अमेरिका के इलिनॉय राज्य स्थित ऑरोरा शहर में एक बड़े हिंदू मंदिर पर गोलीबारी करने की भयावह साजिश के विफल होने के बाद पूरे देश में रह रहे भारतीय मूल के नागरिकों और एशियाई समुदायों में सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता उत्पन्न हो गई है। शिकागो के उपनगरीय क्षेत्र में स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी बालाजी मंदिर में जिस समय यह संदिग्ध हमलावर भारी हथियारों के साथ पहुंचा, उस वक्त वहां नवरात्रि के पावन पर्व के उपलक्ष्य में हजारों श्रद्धालु एकत्रित थे। समुदाय के नेताओं, हिंदू, सिख और नागरिक संगठनों का मानना है कि यह घटना इस कड़वे सच को उजागर करती है कि किस तरह सोशल मीडिया पर वर्षों से भारतीयों और हिंदुओं के खिलाफ फैलाया जा रहा जहर अब सड़कों पर वास्तविक हिंसा का रूप धारण करने लगा है।
ऑरोरा मंदिर परिसर में हथियार के साथ पहुंचा था हमलावर
जांच अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, रविवार की दोपहर उन्नीस वर्षीय अलेक्जेंड्रोस पापोराकिस अपनी गाड़ी से ऑरोरा के इस विशाल मंदिर परिसर में पहुंचा था। वह अपने शरीर पर बुलेटप्रूफ जैकेट पहने हुए था और उसके पास एक स्वचालित राइफल मौजूद थी। अधिकारियों ने बताया कि आरोपी मंदिर के पार्किंग स्थल में कई मिनटों तक गाड़ी रोककर बैठा रहा और उसने गोलीबारी करने का प्रयास किया। गनीमत यह रही कि उसी समय उसकी राइफल की नली में गोली अटक गई, जिससे हथियार जाम हो गया। हथियार में तकनीकी खराबी आने के बाद वह घबराकर वहां से भाग निकला, जिससे एक अत्यंत भीषण नरसंहार होने से बच गया।
घटना के समय मंदिर के भीतर का वातावरण बेहद उल्लासपूर्ण था। नौ रातों तक चलने वाले नवरात्रि उत्सव का पहला दिन होने की वजह से लोग शक्ति की उपासना करने परिवार सहित पहुंचे थे। अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के सदस्य राजा कृष्णमूर्ति भी उस समय अपने माता-पिता के साथ मंदिर के मुख्य सभागार में उपस्थित थे। कृष्णमूर्ति और उनके परिवार को इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि मंदिर की चारदीवारी के ठीक बाहर एक जानलेवा हमलावर अपनी बंदूक ताने खड़ा था। कृष्णमूर्ति ने इस अनुभव पर अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा कि हमें इस बात का कतई अंदाजा नहीं था कि बाहर कोई खतरनाक इरादों के साथ मौजूद है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस चौंकाने वाली घटना ने मंदिर जाने वाले हर परिवार को भीतर तक झकझोर दिया है।
सहकर्मी की सूचना पर हुई आरोपी की गिरफ्तारी
हमले का प्रयास करने के बाद संदिग्ध युवक वहां से फरार हो गया था, लेकिन कुछ ही घंटों के भीतर उसे पलाटाइन स्थित उसके आवास के पास से दबोच लिया गया। जांच अधिकारियों ने खुलासा किया कि ताको बेल रेस्टोरेंट में काम करने वाले उसके एक सहकर्मी ने पुलिस को आगाह किया था कि आरोपी भारतीय मूल के लोगों को जान से मारने की योजना बना रहा है। इस समय पर मिली गुप्त सूचना ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों को तेजी से कार्रवाई करने में मदद की। जब जांचकर्ताओं ने आरोपी के ठिकानों की तलाशी ली, तो वहां से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद हुआ।
बरामद सामानों में एक गैस कनस्तर भी शामिल था, जिस पर दक्षिण एशियाई समुदाय के खिलाफ अत्यंत अपमानजनक और नस्लीय अपशब्द उकेरे गए थे। इसके अतिरिक्त, अधिकारियों को आरोपी के कब्जे से नाजी प्रतीकों से जुड़ी कई सामग्रियां और दस्तावेज भी मिले। पुलिस ने बताया कि आरोपी ने अपना एक घोषणापत्र भी तैयार किया था, जिसमें सामूहिक नरसंहार करने की उसकी खौफनाक कल्पनाओं का विस्तार से ब्योरा दर्ज था। इस घोषणापत्र में उसने अधिक से अधिक गैर-गोरे लोगों को मौत के घाट उतारने की इच्छा व्यक्त की थी। नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और धार्मिक संगठनों का कहना है कि ये सभी सबूत साबित करते हैं कि यह पूरी तरह से नस्लीय और धार्मिक नफरत से प्रेरित हमला था।
चार दशकों से सांस्कृतिक केंद्र रहा है बालाजी मंदिर
ऑरोरा का श्री वेंकटेश्वर स्वामी बालाजी मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि यह बीस एकड़ के विस्तृत भूभाग में फैला हुआ एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र है। सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने बताया कि पिछले लगभग चालीस वर्षों से यह मंदिर उनके और उनके परिवार के लिए दूसरे घर की तरह रहा है। जब भारतीय प्रवासियों का परिवार अमेरिका में नया-नया कदम रखता था, तब यह मंदिर ही उन्हें अपनी जड़ों और मातृभूमि से जोड़े रखने का सबसे बड़ा माध्यम बनता था। इस परिसर में नियमित रूप से शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम, भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी जैसे पारंपरिक नृत्य प्रदर्शन, जन्मदिन उत्सव और वैवाहिक समारोह आयोजित होते रहे हैं। इसके अलावा मंदिर की कैंटीन में दक्षिण भारतीय व्यंजनों का आनंद लेने के लिए दूर-दराज से लोग यहां आते हैं।
घटना के तुरंत बाद मंदिर प्रबंधन ने श्रद्धालुओं, कर्मचारियों और स्वयंसेवकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए कड़े कदम उठाए हैं। मंदिर प्रशासन ने एक आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि परिसर की सुरक्षा व्यवस्था में तुरंत इजाफा किया गया है और वहां सशस्त्र सुरक्षाकर्मियों की तैनाती कर दी गई है। शिकागो में आयोजित एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में राजा कृष्णमूर्ति के साथ विभिन्न धर्मों और नागरिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इन सभी नेताओं ने एकजुट होकर केंद्रीय जांच एजेंसी एफबीआई से इस पूरे मामले की जांच एक सुनियोजित हेट क्राइम के तौर पर करने की जोरदार मांग उठाई।
सोशल मीडिया पर नफरती प्रचार और वास्तविक हमलों की कड़ी
कोएलिशन ऑफ हिंदूज ऑफ नॉर्थ अमेरिका की प्रतिनिधि पुष्पिता प्रसाद ने इस बात पर गहरा रोष जताया कि हाल के वर्षों में हिंदू और भारतीय समुदाय के विरुद्ध ऑनलाइन नफरत बेतहाशा बढ़ी है। उन्होंने कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया मंचों पर भारतीयों को गंदगी से जोड़ने और उनके खान-पान, रूप-रंग और परंपराओं के प्रति घृणा पैदा करने वाले पोस्ट्स की बाढ़ आ गई है। प्रसाद ने आगाह किया कि डिजिटल माध्यमों पर बहने वाला यह जहर देर-सवेर असल दुनिया में पहुंचकर हिंसक हमलों का कारण बनता ही है।
प्रसाद ने पिछले दो वर्षों में अमेरिका के विभिन्न राज्यों में हिंदू मंदिरों और प्रतीकों पर हुए लगातार हमलों का ब्योरा दिया। उदाहरण के तौर पर, ओहायो के रिचमंड हाइट्स में तीन अक्टूबर को एक हिंदू मंदिर पर उपद्रवियों ने ईंट-पत्थर फेंके, जिससे शाम की प्रार्थना के समय खिड़कियों के शीशे टूट गए। इसी प्रकार, जून दो हजार पच्चीस में यूटा राज्य के स्पैनिश फोर्क स्थित श्री श्री राधा कृष्ण मंदिर पर अज्ञात तत्वों ने गोलियां चलाईं, जिससे मंदिर संपत्ति को हजारों डॉलर का भारी नुकसान हुआ था।
टेक्सास के शुगर लैंड में वर्ष दो हजार चौबीस में स्थापित की गई नब्बे फीट ऊंची भगवान हनुमान की भव्य प्रतिमा को लेकर भी सोशल मीडिया पर घिनौनी टिप्पणियां की गई थीं। इसके अलावा, टेक्सास के ही फ्रिस्को शहर का संदर्भ देते हुए नागरिक नेताओं ने बताया कि वहां की कुल आबादी में भारतीय मूल के लोगों की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है। इसके बावजूद नगर परिषद की सार्वजनिक बैठकों में कुछ स्थानीय वक्ताओं ने भारतीय समुदाय को खुलेआम हमलावर करार दिया और उन पर एच-वन-बी वीजा के जरिए अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छीनने और व्यवस्था को धोखा देने के झूठे आरोप लगाए।
आंकड़ों में छलकता नस्लीय द्वेष और आव्रजन का मुद्दा
इंटरनेट पर नफरत के प्रसार का अध्ययन करने वाले नेटवर्क कन्टेजन रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता जोएल फिंकेलस्टीन ने बताया कि वर्ष दो हजार पच्चीस के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भारत विरोधी पोस्ट्स की साप्ताहिक संख्या में तीन गुना उछाल दर्ज किया गया है। उन्होंने समझाया कि अमेरिकी आव्रजन नीतियों में बदलाव, विशेष रूप से एच-वन-बी वीजा नियमों को लेकर होने वाली बहसों के दौरान नस्लीय गालियों और देश से बाहर निकालने की बयानबाजी में भारी वृद्धि देखी जाती है। फिंकेलस्टीन ने निराशा जताते हुए कहा कि फिलहाल इस नफरत के ज्वार को और अधिक बिगड़ने से रोकने के लिए कोई ठोस व्यवस्था मौजूद नहीं है।
स्टॉप आपी हेट संस्था से जुड़ी मंजूषा पी. कुलकर्णी ने भी गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि वर्ष दो हजार तेईस से दो हजार पच्चीस के मध्य दक्षिण एशियाई लोगों को निशाना बनाकर किए जाने वाले ऑनलाइन अपशब्दों में एक सौ नौ प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है। कुलकर्णी ने कहा कि इलिनॉय में घटी यह घटना हर उस व्यक्ति के लिए निजी तौर पर डरावनी है जो मंदिर जाता है। उन्होंने रेखांकित किया कि अपने बच्चों के साथ पूजा करने जाना और वहां जान के खतरे का साया महसूस होना बेहद खौफनाक अनुभव है।
नागरिक अधिकार समूहों ने राजनीतिज्ञों की बयानबाजी को भी इस बढ़ते तनाव का एक बड़ा कारण बताया। उन्होंने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस पुराने बयान का हवाला दिया जिसमें उन्होंने एच-वन-बी कर्मचारियों की तुलना बंधुआ मजदूरों से की थी। इसी तरह, टेक्सास रेलरोड कमीशन के चुनाव में दावेदारी कर रहे बो फ्रेंच द्वारा एक कॉलेज खेल मुकाबले के दौरान दक्षिण एशियाई छात्रों को समस्या बताने वाली पोस्ट ने इंटरनेट पर भारी विवाद खड़ा कर दिया था। अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस पोस्ट के बाद ऑनलाइन मंचों पर मंदिरों को तोड़े जाने और भारतीय प्रवासियों पर हिंसा करने के खुले आह्वान किए जाने लगे थे।
साझेदारी और मानवीय संवाद ही समाधान
हाल के दिनों में नस्लीय हिंसा की यह लहर केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रही है। व्योमिंग में पिछले माह एक सिख ट्रक ड्राइवर पर धारदार हथियार से जानलेवा हमला किया गया था। यह हमला तब हुआ जब आंतरिक सुरक्षा विभाग से जुड़े आधिकारिक माध्यमों पर सिख ट्रक चालकों को लेकर आपत्तिजनक बातें कही गई थीं। विस्कॉन्सिन के ओक क्रीक गुरुद्वारे में वर्ष दो हजार बारह में हुए भीषण हमले में अपने पिता सतवंत सिंह कालेका को खोने वाले परदीप कालेका ने इस मुद्दे पर बहुत गहरी बात कही। उन्होंने याद दिलाया कि उस समय हमलावर वेड माइकल पेज खुद को श्वेत वर्चस्ववादी मानता था।
कालेका ने कहा कि इस प्रकार के हमलावर कभी भी बिना चेतावनी के अचानक सामने नहीं आते। उन्होंने समझाया कि जो लोग इस तरह के वीभत्स अपराध करते हैं, वे भीतर से पूरी तरह उम्मीद खो चुके होते हैं और उनका मुख्य मकसद समाज में भी भय और निराशा का बीज बोना होता है। कालेका के अनुसार, विभिन्न नस्लों और धर्मों के लोगों के बीच आमने-सामने बैठकर खुलकर और ईमानदारी से मानवीय स्तर पर संवाद होना अनिवार्य है। यदि हम इंसानी स्तर पर एक-दूसरे से नहीं जुड़ेंगे, तो समाज में एकजुटता की भावना समाप्त हो जाएगी और विभाजनकारी ताकतें और अधिक मजबूत होंगी।
हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स की प्रतिनिधि श्राव्या ताड़ेपल्ली ने भी इस बात पर जोर दिया कि केवल बयानों को सतही मानकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि नफरती विचार ही अंततः वास्तविक हिंसा की आग को भड़काते हैं। उन्होंने बताया कि इस खतरे से निपटने के लिए हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य सामाजिक समूहों ने मिलकर एक मजबूत साझा मोर्चा तैयार किया है। शिकागो सम्मेलन में मौजूद सभी नेताओं ने एक स्वर में दोहराया कि ऑरोरा की घटना स्पष्ट संदेश देती है कि यदि समय रहते नफरत के स्रोतों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो इसके परिणाम बेहद घातक साबित हो सकते हैं।


















