मिजोरम में वैवाहिक अलगाव के बाद दोबारा शादी करने की योजना बना रहे लोगों के लिए अब अदालत से जारी तलाक प्रमाणपत्र हासिल करना अनिवार्य कर दिया गया है। राज्य प्रशासन ने पारंपरिक विवाह प्रथाओं को कानून के साथ सामंजस्य बिठाने के उद्देश्य से यह सख्त कदम उठाया है।
मैरिज ऑफिसिएट्स पर होगी सत्यापन की जिम्मेदारी
नए नियमों के अनुसार, विवाह की रस्में कराने वाले पादरी या धर्मगुरु की यह प्राथमिक जिम्मेदारी होगी कि वे समारोह से पहले तलाक प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता की पूरी तरह जांच करें। जब तक पिछले विवाह के कानूनी रूप से समाप्त होने की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक नए विवाह की अनुमति नहीं दी जाएगी।
मिजोरम में चर्च और धार्मिक संस्थाओं को अपने समुदायों के भीतर शादी और पुनर्विवाह कराने का अधिकार बरकरार रहेगा, लेकिन उन्हें इस कानूनी आवश्यकता का कड़ाई से पालन करना होगा। किसी भी नए विवाह बंधन में बंधने से पहले पिछले विवाह के विधिवत विघटन का अदालती दस्तावेज पेश करना आवश्यक होगा।
नियम तोड़ने पर 10 साल तक की जेल
प्रशासन ने इस नियम का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़े दंडात्मक प्रावधान तय किए हैं। बिना वैध तलाक प्रमाणपत्र के दूसरी शादी रचाने वाले व्यक्तियों को भारी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। इस नियम के उल्लंघन पर दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को मामले की परिस्थितियों के आधार पर सात से दस साल तक की जेल की सजा हो सकती है।
कानूनी अधिकारियों और समीक्षा समिति ने विवाह की तैयारियों में शामिल जोड़ों, उनके परिजनों और समाज के प्रबुद्ध लोगों से इन नए नियमों के प्रति पूरी सतर्कता बरतने की अपील की है।
चर्च के मैरिज सर्टिफिकेट में बदलाव की सिफारिश
समीक्षा समिति ने चर्चों को एक अहम प्रशासनिक सुझाव भी दिया है। समिति ने सिफारिश की है कि चर्च द्वारा जारी किए जाने वाले मैरिज सर्टिफिकेट्स पर अब डाइवोर्स शब्द का सीधे तौर पर इस्तेमाल न किया जाए। इसकी जगह प्रमाणपत्र पर मिजो मैरिज एंड इनहेरिटेंस ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट 2014 के प्रावधानों के अनुपालन का उल्लेख करने की सलाह दी गई है।
कानून और न्यायिक विभाग के अतिरिक्त सचिव जाहमिंगथांगा राल्ते की अध्यक्षता में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में इन बदलावों और प्रथागत विवाह नियमों की गहन समीक्षा की गई। यह पूरी कवायद मिजो मैरिज एंड इनहेरिटेंस ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट 2026 के अनुरूप बनाई जा रही है, जिसे राज्य विधानसभा ने इसी साल फरवरी में पारित किया था। इस बैठक में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों, प्रमुख चर्च संगठनों, नागरिक समाज समूहों, मिजोरम महिला आयोग, मिजोरम यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों ने हिस्सा लिया।





















