मेघालय की पहाड़ियों में सदियों से पारंपरिक खान-पान का हिस्सा रहा सोहियोंग फल अब बड़े व्यावसायिक पैमाने पर खेतों और बगीचों में उतरने के लिए तैयार हो रहा है। खासी और जयंतिया हिल्स के घरेलू आंगनों तथा छोटे बागानों तक सीमित रहे इस गहरे बैंगनी रंग के फल को नकदी फसल के रूप में स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक स्तर पर व्यापक प्रयास शुरू किए गए हैं। उमियम स्थित पूर्वोत्तर पहाड़ी क्षेत्र के लिए आईसीएआर अनुसंधान परिसर (ICAR Research Complex for the NEH Region) ने इस स्थानीय फल के व्यवसायीकरण और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में कई अहम तकनीकी समाधान विकसित किए हैं।
वानस्पतिक रूप से प्रूनस नापॉलेंसिस (Prunus napaulensis) के नाम से पहचाना जाने वाला सोहियोंग रोसेसी (Rosaceae) वनस्पति परिवार से संबंधित है। अपने गहरे रंग, तीखे-मीठे अनूठे स्वाद और पोषक तत्वों की वजह से यह स्थानीय जनजातीय समुदायों की खाद्य संस्कृति और कृषि विरासत का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। ताजा खाने के अलावा इसका उपयोग जूस, स्क्वैश, जैम, जेली, मुरब्बा और घरेलू वाइन जैसे किण्वित पेय बनाने में बड़े चाव से किया जाता रहा है। इसके बावजूद, अब तक यह फल बड़े व्यावसायिक बाजारों की पहुंच से दूर था।
व्यावसायिक खेती की पुरानी बाधाएं और चुनौतियां
सोहियोंग का उपयोग भले ही पीढ़ियों से हो रहा हो, लेकिन एक बागवानी फसल के रूप में इसे व्यवस्थित अनुसंधान और कारोबारी समर्थन की कमी का सामना करना पड़ा। किसान इसे बड़े पैमाने पर इसलिए नहीं अपना पा रहे थे क्योंकि इसके पूरे मूल्य श्रृंखला तंत्र का अभाव था, जो पौध तैयार करने से लेकर बाजार तक की कड़ियों को आपस में जोड़ सके।
इसकी खेती के मार्ग में कई प्रमुख जैविक, तकनीकी और आर्थिक अड़चनें मौजूद थीं
- लंबी प्रतीक्षा अवधि: पारंपरिक रूप से बीज से उगे पेड़ को फल देने में सात से नौ साल का लंबा समय लग जाता था, जिससे किसानों को त्वरित लाभ नहीं मिल पाता था।
- पेड़ों का अनियंत्रित आकार: विशालकाय पेड़ों के कारण फलों की तुड़ाई और रखरखाव करना बेहद कठिन काम था।
- मानकीकृत पौध सामग्री का अभाव: उन्नत किस्मों और प्रमाणित रोपण सामग्री की कमी के चलते पैदावार एक जैसी नहीं मिलती थी।
- आर्थिक प्रतिस्पर्धा: बाजार में पहले से स्थापित व्यावसायिक फलों की तुलना में देरी से मुनाफा मिलना किसानों को हतोत्साहित करता था।
- बुनियादी ढांचे की कमी: कमजोर आपूर्ति श्रृंखला, अपर्याप्त प्रसंस्करण इकाइयां, ऋण सुविधाओं का अभाव और कमजोर विपणन तंत्र ने भी इसके विस्तार को सीमित रखा।
ग्राफ्टिंग तकनीक और उन्नत जीनोटाइप से मिली बड़ी सफलता
उमियम स्थित अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने इन समस्याओं को दूर करने के लिए टंग ग्राफ्टिंग (जीभ ग्राफ्टिंग) तकनीक का मानकीकरण किया है। इस पद्धति की बदौलत सोहियोंग के पौधे का गर्भकाल यानी फल आने का समय सात से नौ साल से घटकर केवल तीन से चार साल रह गया है। इसके अलावा, ग्राफ्टिंग के माध्यम से मातृ पौधे जैसे ही उच्च गुणवत्ता वाले पौधे तैयार किए जा सकते हैं, जिससे किसानों को जल्दी और सुनिश्चित रिटर्न मिलने का रास्ता साफ हुआ है।
शोधकर्ताओं ने सोहियोंग के उत्कृष्ट जीनोटाइप की पहचान भी पूरी कर ली है। वर्तमान में इन उन्नत किस्मों का सरकारी अनुसंधान फार्मों पर बहु-स्थानिक मूल्यांकन किया जा रहा है, ताकि बेहतर उत्पादकता और उच्च गुणवत्ता वाले फल देने वाली किस्में जारी की जा सकें। इसके साथ ही, पर्यावरण अनुकूल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक और जैविक खेती प्रणालियों के तहत उत्पादन प्रौद्योगिकियों को मानकीकृत किया जा रहा है।
फलों का जीवन बढ़ाने और प्रसंस्करण की नई तकनीकें
फलों की तुड़ाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए वैज्ञानिक तौर पर फलों के पकने की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन किया गया है। इससे यह तय करने में मदद मिली है कि ताजा उपभोग या अलग-अलग प्रसंस्करण उत्पादों के लिए फल की तुड़ाई कब की जानी चाहिए। इसके अलावा, आधुनिक इमेज-प्रोसेसिंग तकनीक की मदद से फल और बीज के आकार का सटीक आकलन किया गया है, जिसके आधार पर भविष्य में ग्रेडिंग मशीनें और कटाई के बाद के उपकरण तैयार किए जा सकेंगे।
एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि पैकेजिंग तकनीक में मिली है, जिससे सोहियोंग फल का शेल्फ लाइफ बढ़कर नौ दिनों तक पहुंच गया है। तुड़ाई के बाद फल के जल्दी खराब न होने से सुदूर बाजारों तक इसकी सुरक्षित पहुंच संभव होगी। इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने सोहियोंग से कई प्रकार के मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार करने के फॉर्मूले भी तय किए हैं
- पेय पदार्थ और वाइन: मानकीकृत विधियों से तैयार शीतल पेय और किण्वित पेय।
- कैंडी और लेदर: सूखे फल आधारित कैंडी और फ्रूट लेदर।
- पाउडर और प्रीजर्व: न्यूट्रास्युटिकल और फंक्शनल फूड के रूप में उपयोग योग्य फल का सूखा पाउडर।
ग्रामीण युवाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए नए अवसर
सोहियोंग के विभिन्न उत्पादों की मांग ग्रामीण अर्थव्यवस्था में स्वरोजगार के बड़े द्वार खोल सकती है। विशेष रूप से ग्रामीण युवाओं, महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के लिए नर्सरी प्रबंधन, खेती, प्रसंस्करण और पैकेजिंग इकाइयों के जरिए नियमित आजीविका कमाने का अवसर बन रहा है। फल के गहरे रंगद्रव्य, आकर्षक फ्लेवर और औषधीय गुणों के चलते इसे प्रीमियम और आला दर्जे के बाजारों में एक विशिष्ट ब्रांड के रूप में स्थापित किया जा सकता है।
अनुसंधान को खेतों तक पहुंचाने के लिए फार्मर्स कमीशन, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), संबंधित विभागों और प्रगतिशील किसानों के जरिए गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री का वितरण शुरू कर दिया गया है। कृषि वानिकी और विविधीकृत खेती प्रणालियों में सोहियोंग को शामिल करने से जलवायु परिवर्तन के दौर में भी किसानों को सुरक्षित और टिकाऊ आय मिल सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य बागवानी विभाग, आईसीएआर, कृषि विज्ञान केंद्रों और निजी उद्यमियों का संयुक्त प्रयास मेघालय के इस अनूठे फल को वैश्विक पहचान दिलाने में निर्णायक साबित होगा।



















