वैश्विक मुद्रा बाजारों में इस गुरुवार को अमेरिकी मुद्रा में मजबूती का सिलसिला कुछ थमता दिखा, क्योंकि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आई गिरावट के बाद निवेशकों ने हालिया तेजी पर मुनाफावसूली करना शुरू कर दिया। विभिन्न प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी मुद्रा के प्रदर्शन को मापने वाला डॉलर इंडेक्स जुलाई के आखिर के बाद के अपने नए उच्चतम स्तर को छूने के बाद थोड़ा नीचे खिसका। इसके बावजूद यूरोपीय कारोबारी सत्र की शुरुआत तक यह इंडेक्स 100.00 के मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर मजबूती बनाए रखने में सफल रहा। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि बुनियादी आर्थिक कारकों का संतुलन निचले स्तरों पर नए खरीदारों को आकर्षित करने के पक्ष में बना हुआ है, जिससे डॉलर को बड़ा सहारा मिल सकता है।
फेडरल रिजर्व की सख्त नीति और आर्थिक दृष्टिकोण
अमेरिकी मुद्रा में हालिया तेजी को दिशा देने वाले कारकों का विश्लेषण करते हुए डैनस्क बैंक के विश्लेषकों ने स्पष्ट किया कि संयुक्त राज्य अमेरिका में फेडरल रिजर्व ने सर्वसम्मति से ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किया गया नया डॉट प्लॉट परिदृश्य बाजार की आम अपेक्षाओं के मुकाबले मामूली रूप से सख्त या आक्रामक रुख दर्शाता है। विश्लेषकों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि फेडरल रिजर्व के चेयरमैन वॉर्श अब भी मौद्रिक नीति को आर्थिक विकास के लिए अनुकूल मानते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि केंद्रीय बैंक बढ़ती ब्याज दरों के बीच भी इस रुख पर कायम है कि उसकी मौजूदा नीति अर्थव्यवस्था को सहारा दे रही है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में मौद्रिक नीति का पूरा ढांचा फेडरल रिजर्व तय करता है। इस केंद्रीय बैंक के पास मुख्य रूप से दो वैधानिक जिम्मेदारियां हैं, जिनमें कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और रोजगार के अधिकतम अवसर सुनिश्चित करना शामिल है। इन दो प्राथमिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए फेडरल रिजर्व ब्याज दरों के नियमन का इस्तेमाल अपने सबसे बड़े हथियार के रूप में करता है। जब बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ती हैं और मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक के निर्धारित 2% के लक्ष्य से ऊपर निकल जाती है, तब फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर देता है। दरों में इस इजाफे से पूरी अर्थव्यवस्था में कर्ज की लागत बढ़ जाती है। इसका सीधा असर अमेरिकी डॉलर पर पड़ता है, क्योंकि ऊंची ब्याज दरें वैश्विक निवेशकों को अपना धन अमेरिका में लगाने के लिए अधिक आकर्षित करती हैं, जिससे मुद्रा को मजबूती मिलती है।
इसके विपरीत, जब महंगाई की दर 2% के लक्ष्य से नीचे गिर जाती है या बेरोजगारी दर चिंताजनक स्तर तक बढ़ जाती है, तब फेडरल रिजर्व आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती का रास्ता चुनता है। ब्याज दरों में यह कमी उधारी लेने की लागत को घटाती है, लेकिन इसके साथ ही यह अमेरिकी डॉलर के मूल्य पर दबाव डालती है। फेडरल रिजर्व साल भर में कुल आठ नियमित नीतिगत बैठकें आयोजित करता है। इन बैठकों में फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी एफओएमसी आर्थिक हालातों का व्यापक आकलन करती है और ब्याज दरों पर अंतिम फैसला सुनाती है। इस समिति में कुल बारह अधिकारी शामिल होते हैं, जिनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात सदस्य, फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अध्यक्ष, और बाकी ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों में से चार अध्यक्ष शामिल रहते हैं जो एक-एक साल के लिए बारी-बारी से सेवा देते हैं।
क्वांटिटेटिव ईजिंग और क्वांटिटेटिव टाइटनिंग का प्रभाव
अत्यधिक गंभीर और संकटपूर्ण आर्थिक परिस्थितियों में फेडरल रिजर्व एक गैर-पारंपरिक नीतिगत उपाय का सहारा ले सकता है, जिसे क्वांटिटेटिव ईजिंग कहा जाता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत केंद्रीय बैंक किसी ठप या गंभीर दबाव से जूझ रही वित्तीय प्रणाली में कर्ज और नकदी के प्रवाह को तेजी से बढ़ाता है। यह असाधारण कदम केवल वित्तीय संकटों या बेहद कमजोर मुद्रास्फीति के समय ही उठाया जाता है। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान फेडरल रिजर्व ने इसे अपने मुख्य हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था। इस प्रक्रिया में केंद्रीय बैंक अधिक मात्रा में डॉलर तैयार करता है और वित्तीय संस्थानों से उच्च श्रेणी के बॉन्ड खरीदता है। आमतौर पर क्वांटिटेटिव ईजिंग की शुरुआत अमेरिकी डॉलर की कीमत को कमजोर करती है।
दूसरी ओर, क्वांटिटेटिव टाइटनिंग पूरी तरह से क्वांटिटेटिव ईजिंग की उल्टी प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत फेडरल रिजर्व वित्तीय संस्थानों से बॉन्ड खरीदना पूरी तरह बंद कर देता है। इतना ही नहीं, अपने पास मौजूद बॉन्ड्स के मैच्योर होने पर मिलने वाले मूलधन को भी वह नए बॉन्ड खरीदने में दोबारा निवेश नहीं करता। वित्तीय तंत्र से नकदी का प्रवाह कम करने वाला यह कदम आम तौर पर अमेरिकी डॉलर के मूल्य के लिए सकारात्मक साबित होता है और मुद्रा को मजबूती प्रदान करता है।
भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल से उपजी चिंताएं
मुद्रा बाजार केवल ब्याज दरों से ही प्रभावित नहीं हो रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव भी सुरक्षित निवेश मानी जाने वाली अमेरिकी मुद्रा को मजबूती दे रहे हैं। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों का कहना है कि सऊदी अरब के लड़ाकू विमानों ने पिछले सप्ताह के दौरान यमन भर में 450 से अधिक हवाई हमले किए हैं। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान इस मामले में समझौता करना चाहता है और यह युद्ध अपने खात्मे के करीब हो सकता है। हालांकि, जमीन पर हूती समूह और सऊदी अरब के बीच तेज होती जंग बाजार में जोखिम प्रीमियम को लगातार बनाए हुए है। यह अनिश्चितता सुरक्षित पनाहगाह के तौर पर डॉलर इंडेक्स के पक्ष में माहौल तैयार कर रही है। साथ ही, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से प्रेरित मुद्रास्फीति का डर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बड़ी गिरावट को सीमित करने में मदद कर रहा है।
तकनीकी विश्लेषण के नजरिए से देखें तो डॉलर इंडेक्स का मौजूदा सेटअप काफी सकारात्मक बना हुआ है। चार्ट्स पर यह मजबूती इंडेक्स को 100.56 पर स्थित 61.8% रिट्रेसमेंट स्तर की ओर बढ़ने का समर्थन करती है। यदि डॉलर इस स्तर को पार करने में सफल रहता है, तो उसे अगला बड़ा प्रतिरोध 101.11 पर और उसके बाद 101.80 के पिछले स्विंग हाई पर देखने को मिल सकता है।
वैश्विक मुद्राओं और सोने का रुख
डॉलर की हालिया तेजी में आए इस संक्षिप्त ठहराव का सीधा प्रभाव अन्य प्रमुख संपत्तियों और विदेशी मुद्राओं पर भी साफ देखा गया। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर की जोड़ी में नए खरीदारों की दिलचस्पी दिखी और यह 0.7100 के स्तर को दोबारा हासिल करने में कामयाब रही। फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख के बाद डॉलर में आई तेजी थमने, रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की बढ़ती संभावनाओं, और अमेरिका व ईरान के बीच कूटनीतिक प्रयासों की उम्मीदों ने बाजार की धारणा को सुधारा, जिससे जोखिम-संवेदनशील ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को बढ़त मिली।
उधर अमेरिकी डॉलर बनाम जापानी येन की जोड़ी में गुरुवार के एशियाई सत्र के दौरान 156.00 के नीचे की संक्षिप्त गिरावट के बाद वापसी दर्ज की गई। यह जोड़ी बीते दिन छुए गए लगभग दो सप्ताह के उच्चतम स्तर और अपनी तीन दिनों की बढ़त के सिलसिले को थामने की कोशिश कर रही है। डॉलर में सात सप्ताह के उच्च स्तर के बाद ठहराव आने और बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य करने की दिशा में सख्त कदम उठाने की अटकलों ने जापानी येन को समर्थन दिया है। इस वजह से इस जोड़ी की बढ़त सीमित बनी हुई है, और सभी निवेशकों की नजरें अब शुक्रवार को आने वाले बैंक ऑफ जापान के नीतिगत फैसले पर टिकी हैं। उल्लेखनीय है कि जापान की अल्ट्रा-लो ब्याज दरों ने एक दशक से भी अधिक समय तक खरबों डॉलर के वैश्विक निवेश को फंड करने में मदद की है, जिससे जापानी येन दुनिया के सबसे सस्ते फंडिंग स्रोतों में से एक बन गया था। चूंकि इस सप्ताह बैंक ऑफ जापान द्वारा नीति को दोबारा सख्त करने की उम्मीद जताई जा रही है, यह ऐतिहासिक लाभ अब एक नए दौर में प्रवेश कर सकता है। जहां दुनिया की अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की, वहीं जापान लंबे समय तक दुनिया का अकेला अपवाद बना रहा था।
इसी बीच सोने की कीमतों में भी तेजी देखी गई और यह गुरुवार को यूरोपीय सत्र की ओर बढ़ते हुए 4,300 डॉलर के स्तर से ऊपर निकल गया। हालांकि यह बहुमूल्य धातु अब भी बीते दिन छुए गए अपने छह सप्ताह के निचले स्तर के काफी करीब कारोबार कर रही है। जुलाई के अंत के बाद के उच्चतम स्तर से डॉलर के नीचे आने ने सोने को तात्कालिक समर्थन प्रदान किया है। फिर भी, फेडरल रिजर्व का सख्त नीतिगत नजरिया और मध्य पूर्व में गहराता संकट सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने को सहारा देने के साथ-साथ गैर-ब्याज वाली इस धातु की बढ़त पर सीमित दायरा भी बना सकता है।


















