन की यह तेजी अपने हालिया उच्च स्तरों के पास आकर धीमी पड़ती नजर आई है। हालांकि, स्पॉट बिटकॉइन एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में लगातार पूंजी प्रवाह और मजबूत संस्थागत मांग इस डिजिटल परिसंपत्ति को बुनियादी सहारा प्रदान कर रही है।
ऊर्जा बाजार, एआई व्यापार और व्यापक आर्थिक चिंताएं
वैश्विक अर्थव्यवस्था में ईंधन और ऊर्जा की लागत भी एक नया सिरदर्द पैदा कर रही है। यूनाइटेड किंगडम में डीजल की कीमतों ने एक नया रिकॉर्ड बनाया है, जिससे वहां व्यापक आर्थिक चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि तेल आपूर्ति को लेकर बनी कुछ आशंकाओं में नरमी आई है, फिर भी कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। ऊर्जा की यह महंगाई वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों के मुद्रास्फीति नियंत्रण के प्रयासों को जटिल बना रही है। इसके साथ ही वित्तीय बाजार इस बात पर भी बहस कर रहे हैं कि क्या फेड द्वारा ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी का यह चक्र वास्तव में आवश्यक है, और इस बदलते मैक्रोइकॉनॉमिक परिदृश्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़े व्यापार और शेयरों का अगला कदम क्या होगा।
















